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हाथ में तिरंगा और कांधे पर कांवड़, शिवभक्ति और 'राष्ट्र'भक्ति के मेल का माजरा क्या है?

कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक कार्यक्रम में आस्था और राष्ट्रभक्ति का अनूठा संगम दिख रहा है जहां भोले की भक्ति के लिये बम-बम की गूंज है तो भारत माता की जय के नारे भी गूंज रहे हैं.

Updated On: Aug 09, 2018 09:54 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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हाथ में तिरंगा और कांधे पर कांवड़, शिवभक्ति और 'राष्ट्र'भक्ति के मेल का माजरा क्या है?

सावन का महीना, भगवा रंग में रंगे, कंधे पर गंगा जल से भरे कांवड़ उठाए शिव की नगरी में जलाभिषेक के लिये निकलते कांवड़ियों के कारवां हर साल की एक आम तस्वीर है. लेकिन पिछले तीन-चार साल से कांवड़ यात्रा में एक नया रंग भरा जा चुका है. उससे कांवड़ यात्रा का अंदाज बदल गया है. अब शिवभक्ति में डूबे कांवड़ यात्री राष्ट्रभक्ति से भी प्रेरित नजर आते हैं.

इनके कंधों पर अगर कांवड़ है तो हाथों में तिरंगा भी. कहीं ये 51 फीट का तिरंगा होता है तो कहीं ये 122 फीट का. साल दर साल आस्था के साथ राष्ट्रध्वज ऊंचा होता जा रहा है. कहीं कोई अकेला कांवड़ यात्री तिरंगा उठा कर चलता नजर आता है तो कहीं कई लोगों का जत्था मिलकर एक बड़ा तिरंगा उठाए आगे बढ़ते दिखता है.

बम-बम भोले और हर-हर महादेव के जयकारे और भारत माता की जय के जयघोष के साथ कांवड़ यात्रा में देशभक्ति का जोश भरा हुआ दिखता है. राष्ट्रीयता के रंग से रंगी कांवड़ यात्रा में हर जत्थे के पास लहराता हुआ तिरंगा है. कदम से कदम मिलाकर कांवड़िये तिरंगे को लहराते हुए आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.

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( तस्वीर: रविशंकर सिंह )

सवाल उठता है कि आखिर भोले की भक्ति के साथ देशभक्ति के संगम के पीछे वजह क्या है? पहली दफे किसी धार्मिक कार्यक्रम में आस्था के साथ राष्ट्रभक्ति का अनोखा संगम दिखाई दे रहा है. अगर भोले की भक्ति के लिये बम-बम की गूंज है तो भारत माता की जय के नारे भी गूंज रहे हैं.

दरअसल, कांवड़ के साथ तिरंगा यात्रा के कई संदेश हैं. कुछ कांवड़िये तिरंगा साथ लेकर चलने के पीछे की वजह शहीद हुए जवानों के प्रति सम्मान बताते हैं तो कहीं ये भाईचारे, अमन, शांति और प्रेम का संदेश देने की कोशिश है. दरअसल कांवड़िये कई संवेदनशील इलाकों से भी गुजरते हैं और उनकी कोशिश है कि कांवड़ यात्रा पर सांप्रदायिकता की नजर न लगे.

सवा सौ करोड़ देशवासियों को एक सूत्र में पिरोने वाला तिरंगा लेकर चलने वाले कांवड़ यात्री भले ही धर्म यात्रा पर निकले हैं लेकिन उनके अवचेतन में आस्था के साथ अब देशभक्ति और भाईचारे का भी जज्बा है.

भोले के जयकारों के साथ लहराते तिरंगे के बीच देश की सेना के प्रति सम्मान दिखाते कांवड़ यात्रियों की ये अनूठी पहल वाकई रोमांच भरती है. पंद्रह अगस्त  से पहले ही अब कांवड़ यात्रा के जरिये देशभक्ति की लहर फिजां में दौड़ती महसूस होने लगती है.

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( तस्वीर: रविशंकर सिंह )

आस्था की यात्रा में तिरंगा लेकर चलने वाले शिवभक्तों की राष्ट्रभक्ति से केवल एक ही प्रशासन की गुजारिश है कि वो राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा को ठेस न पहुंचने दें. लेकिन कांवड़िये भी जिस तरह से महादेव के लिये ले जा रहे जल की सुरक्षा में दिन-रात चौकस होते हैं उसी तरह वो तिरंगे की आन-बान-शान का भी पूरा ध्यान रखते हैं. जिस तरह आराध्य का जल उनके लिये अनमोल है उसी तरह तिरंगा भी उनके लिये धरोहर है.

कांवड़ यात्रा में कांवड़ियों का राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय ध्वज को सियासत कई नजरों से देख सकती है. सवाल उठ सकते हैं कि केंद्र में बीजेपी शासन के आने के बाद ही कांवड़ यात्रा में इतने बदलाव देखने को क्यों मिल रहे हैं. इसका एक जवाब ये भी है कि अब तक इतनी मुश्किल यात्रा को सरकारी मशीनरी की तरफ से उतना सहयोग नहीं मिलता था जितना अब मिलने लगा है. वहीं कांवड़ यात्रियों ने अपनी यात्रा को सिर्फ भोले की आस्था तक सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने देश को समभाव से जोड़ने के लिये तिरंगे को भी त्रिशूल की तरह थामा है.

kanwar yatra (1)

बहरहाल सावन को शिव का महीना माना जाता है. भोले की भक्ति में डूबी उनकी फौज अब अपनी कांवड़ यात्रा के जरिये देशभक्ति की अलख जगा रही है. कांवड़ के साथ तिरंगा थाम कर चलने वाली ये फौज अगर भक्ति में डूबी है तो राष्ट्रप्रेम में भी. इन कांवड़ियों का ये अपना तरीका है जिसके जरिये वो अपनी धार्मिक यात्रा के जरिये राष्ट्रीयता का संदेश देना चाहते हैं. कांवड़ियों के जत्थे के साथ तिरंगा यात्रा मुस्लिम इलाकों में गुजरते वक्त देशभावना और आपसी भाईचारे का भी संदेश दे रही है.

शिवभक्ति के साथ राष्ट्रशक्ति का प्रदर्शन करने वाले कांवड़ियों से गुजारिश है कि वो देशप्रेम की छवि को सड़कों पर तोड़फोड़ से चकनाचूर करने की गलती न करें क्योंकि आज अगर उनके हाथों में तिरंगा है तो उन्हें तिरंगे की गरिमा का ख्याल रखते हुए खुद को अनुशासन में रखना होगा.

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