S M L

SC के आदेश के बाद EVM के साथ होगी कागज की पर्ची, विपक्ष अभी भी संतुष्ट नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में यह आदेश दिया था कि वोटिंग मशीन के साथ कागज की पर्ची निकालने और गिनने की व्यवस्था की जाए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पांच साल बाद अब कोई कारण नहीं है कि हर बूथ पर वोटिंग मशीन के साथ वीवीपैट न हों

Updated On: Aug 25, 2018 09:35 AM IST

Dilip C Mandal Dilip C Mandal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

0
SC के आदेश के बाद EVM के साथ होगी कागज की पर्ची, विपक्ष अभी भी संतुष्ट नहीं

2019 के लोकसभा चुनाव में अब चंद महीने ही बचे हैं. चुनाव आयोग ने कह दिया है कि वह चुनाव कराने के लिए तैयार है. इस बार हर बूथ पर वोटिंग मशीन के साथ वीवीपैट यानी कागज की पर्ची निकालने और उन्हें जमा करने की व्यवस्था होगी और किसी भी तरह का विवाद होने पर उन पर्चियों को गिनकर नतीजों की पुष्टि की जाएगी. भारतीय चुनाव के इतिहास में यह एक नया दौर होगा. बैलेट पेपर और ईवीएम से मतदान के बाद अब एक मिलीजुली व्यवस्था आ रही है, जिसमें मशीन और कागज दोनों होंगे. ऐसा ईवीएम की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए हो रहा है.

वीवीपैट वोटिंग मशीन से जुड़ा हुआ एक प्रिटिंग उपकरण

ईवीएम की विश्वसनीयता पर दुनिया भर में बहस है. इस प्रणाली के समर्थक और विरोधी दोनों हैं और दोनों के अपने अपने तर्क हैं. दुनिया के ज्यादातर देशों में इस बहस में ईवीएम विरोधी विजेता रहे हैं. इस विवाद देखते हुए ही सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में यह आदेश दिया था कि वोटिंग मशीन के साथ कागज की पर्ची निकालने और गिनने की व्यवस्था की जाए.

इस काम को पूरा करने के लिए धन की कमी न हो इसके लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिए गए थे. इसे एक झटके में पूरे देश में कर पाना संभव नहीं था, इसलिए वीपीपैट को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया. केंद्र सरकार ने इस काम के लिए आवश्यक रकम चुनाव आयोग को मुहैया करा दी है और सुप्रीम कोर्टे के आदेश के पांच साल बाद अब कोई कारण नहीं है कि हर बूथ पर वोटिंग मशीन के साथ वीवीपैट न हों.

A view of the Indian Supreme Court building is seen in New Delhi

वीवीपैट वोटिंग मशीन से जुड़ा हुआ एक प्रिटिंग उपकरण है. मतदाता जब वोट डालता है तो उसकी छाप या अनुकृति एक कागज पर दर्ज हो जाती है. मतदाता इसे देखकर आश्वस्त हो सकता है कि उसने जिसे वोट दिया है, वोट उसी को गया है. इसके बाद वह पर्ची एक डब्बे में चली जाती है. मतदान पूरा होने के बाद मशीन के साथ ही उस पर्ची वाले डब्बे को भी सील कर दिया जाता है. मशीन से वोटों की गणना के बाद जरूरी होने पर इन पर्चियों की गिनती करके नतीजों की पुष्टि की जा सकती है. अब तक सैकड़ों सीटों पर वीवीपैट का प्रयोग किया जा चुका है. कुछ स्थानों पर वीवीपैट खराब होने की घटनाएं भी हुई हैं. खासकर गर्म मौसम में ऐसा होता है.

ये भी पढ़ें: सोशल मीडिया: बंद कमरे में गूंजती अपनी जैसी आवाजें

हालांकि वीवीपैट में वैसी पारदर्शिता नहीं है, जो कि बैलेट पेपर में है, लेकिन यह मशीन और बैलेट पेपर के बीच का एक रास्ता है. वीवीपैट की पर्ची में दर्ज वोट को बहुत कम समय के अंदर ही देख लेना होता है, और कई मतदाता यह नहीं कर पाएंगे. यह सवाल भी रहेगा कि क्या हर सीट पर अगर कैंडिडेट मांग करेंगे तो हर सीट पर वोटों की दोबारा गिनती होगी.

पुनर्मतगणना चूंकि एक विधिमान्य प्रक्रिया है, इसलिए अगर कोई कैंडिडेट इसकी मांग करता है, तो उसे बिना तर्कों और तथ्यों के खारिज नहीं किया जा सकता. चुनाव आयोग को इस बारे में भी कोई प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी.

EVM हमेशा विवादों के दायरे में रही है

वीवीपैट लगी ईवीएम से चुनाव की तैयारियों के बीच, विपक्ष की 17 पार्टियां यह मांग कर रही हैं कि 2019 के चुनाव बैलेट पेपर पर हों और मशीनों से मतदान पूरी तरह बंद हो. उनके पास कई तर्क हैं, जिन पर चुनाव आयोग को विचार करना है. मिसाल के तौर पर, सबसे बड़ा सवाल तो मशीन की विश्वसनीयता का है. दुनिया के सभी विकसित लोकतंत्र बैलेट पेपर पर मतदान कराते हैं. इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन से लेकर जापान और ऑस्ट्रेलिया तक शामिल हैं.

भारत के पड़ोस का एक भी देश ईवीएम से राष्ट्रीय स्तर के चुनाव नहीं कराता. दुनिया में सिर्फ चार देश ही राष्ट्रीय चुनाव ईवीएम से कराते हैं. जिन देशों में इस मशीन की माइक्रोचिप बनती है, या जहां इस मशीन से संबंधित टेक्नोलॉजी का आविष्कार हुआ वे भी अपने देश में चुनाव मशीनों के जरिए नहीं कराते. जर्मनी में तो वहां के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद मशीनों से चुनाव कराना बंद कर दिया गया. मशीनों से वोटिंग के खिलाफ अब तक यह तर्क भी दिया जाता रहा है कि इसमें पुनर्मतगणना में हर वोट की गिनती संभव नहीं है और इस काम को मशीनों के कुल वोटों को जोड़कर निपटा दिया जाता है.

भारत में भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन हमेशा से विवादों के दायरे में रही है. ईवीएम के विरोध में बीजेपी एक समय सबसे मुखर थी. खासकर 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने मशीनों से वोटिंग के खिलाफ अभियान चलाया.

बीजेपी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए, जहां वे अपना पक्ष साबित भी कर पाए. इसके बाद ही वीवीपैट की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट ने की है. बीजेपी के वर्तमान समय के प्रवक्ता और नेता जीवीएल नरसिंह राव ने इवीएम के खिलाफ एक पूरी किताब लिखी और बताया कि वोटिंग मशीन क्यों विश्वसनीय नहीं हैं. वोटिंग मशीन से मतदान की जितनी आलोचनाएं संभव है, लगभग वे सभी इस किताब में दर्ज हैं. अब ईवीएम के खिलाफ 17 विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं.

आम तौर पर यह देखा गया है कि चुनाव हारने के बाद पार्टियां वोटिंग मशीन को जिम्मेदार ठहराती हैं. इस बार दिलचस्प यह है कि चुनाव जीतने वाली पार्टियां जैसे तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी वोटिंग मशीन का विरोध कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी ने यूपी में दो महत्वपूर्ण लोकसभा उपचुनाव जीते हैं, इसके बावजूद वह ईवीएम का विरोध कर रही है.

voting

सोशल मीडिया पर अपना आधार नंबर न बताएं

चुनाव आयोग के पास वोटिंग मशीन के पक्ष में तमाम तर्क हैं. लेकिन विपक्ष उन तर्कों से संतुष्ट नहीं है. चुनाव आयोग का कहना है कि ये मशीनें स्टैंडअलोन हैं यानी इनमें वह प्रणाली है ही नहीं जिससे वे किसी नेटवर्क से जुड़ सकें और इसलिए इनकी हैकिंग संभव नहीं है.

हालांकि किसी टेक्नोलॉजी को लेकर इतनी भरोसे से किसी बात को कहना कि ‘यह हो ही नहीं सकता,’ एक अवैज्ञानिक सोच है. विज्ञान अनंत संभावनाओं को क्षेत्र है जो पहले नहीं हुआ ऐसी हजारों चीजें अब हो रही हैं और जो अब नहीं हो रही हैं, ऐसी हजारों चीजें आगे चलकर होंगी. आखिरकार जिस आधार नंबर को बिल्कुल सुरक्षित माना जा रहा था, और जिसे लेकर सभी आश्वस्त थे, उसके बारे में यह निर्देश और चेतावनी जारी करनी पड़ी कि इस नंबर को सार्वजनिक न करें और सोशल मीडिया पर अपना आधार नंबर न बताएं.

ये भी पढ़ें: क्या सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा अगला लोकसभा चुनाव?

इस बात के मद्देनजर और लोकतंत्र के व्यापक हित के लिए भी, चुनाव आयोग को खुले मन से विपक्ष की बात सुननी चाहिए और उसकी शंकाओं का समाधान करना चाहिए और अगर विपक्ष संतुष्ट नहीं होता तो देश को बैलेट पेपर की ओर लौट जाने पर विचार करना चाहिए क्योंकि हर मतदाता को यह एहसास तो होना ही चाहिए कि उसने जिसे वोट दिया है, वोट उसी को गया है और उसके वोट से ही देश में सरकारें बनती हैं. यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पार्टियां इस समय ईवीएम से वोटिंग का विरोध कर रही हैं, वे देश के लगभग आधे मतदाताओं की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता
Firstpost Hindi