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400 वर्षों के ‘शाप’ से मुक्त हुआ मैसूर का वाडियार राजवंश

मैसूर के वाडियार राजघराने में 400 साल बाद किसी बेटे की किलकारी गूंजी है

Updated On: Dec 07, 2017 04:47 PM IST

FP Staff

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400 वर्षों के ‘शाप’ से मुक्त हुआ मैसूर का वाडियार राजवंश

आज के आधुनिक युग में इस बात पर भरोसा करना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन मैसूर के राजवंश को 400 सालों बाद एक 'शाप' से मुक्ति मिली है. मैसूर के वाडियार राजघराने में 400 साल बाद किसी बेटे की किलकारी गूंजी है. लगभग 400 सालों में पहली बार बाद इस राज परिवार में किसी लड़के यानी राजवंश के उत्तराधिकारी का प्राकृतिक तरीके से जन्म हुआ है. बुधवार रात करीब 9.30 बजे त्रिशिका ने निजी हॉस्पीटल में पुत्र को जन्म दिया. त्रिशिका शाही परिवार के उत्तराधिकारी युदवीर श्रीकंठ दत्ता चामराजा की पत्नी हैं.

चिकित्सकों के मुतबिक जच्चा-बच्चा की सेहत अच्छी है. वहीं इस खुशखबरी से राज परिवार में फिर से रौनक देखने को मिली है. यदुवीर और त्रिशिका की शादी पिछले साल जून में हुई थी. त्रिशिका डुंगरपुर की राजकुमारी थीं.

पिछले 400 सालों से इस राजवंश का अगला राजा दत्तक पुत्र ही बन रहा है. यानी राजा-रानी को अपना वारिस चुनने के लिए किसी को गोद लेना पड़ता है, क्योंकि रानी ने कभी बेटों को जन्म नहीं दिया.

मैसूर राजघराने पर राज करने वाले वाडियार राजवंश का इतिहास शुरू होता है सन 1399 से. यानी मैसूर राजवंश भारत में अब तक सबसे ज्यादा लंबे वक्त तक राजशाही परंपरा को निभाने वाला वंश है. लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि पिछले 5 सदियों से इस राजवंश को चलाने वाले महारानी की कोख से जन्म नहीं लेते.

सन् 1612 के बाद से इस राजवंश के राजा-रानी को कोई पुत्र पैदा नहीं हुआ. हर बार दत्तक पुत्र को ही राजा बनाया जाता है. मैसूर राजघराने के मौजूदा राजा यदुवीर वाडियार को भी गोद ही लिया गया है. महारानी प्रमोदा देवी ने अपने पति श्रीकांतदत्त नरसिम्हराज वाडियार की बड़ी बहन के बेटे यदुवीर को गोद लेकर उसे राजा घोषित किया.

क्या था शाप?

बताया जाता है कि पिछले चार सौ सालों से एक शाप इस राजघराने का पीछा कर रहा है. मैसूर राजघराने को लेकर मान्यता है कि 1612 में दक्षिण के सबसे शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद वाडियार राजा के आदेश पर विजयनगर की अकूत धन संपत्ति लूटी गई थी. उस समय विजयनगर की तत्कालीन महारानी अलमेलम्मा हार के बाद एकांतवास में थीं. लेकिन उनके पास काफी सोने, चांदी और हीरे- जवाहरात थे.

वाडियार ने महारानी के पास दूत भेजा कि उनके गहने अब वाडियार साम्राज्य की शाही संपत्ति का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें दे दें. लेकिन अलमेलम्मा ने गहने देने से इनकार कर दिया. इसके बाद शाही फौज ने जबरदस्ती खजाने पर कब्जा करने की कोशिश की. इससे दुखी होकर महारानी अलमेलम्मा ने शाप दिया कि जिस तरह तुम लोगों ने मेरा घर ऊजाड़ा है उसी तरह तुम्हारा देश वीरान हो जाए. इस वंश के राजा- रानी की गोद हमेशा सूनी रहे. इसके बाद अलमेलम्मा ने कावेरी नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली.

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यदुवीर और त्रिशिका की शादी की तस्वीर (तस्वीरः न्यूज18 हिंदी)

राजा को जब ये पता चला तो वो काफी दुखी हुए. वो अलमेलम्मा की मौत नहीं चाहते थे, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था. तब से अब तक लगभग 400 सालों से वाडियार राजवंश में किसी भी राजा को संतान के तौर पर पुत्र नहीं हुआ. राज परंपरा आगे बढ़ाने के लिए राजा-रानी 400 सालों से परिवार के किसी दूसरे सदस्य के पुत्र को गोद लेते आए हैं.

कई पीढ़ियों से चल रही थी अलमेलम्मा को खुश करने की कोशिश

वैसे तो देश में राजशाही परंपरा खत्म हो चुकी है, लेकिन अभी भी राजवंशों में उसी परंपरा का पालन किया जाता है, जो सदियों से चली आ रही है. इसी परंपरा के तहत पहले यदुवीर को गोद लिया गया, और फिर परंपरा के मुताबिक एक राजपरिवार में उनकी शादी की गई.

यह भी एक रोचक तथ्य है कि कई पीढ़ियों से वोडियार राजवंश ने अलमेलम्मा के शाप से मुक्ति के लिए और उन्हें खुश करने के लिए कई प्रयास किए. राजा वोडियार ने अलमेलम्मा की मैसूर में मूर्ति लगाई थी. कुछ साल पहले श्रीकांतदत्त नरसिम्हराज वाडियार ने भी अलमेलम्मा को खुश करने के लिए और शाप से मुक्ति के लिए एक खास तरह की पूजा भी की थी.

एक अनुमान के मुताबिक मैसूर राजपरिवार के पास 10 हजार करोड़ की संपत्ति है. भले ही राजशाही खत्म हो गई है, लेकिन इस महल को देखकर आप रजवाड़ों के वैभव का अंदाजा लगा सकते हैं. राजा का शासन खत्म हो गया है, लेकिन अब भी खास मौकों पर यहां राजा का दरबार सजता है. राजा सिंहासन पर आसीन होता है और प्रजा उनके सामने बैठती है. दशहरे के मौके पर मैसूर के लोग राजा को सम्मान देने के लिए जुलूस निकालते हैं. राजा के आदेश के बाद ही दशहरे का कार्यक्रम शुरू होता है.

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