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थानों का उद्धार जानें तब योगी आदित्यनाथ का चमत्कार मानें

यूपी को एक प्रोग्रेसिव और आगे की ओर बढ़ने वाले राज्य के रूप में पहचान बनानी होगी.

Updated On: Mar 22, 2017 05:22 PM IST

Shantanu Mukharji

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थानों का उद्धार जानें तब योगी आदित्यनाथ का चमत्कार मानें

उत्तर प्रदेश की नई कैबिनेट ने लखनऊ में 19 मार्च को एक भव्य समारोह में शपथ ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के सभी हाई प्रोफाइल नेता इसमें मौजूद थे.

योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की गद्दी हासिल कर सबको चौंका दिया. वह देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले और जटिल राज्य में सत्ता की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं.

उनके साथ दो अलग-अलग जातियों के उप-मुख्यमंत्री भी होंगे. एक ब्राह्मण- दिनेश शर्मा और एक ओबीसी- केशव प्रसाद मौर्य. ऐसा इस वजह से है कि शायद पार्टी लीडरशिप एक बैलेंस बनाकर चलना चाहती है.

इस सबमें सबसे ज्यादा अटपटी चीज यह है कि मुख्यमंत्री और उनके दोनों उप- मुख्यमंत्रियों में से किसी को भी प्रशासन चलाने का अनुभव नहीं है. ऐसे में यूपी जैसे राज्य को चलाना एक भारी-भरकम काम होगा जिसमें कई चुनौतियों का सामना इन्हें करना होगा.

विकास से जुड़े निवेश, कानून और व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, स्वच्छ और पारदर्शी शिक्षा-तंत्र और स्वास्थ्य क्षेत्र को फिर से पटरी पर लाने जैसे क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर काम किए जाने की जरूरत है.

हालांकि, सभी क्षेत्रों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. लेकिन, अपराध नियंत्रण और पुलिस के कामकाज में सुधार खासतौर पर थाना लेवल पर सुधार का काम तत्काल शुरू किया जाना जरूरी है.

गुजरे सालों में उत्तर-प्रदेश जैसा बड़ा राज्य पुलिस कामकाज के मोर्चे पर जस का तस खड़ा है और इसमें एक बड़ी सर्जरी की जरूरत है. इसका इलाज थानों से शुरू होना चाहिए.

एफआईआर की मुश्किल

पुलिस स्टेशनों में सबसे बड़ी बीमारी लोगों के साथ किए जाने वाले व्यवहार की है. किसी भी पुलिस थाने में एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) दर्ज कराना बेहद मुश्किल काम है.

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यूपी की सभी सरकारें पुलिस के रवैये को बदलने में नाकाम रहीं हैं

एक के बाद एक सरकारें आती रहीं हैं. लेकिन, ये पुलिस का लोगों के प्रति व्यवहार बदल पाने में नाकाम रही हैं. यूपी की बदनामी बढ़ती रही और यह माना गया कि इसमें बदलाव मुमकिन नहीं है.

पीड़ित पक्ष के साथ पुलिस का व्यवहार बदलने की जरूरत है. स्टेशनों में मूंछो वाले और स्थूलकाय पुलिसवाले खतरनाक दिखाई देते हैं और इन्हें देखकर लोगों के मन में पुलिस को लेकर विश्वास नहीं पैदा होता.

यही वजह है कि शिकायतकर्ता हमेशा किसी दबदबे वाले शख्स या राजनीतिक दल के नेता को मामला दर्ज कराने के लिए थाने ले जाना पसंद करते हैं.

महिलाओं को लेकर रुख खासतौर पर बेहद निराश करने वाला है. ऐसे असंख्य मामले हैं जिनमें महिलाओं की बेइज्जती की गई और उन्हें न्याय नहीं दिया गया.

नए निजाम में पुलिस के मोर्चे पर अप्रोच में बदलाव जरूरी है. इसकी शुरुआत थाना लेवल से होनी चाहिए. सरकार की इमेज में सुधार के लिए यह सबसे जरूरी है. इससे एक प्रभावी गवर्नेंस दिखाई देगा.

काम करवाने में दलालों का सहारा लेने की जरूरत खत्म होनी चाहिए. लोगों की पुलिस तक सीधी पहुंच होनी चाहिए. दरोगाओं का डर लोगों के दिमाग से हटाने की जरूरत है. यह काम तत्काल शुरू होना चाहिए.

एक दिन पहले ही इलाहाबाद में एक बीएसपी नेता की हत्या हुई है, लेकिन नए सीएम इस मामले में पुलिस को मुस्तैदी से लगाने और दोषियों को गिरफ्तार करने के सख्त निर्देश देते दिखाई दिए हैं.

इससे संकेत ये जा रहा है कि आम सोच और राय के विपरीत नई सरकार को किसी भी पार्टी या समुदाय के साथ पक्षपात या द्वेष को छोड़कर काम करना होगा. हालांकि, इस तरह के कदम लापरवाह हुए बगैर उठाने होंगे.

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पुलिस के आला अफसरों को एसएचओ समेत पूरे थाना स्टाफ को निर्देश देना चाहिए कि वे लोगों का भरोसा हासिल करने की कोशिश करें. अगर ऐसा होता है तो आधी लड़ाई हम आसानी से जीत जाएंगे.

इसके अलावा पुलिस की इनवेस्टिगेटिंग स्किल्स में सुधार लाने को भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए. खराब इनवेस्टिगेशन स्टैंडर्ड के चलते हमें आरुषि मर्डर केस को बिगाड़ देने, बदनाम निठारी मर्डर जैसे मामले देखने को मिलते हैं.

साइंटिफिक अप्रोच

इनवेस्टिगेशन में साइंटिफिक अप्रोच का अभाव दिखाई देता है. आम राय यह है कि यूपी पुलिस अभी भी अप्रचलित तौर-तरीके इस्तेमाल करती है.

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यूपी पुलिस में भर्ती ज्यादातर पुलिसकर्मी शारीरिक तौर पर फिट नहीं पाए जाते हैं

देश के सबसे बड़े राज्य और एक विशाल पुलिस फोर्स के साथ यह उम्मीद की जाती है कि पुलिसिंग में यह राज्य बाकियों से आगे होगा. लेकिन, दुर्भाग्य से यह सच नहीं है. साथ ही माइंडसेट को बदलना भी बेहद जरूरी है.

यूपी में पुलिस के कामकाज से जुड़ी हुई नकारात्मक चीजों का जिक्र करने के साथ ही हमें यह बात भी कहनी होगी कि यूपी पुलिस में ही एंटी टेरर स्क्वॉड (एटीएस) और स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) जैसी बेहद प्रोफेशनल और काबिल इकाइयां भी हैं.

आतंकवाद से निपटने और गंभीर मामलों और खतरनाक अपराधियों से निपटने में इनके प्रदर्शन असाधारण और मिसाल देने योग्य रहे हैं. इनके अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड के पीछे की वजह नेताओं से इनकी दूरी मानी जाती है.

दूसरी ओर पुलिस थाने बड़े लेवल पर राजनीति के प्रभाव में रहते हैं. नेताओं और पुलिस का गठजोड़ एक आम बात है. इस गठजोड़ का टूटना जरूरी है. आखिर में, खुफिया तंत्र को एक्टिव बनाना चाहिए क्योंकि यह राजनीतिक, सांप्रदायिक, छात्र और अन्य महत्वपूर्ण किस्म की खुफिया जानकारियां मुहैया कराता है.

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लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) सुप्तावस्था में दिखाई देता है. इसमें नई जान फूंकने की जरूरत है ताकि ये थानों को समस्याएं सुलझाने में मदद दे सकें. सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि यूपी पुलिस अनुभवी हाथों से अपने इंटेलिजेंस को सुधारने के प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है.

बदलाव के लिए तैयार न होने के कारण इसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. एक हफ्ते से भी कम पुरानी सरकार में औपनिवेशिक मानसिकता से गुजर रही पुलिस में सुधार करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इसके बावजूद सबकुछ अभी खत्म नहीं हुआ है.

मजबूत पुलिस लीडरशिप और लॉन्ग-टर्म विजन के साथ लोगों के हितों को सबसे ऊपर रखते हुए काम करने की जरूरत है. इसके लिए पुलिस स्टेशनों को लोगों की उम्मीदों और भरोसे पर खरा उतरना होगा.

यूपी को एक प्रोग्रेसिव और आगे की ओर बढ़ने वाले राज्य के रूप में पहचान बनानी होगी जो कि जाति और धर्म की राजनीति से परे हो.

(लेखक यूपी काडर के रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं. वह सिक्योरिटी एनालिस्ट और सिक्योरिटी मसलों पर कॉन्ट्रिब्यूटर हैं. वह इंडिया पुलिस फाउंडेशन के सीनयिर फेलो भी हैं. लेख में व्यक्त की गई उनकी राय व्यक्तिगत है.)

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