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सुप्रीम कोर्ट रोस्टर: चीफ जस्टिस के कदम से और बढ़ सकता है संकट

नए रोस्टर के तहत जो व्यवस्था बनी है उसपर भी आपत्ति हो सकती है

Updated On: Feb 03, 2018 07:04 PM IST

Saurav Datta

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सुप्रीम कोर्ट रोस्टर: चीफ जस्टिस के कदम से और बढ़ सकता है संकट

सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों द्वारा की गई अभूतपूर्व और अप्रत्याशित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सिर्फ पसंदीदा चुनिंदा बेंचों को संवेदनशील मुकदमे सौंपे जाने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के काम के तरीके की तीखी आलोचना की थी. इसके बाद से इस बात का कयास लगाया जा रहा था कि देश में आपातकाल के बाद न्यायपालिका के सामने खड़े हुए सबसे बड़े संकट पर सबसे बड़े जज किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं.

अब जजों का नया रोस्टर जारी किया गया है  (कार्य आवंटन की व्यवस्था)- एक ‘विषयवार’ रोस्टर, जो कि 5 फरवरी से अमल में आ जाएगा, बताता है कि किस तरह के मुकदमे 12 सबसे वरिष्ठ जजों की बेंच के सामने पेश किए जाएंगे. दीपक मिश्रा जाहिर तौर पर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने चुनौती को स्वीकार कर लिया है, लेकिन थोड़ा गहराई में जाकर देखें तो पता चल जाएगा कि मामला यह नहीं है. यह साफ है कि हकीकत में, उन्होंने उनके कामकाज के तरीके की और कड़ी आलोचना को बढ़ावा दिया है.

शक्ति का केंद्रीकरण

12 जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चार असंतुष्ट जजों- जस्टिस जस्ति चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ- ने एक स्वर में कहा था कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया “रोस्टर का मालिक” होता है, लेकिन वह “समान लोगों में सिर्फ अव्वल होता है- ना इससे अधिक ना इससे कम.”

परंपरा में मान्यता दी गई है कि “चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को विशेषाधिकार है कि वह रोस्टर बनाए और कोर्ट के विभिन्न सदस्यों/बेंचों को विभिन्न मुकदमे सौंपे” और जजों ने यह भी कहा कि “इस देश के विधिशास्त्र में यह सुस्थापित व्यवस्था है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया समान लोगों में सिर्फ अव्वल है- ना इससे अधिक ना इससे कम.”

इसका अर्थ है कि मुकदमों की सुनवाई की बारी आती है तो उनकी शक्ति सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों से ज्यादा नहीं है. इसके साथ ही, हालांकि वह रोस्टर के मालिक हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि वह सारी शक्ति अपने हाथ में रखेंगे. लेकिन नए रोस्टर पर एक निगाह डालने से पता चल जाता है सीजेआई मिश्रा ने बड़ी सफाई से क्या किया है.

Supreme Court judges press conference

रोस्टर के मालिक के तौर पर वह कोर्ट में दाखिल सभी नई जनहित याचिकाओं (पीआईएल) की सुनवाई करेंगे. वह अन्य मामलों के अलावा चुनाव के मामले, सामाजिक न्याय के मामले, कोर्ट की अवमानना के मामले, संवैधानिक पदों पदों पर नियुक्तियों और विधि अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़े मामले, जांच आयोगों से जुड़े मामले सुनेंगे.

जस्टिस चेलमेश्वर को सौंपी गई जिम्मेदारी में श्रम मामले, भूमि अधिग्रहण, उपभोक्ता संरक्षण, मुआवजे के मामले आदि शामिल हैं. जस्टिस गोगोई अन्य मामलों के अलावा पर्सनल लॉ के मामले, राज्यों के आबकारी और शराब से जुड़े मामले देखेंगे. जस्टिस लोकुर पर्यावरण कानून से जुड़े मामले, सामाजिक न्याय के मामले, सशस्त्र सेना से जुड़े मामले आदि सुनेंगे, जबकि जस्टिस जोसेफ की जिम्मेदारियों में अन्य मामलों के अलावा फैमिली लॉ मामले और सर्विस लॉ के मामले होंगे.

सुप्रीम कोर्ट्स प्रेक्टिस एंड प्रोसीजर एंड ऑफिस प्रोसीजर, 2017 के अनुसार मुकदमों का रोस्टर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के आदेशों के अधीन रहते हुए रजिस्ट्रार (ज्यूडीशियल) द्वारा तैयार किया जाता है.

इसमें कहा गया है कि “रोस्टर चीफ जस्टिस के आदेशानुसार रजिस्ट्रार (जे-आई) द्वारा तैयार किया जाएगा. इसमें बेंच को काम का आवंटन/हस्तांतरण का सामान्य या विशेष निर्देश हो सकता है और इसमें अनुपलब्धता की स्थिति में किसी बेंच के काम को अन्य बेंच का आवंटन भी शामिल है.”

सबसे बड़ी अदालत के नवीनतम प्रेक्टिस एंड प्रोसीजर रूल्स के अनुसार चीफ जस्टिस समय-समय पर आकस्मिक स्थिति में रजिस्ट्रार (जे-आई) को रोस्टर निर्देश तैयार करने या न्यायिक कार्य के पुनःआवंटन के लिए संशोधन का निर्देश दे सकेंगे.

यह देखते हुए कि 12 जनवरी को चार जजों की सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि उनकी वरिष्ठता के बावजूद उनको संवेदनशील मुकदमे आवंटित नहीं किए जा रहे,  नया रोस्टर सर्वोच्च न्यायालय में पहले से चल रहे विवाद को और भड़काएगा. खासकर, सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी एनकाउंटर के मुकदमे की सुनवाई कर रहे सीबीआई जज बीएच लोया की मौत से जुड़ा केस- जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में जस्टिस गोगोई के कहे शब्दों के अनुसार यही वो मामला था जो सीजेआई के खिलाफ संयुक्त विरोध प्रदर्शन का फौरी कारण बना था.

यहां यह भी बताना प्रासंगिक है कि जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के अगले हफ्ते जब सीजेआई दीपक मिश्रा ने कई शुरुआती महत्वपूर्ण मुकदमों पर फैसले के लिए पांच जजों की संविधान पीठ बनाई, तो उन्होंने अपने खिलाफ बोलने वाले चार जजों को जानबूझकर इसमें शामिल नहीं किया. यह बात किसी से छिपी नहीं रही कि यह असहमति जताने वालों के खिलाफ बदले की कार्रवाई थी.

संस्थागत कार्यपद्धति का अभाव

New Delhi: Supreme Court judge Jasti Chelameswar along with other judges addresses a press conference in New Delhi on Friday. PTI Photo by Ravi Choudhary (PTI1_12_2018_000030B)

1993 के सेकेंड जजों के मामले, जिसने कोलेजियम सिस्टम की नींव रखी, ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया था कि ऐसी महत्वपूर्ण अदालत में सभी शक्तियां, यहां तक कि प्रशासनिक अधिकार भी, किसी एक या चीफ जस्टिस की मर्जी पर निर्भर नहीं होना चाहिए. लेकिन मौजूदा रोस्टर में ठीक यही हुआ है.

यह भी एक रहस्य है कि रोस्टर सिर्फ पीठासीन जजों के बारे में है, और उन जजों के बारे में खामोश है जो बेंच का हिस्सा होंगे. यह दिल्ली हाईकोर्ट और अन्य अदालतों के सिस्टम जैसा नहीं है, जहां प्रत्येक जज को खास किस्म के मुकदमे आवंटित किए जाते हैं.

जैसा कि मीडिया में प्रमुखता से रिपोर्ट किया गया था, नाराज चार सबसे वरिष्ठ जजों ने भविष्य में सीजेआई बनने वाले जजों को मिलाकर केसों के आवंटन के वास्ते संस्थागत व्यवस्था बनाने के लिए एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया था. नए रोस्टर के अनुसार ताजा आवंटन की व्यवस्था में इस सुझाव पर अमल नहीं किया गया है. इससे यह भी नतीजा निकाला जा सकता है कि सीजेआई दीपक मिश्रा ने असहमति रखने वाले चार साथी जजों द्वारा उठाई गई गंभीर आपत्तियों को अनसुना कर दिया है.

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