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राजनीति का दांव-पेच झेलते हुए एक आईपीएस के डीजीपी बनने तक का सफर

यूपी की योगी सरकार ने ओपी सिंह को चार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों पर वरीयता देकर डीजीपी बनाया है, वे 3 जनवरी को पद संभालेंगे

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jan 01, 2018 06:52 PM IST

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राजनीति का दांव-पेच झेलते हुए एक आईपीएस के डीजीपी बनने तक का सफर

यूपी कैडर के 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी और सीआईएसएफ के वर्तमान डीजी ओमप्रकाश सिंह को उत्तर प्रदेश पुलिस का महानिदेशक नियुक्त किया गया है. ओपी सिंह की नियुक्ति सुलखान सिंह की जगह पर हुई है, जो पिछले 31 दिसंबर को ही रिटायर हुए हैं. ओपी सिंह का महानिदेशक के तौर पर कार्यकाल 31 जनवरी 2020 तक रहेगा.

राज्य की योगी सरकार ने ओपी सिंह को चार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों पर वरीयता देकर डीजीपी बनाया है. 1982 बैच के आईपीएस अधिकारी प्रवीण सिंह और 1983 बैच के तीन आईपीएस अधिकारी सूर्य कुमार शुक्ला, आरआर भटनागर और गोपाल गुप्ता आखिरकार डीजीपी के रेस में ओपी सिंह से पिछड़ गए.

गौरतलब है कि ओपी सिंह की नियुक्ति को लेकर पिछले कुछ दिनों से राज्य की आईपीएस लॉबी में जबरदस्त लामबंदी चल रही थी. राज्य की आईपीएस लॉबी में इस बात की चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि ओपी सिंह ही इस बार सब पर भारी पड़ने वाले हैं. हुआ भी ऐसा ही राज्य की योगी सरकार ने आखिरकार ओपी सिंह के नाम पर मुहर लगा कर सभी आशंकाओं और अफवाहों पर पूर्णविराम लगा दी.

ओपी सिंह ही क्यों बने योगी की पसंद

अब जब ओ पी सिंह की नियुक्ति हो गई है तो आईपीएस लॉबी में इस बात की चर्चा फिर से शुरू हो गई है कि यदि सुप्रीम कोर्ट की दो साल के कार्यकाल दिए जाने को मानक माना जा रहा है तो आर आर भटनागर को क्यों नहीं डीजीपी बनाया गया? आर आर भटनागर का भी लगभग दो साल का कार्यकाल अभी शेष था. अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिरकार ओ पी सिंह ही योगी की पसंद क्यों बने?

UP Police

प्रतीकात्मक तस्वीर

गौरतलब है कि ओपी सिंह तीन जनवरी को डीजीपी के तौर पर अपना कार्यकाल शुरू करेंगे. राज्य की ब्यूरोक्रेसी में ओमप्रकाश सिंह को ओपी सिंह के नाम से ही जाना जाता है. पिछले कई सालों से ओपी सिंह ने राज्य की राजनीति को बहुत करीब से देखा और जाना है. लखनऊ सहित राज्य के कई जिलों में ओपी सिंह एसएसपी और एसपी के साथ कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है.

उत्तर प्रदेश के सियासतदानों के साथ भी ओपी सिंह के खट्टे और मीठे दोनो अनुभव रहे हैं. राज्य के सियासतदानों से ओ पी सिंह की नजदीकी और दूरी को लेकर चर्चाएं होती रहती हैं.

यूपी के सियासत का काला दिन कहा जाने वाला 2 जून 1995 का दिन भी नए डीजीपी के साथ किसी न किसी रुप में जुड़ा रहा. 2 जून 1995 को जब बीएसपी सुप्रीमो और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ गेस्टहाउस में अभद्र व्यवहार हुआ था, उस समय लखनऊ के एसएसपी ओपी सिंह ही थे.

साल 1995 में एक राजनीतिक घटनाक्रम में बीएसपी ने मुलायम सिंह यादव की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. समर्थन वापस लेने से नाराज एसपी कार्यकर्ताओं ने स्टेट गेस्टहाउस में रुकी मायावती के साथ हाथापाई और अभद्र व्यवहार किया था.

इस घटना के बाद काफी विरोध और राजनीतिक दबाव में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने ओपी सिंह को निलंबित कर दिया था. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस दिन गेस्टहाउस कांड हुआ था उसी दिन ओपी सिंह लखनऊ के एसएसपी बनाए गए थे. घटना के लगभग चार दिन बाद उनका निलंबन हुआ था.

मुलायम सिंह के नजदीकी माने जाते हैं ओपी सिंह

लखनऊ की राजनीति को करीब से जानने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ओपी सिंह राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बहुत करीबी रहे हैं. यह कुछ मामले में ओपी सिंह के खिलाफ भी गया. जिस लखनऊ गेस्टहाउस कांड में उनका निलंबन हुआ, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी. लेकिन, इसका खामियाजा ओपी सिंह ने भुगतना पड़ा.

जानकारों का मानना है कि मुलायम सिंह यादव की नजदीकी का फायदा भी समय-समय पर ओ पी सिंह को मिला. मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रीत्व काल में ही ओपी सिंह के लिए एक अलग पद क्रिएट किया गया था. नोएडा में ओपी सिंह को अपर पुलिस महानिदेशक बनाया गया था. मुलायम सिंह यादव का यह फैसला उन दिनों काफी सुर्खियों में रहा था.

लेकिन, मायावती की सरकार आते ही एक बार फिर से ओपी सिंह साइडलाइन कर दिए गए. मायावती की सरकार में ओपी सिंह का अधिकांश समय साइडलाइन पोस्टिंग में ही बीत गया. अखिलेश यादव के शासनकाल में भी ओपी सिंह को कुछ ज्यादा तरजीह नहीं मिली. आखिरकार राज्य की राजनीति से तंग आ कर ओपी सिंह ने ने केंद्र की तरफ रुख किया.

केंद्र में संभाली अहम् पदों की जिम्मेदारी

ओपी सिंह केंद्र में पिछले कई सालों से अनेक अहम् पदों की जिम्मेदारी संभाली. पिछले कुछ सालों से सीआईएसएफ के डीजी के तौर पर उनके काम को काफी पसंद किया जा रहा था. एनडीआरएफ और प्रधानमंत्री की सुरक्षा में भी काफी दिनों तक ओ पी सिंह ने अपनी सेवाएं दी हैं. केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद ओ पी सिंह का कद लगातार बढ़ता गया.

साल 2017 में जब राज्य में बीजेपी की सरकार बनी तो एक बार फिर से चर्चाएं शुरू हो गई थी कि ओपी सिंह प्रदेश में लौट रहे हैं. पूर्व डीजीपी जाविद अहमद को डीजीपी के पद से हटाए जाने के बाद भी यह चर्चाएं गरम थी कि ओपी सिंह राज्य में लौट रहे हैं, लेकिन यह सिर्फ चर्चाएं ही रहीं. लगभग आठ महीने के बाद आखिरकार ओपी सिंह की वापसी डीजीपी के तौर पर हो ही गई.

IPS Upsc police

ओपी सिंह की छात्र जीवन में दिल्ली विश्वविद्यालय के जुबली हॉल में उनके साथ रहे एक आईपीएस अधिकारी और दिल्ली पुलिस के पूर्व ज्वाइंट कमिश्नर एसबीएस त्यागी फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए ओ पी सिंह बहुत ठहरे और सुलझे हुए अधिकारी हैं. मेरा मानना है कि ओपी सिंह यूपी पुलिस को अच्छा दिशा-निर्देश दे पाएंगे. पीएम सिक्योरिटी और एनडीआरएफ में इनका काम बहुत ही सराहनीय रहा है. अभी कुछ साल पहले ही दिल्ली में साउथ एशियन कंट्रीज का डिजास्टर मैनेजमेंट पर एक सम्मेलन हुआ था, जिसको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया था. इस सम्मेलन में एनडीआरएफ ने काफी अहम भूमिका थी. ओपी सिंह ने जिस तालमेल के साथ यह भूमिका निभाई वह काबिले-तारीफ था. इस सम्मेलन में कई देशों के डेलिगेट्स आए थे. ओपी सिंह की भूमिका को लेकर उस समय देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने खूब सराहना की थी.’

बिहार के गया जिले के निवासी हैं ओपी सिंह

ओपी सिंह बिहार के गया जिले के रहने वाले हैं. ओपी सिंह को करीब से जानने वाले उनके कुछ मित्रों का कहना है कि उन्होंने अपने मेहनत और संघर्ष के बल पर यह उपलब्धि हासिल की है. इस मुकाम तक पहुंचाने में उनकी मां और बड़े भाई का भी विशेष योगदान रहा है.

कहा जाता है कि ओ पी सिंह अपनी मां की कठिन परिश्रम और संघर्ष की उपज हैं. पिता की मौत कम उम्र में हो गई थी, पर मां ने बेटों की पढ़ाई के लिए काफी कुर्बानियां दी. जिस समय ओपी सिंह के पिता की मौत हुई थी उस समय परिवार की हालत काफी खराब थी. बड़ा भाई डॉक्टरी पढ़ रहा था और खुद ओपी सिंह रांची के सेंट जेवियर इंटर स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे.

मां ने खराब हालत में दोनों भाईयों को पढ़ाई जारी रखने को कहा. मां ने खुद ही खेती कराने का फैसला किया. एक मान्यता है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की तथाकथित उच्च जाति की महिलाएं खेत-खलिहान में नहीं जाती हैं, पर इस मुश्किल घड़ी में उनकी मां को यह काम करना पड़ा था.

ओपी सिंह को वर्ष 1999 में सराहनीय सेवाओं के लिए और साल 2005 में विशिष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति मेडल मिल चुका है. साथ ही साल 1993 में बहादुरी के लिए इंडियन पुलिस मेडल मिल चुका है.

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