S M L

नया बैंक घोटाला: उत्तराखंड कोऑर्पोरेटिव बैंक ने दिए शराब ठेकों को 165 करोड़ एनपीए लोन

नाबार्ड ने इस मामले की जांच शुरू कर दिया है

Updated On: Mar 24, 2018 04:04 PM IST

Yatish Yadav

0
नया बैंक घोटाला: उत्तराखंड कोऑर्पोरेटिव बैंक ने दिए शराब ठेकों को 165 करोड़ एनपीए लोन
Loading...

उत्तराखंड स्टेट कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (यूएससीबी) के कामकाज में भारी अनियमितता सामने आई है. बैंक ने ग्रामीण बैंक से जुड़े नियम-कानून की धज्जियां उड़ाकर शराब के ठेके से लेकर चीनी मिल तक के लिए कर्ज दिया. नियम के तहत इस तरह का बैंक छोटे और मंझोले किसानों को फसल के लिए लोन देता है. हालांकि, बैंक बोर्ड के सदस्यों के रिश्तेदारों को बिना किसी रेहन के कर्ज दिया गया. ऐसा प्रतीत होता है कि बैंक ने तमाम नियमों का उल्लंघन किया, जिससे 165 करोड़ का लोन गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में बदल गया.

नाबार्ड कर रहा है घोटाले की जांच

ग्रामीण और कृषि बैंकिंग से जुड़ा नियामक राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) इस घोटाले की जांच कर रहा है. इसने कहा है कि लोन लेने वाले उम्मीदवारों का आवेदन सीधा बोर्ड की बैठक के दिन ही स्वीकार कर लिया गया. शाखाओं और हेड ऑफिस द्वारा लोन के सही आकलन के बिना ही इसकी मंजूरी दे दी गई. इनमें से ज्यादातर लोन प्रस्ताव महाप्रबंधक (बैंकिंग) द्वारा मार्च 2016 से मार्च 2017 के दौरान मंजूर किए गए. दिलचस्प बात यह है कि उस वक्त महाप्रबंधक (बैंकिंग) रहे शख्स को अप्रैल 2017 में प्रमोशन देकर बैंक का प्रबंध निदेशक बना दिया गया.

नाबार्ड ने सितंबर 2017 में रिजर्व बैंक को उत्तराखंड स्टेट कोऑपरेटिव बैंक के बोर्ड को भंग कर इसके बदले बैंक प्रोफेशनल्स वाली प्रबंधन समिति बनाने का सुझाव दिया था. थी. नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक डी एन मागर ने चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार को भी कार्रवाई करने को कहा था. उन्होंने कहा था, 'बोर्ड ने मौजूदा सदस्यों के रिश्तेदारों के डिफॉल्ट का मुद्दा नहीं उठाया और उत्तराखंड सहकारी समिति कानून/नियम 2003 के तहत कोई कार्रवाई नहीं की थी. नवीन पंत (बैंक के डायरेक्टर) की पत्नी रीना पंत के पास 4.42 करोड़ का लोन है और पूरी रकम बकाया है. बैंक ने गलत तरीके से इसका वर्गीकरण स्टैंडर्ड के तौर पर कर दिया था. नवीन पंत (बैंक के डायरेक्टर) के भाई राजेश पंत के 5.97 करोड़ रुपये के लोन को 31 मार्च 2017 को सब-स्टैंडर्ड के बजाय स्टैंडर्ड कैटेगरी में डाल दिया, जबकि लोन 6 दिसंबर 2016 से बकाया था. मैं आपसे बोर्ड और सीईओ की गतिविधियों की जांच कर उचित कार्रवाई का अनुरोध करता हूं.'

A man displays the new 2000 Indian rupee banknotes after withdrawing them from State Bank of India in Agartala

2009 से फरवरी 2017 के दौरान बैंक के प्रबंधक निदेशक रहे राजेंद्र प्रसाद ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि जब वह शीर्ष पद पर थे,  उसी दौरान सभी लोन की मंजूरी दे दी गई. हालांकि, उन्होंने अनियमितताओं और शराब के ठेके के लिए दिए गए लोन के लिए तत्कालीन महाप्रबंधक (बैंकिंग) दीपक कुमार को जिम्मेदार ठहराया, जो अब प्रबंध निदेशक हैं. प्रसाद का यह भी कहना था कि कुमार ने उन्हें और बोर्ड को गुमराह किया.

प्रसाद ने आरोप लगाया, 'उन्होंने बोर्ड के सामने पेश करने के लिए मुझे आकलन रिपोर्ट दी. उसके बाद मैंने लिखित में पूछा कि क्या उन्होंने लोन की गारंटी सुनिश्चित की थी, इस पर उनका जवाब हां था. हालांकि,  बोर्ड के कम से कम 6 सदस्यों ने शराब के ठेके के लिए लोन प्रस्ताव पर आपत्ति जताई. नतीजतन, मैंने महाप्रबंधक द्वारा पेश प्रस्तावों की जांच का आदेश दिया और रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बिना सिक्योरिटी सुनिश्चित किए लोन दिए गए और बोर्ड के कुछ सदस्य भी इसके लाभार्थी थे. लिहाजा, साफ तौर पर यह हितों का टकराव है. अक्टूबर 2016 में मैंने उनका जवाब जानने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. जनवरी 2017 में फिर से नोटिस भेजा गया, लेकिन इसका भी जवाब नहीं मिला.

ये भी पढ़ें:फ़र्स्टपोस्ट एक्सक्लूसिव: सिंभावली शुगर ने यूपी कोऑपरेटिव बैंक को भी लगाया चूना

इसके बाद मैंने उत्तराखंड की सहकारी समिति के रजिस्ट्रार को चिट्ठी लिखकर राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों से कुमार की सेवाएं वापस लेने की मांग की. राज्य सरकार का तंत्र और बोर्ड उनके साथ खड़ा हो गया और यहां तक कि नाबार्ड ने भी उस घोटाले पर परदा डालने की कोशिश की, क्योंकि सभी मंजूर लोन आखिरकार एनपीए हो गए. मैंने दस्तावेज संबंधी सबूत के साथ नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक (मगार) को भी तत्काल कार्रवाई के लिए दिसंबर 2017 में चिट्ठी लिखी, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया और मैं अब भी उस बैंक की अनियमितताओं के मामले में न्याय का इंतजार कर रहा हूं. इस बैंक को मैंने शुरुआती अवस्था से खड़ा किया था.'

नाबार्ड के मागर ने वैधानिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए फर्स्टपोस्ट से बात करने से मना कर दिया. उन्होंने प्रसाद की चिट्ठी पर भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वह पहले ही अपनी राय पेश कर चुके हैं. बैंक के प्रबंध निदेशक कुमार (जिन्होंने महाप्रबंधक रहते हुए सीधा बोर्ड के जरिये सभी लोन दिए थे) ने अपने पूर्व बॉस द्वारा लगाए गए आरोपों पर जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि उन्होंने निजी हैसियत से एक भी लोन मंजूर नहीं किया है. उन्होंने बताया कि सभी प्रस्ताव लोन कमेटी के सामने पेश किए गए और उसके बाद बोर्ड ने इस मुद्दे पर विचार किया और इस प्रक्रिया में बैंक के तत्कालीन प्रबंध निदेशक भी शामिल थे.

शीर्ष स्तर पर अंतिम मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने (कुमार ने) महाप्रबंधक की हैसियत से सिर्फ लोन की मंजूरी के लिए चिट्ठी जारी की. हालांकि, कुमार ने माना कि बोर्ड के निदेशकों के रिश्तेदारों और शराब के ठेकों के लिए लोन गलत और बैंकिंग नियमों का उल्लंघन है. हालांकि, ग्रामीण बैंक संबंधी नियमों का उल्लंघन कर शराब के ठेके लिए लोन पर उनकी दलील थी कि उनके पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में खेती संबंधी गतिविधियां सीमित हैं. उन्होंने दावा किया कि यूएससीबी फंड को बेकार नहीं छोड़ा जा सकता था और उसे डायवर्सिफाई करने की जरूरत थी.

कुमार ने बताया, 'निश्चित तौर पर हमारी मुख्य जिम्मेदारी कृषि लोन मुहैया कराने और किसानों की मदद करने की है, लेकिन उत्तराखंड में खेती की हालत खराब हो चुकी है और किसान शहरों में पलायन कर रहे हैं. ऐसे में हमें किसी भी अन्य व्यावसायिक बैंक की तरह काम करने पर मजबूर होना पड़ा. चूंकि हमारे पास सरप्लस कैश था, हमने फंड को डायवर्सिफाई करना और रियल एस्टेट जैसे विभिन्न उद्योगों को लोन देना शुरू किया. शराब के ठेके के लिए लोन इसी रणनीति का हिस्सा था. हालांकि, इससे बचा जा सकता था.' उनका यह भी कहना था कि जब से वह महाप्रबंधक बने, उन्होंने शराब के ठेके के लिए आगे लोन नहीं देने का फैसला किया.

bank npa

कुमार ने बताया, 'मैंने 54 एनपीए की सूची तैयार की है और अगले सप्ताह तक हम गारंटर के साथ ऐसे लोगों का नाम अखबार में छापने जा रहे हैं.' जाहिर तौर पर यह मामला हाथ से निकलने के बाद हाथ-पांव मारने का है.

यूएससीबी के एक और निदेशक सुरेंद्र सिंह नेगी ने भी शराब के ठेके के लिए दिए गए लोन पर आपत्ति जताई थी और इस बारे में स्पष्टीकरण भी मांगा था. हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया है कि प्रस्तावों को बैंक अधिकारियों की मौन सहमति के साथ मंजूरी दी गई. नेगी अब भी यूएससीबी के बोर्ड में हैं और फिलहाल इस बैंक की एनपीए कमेटी के चेयरमैन हैं. नेगी ने बताया कि उनकी आपत्तियों और शिकायतों के बावजूद राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की.

उन्होंने बताया, 'बैंक और राज्य सरकार के तंत्र ने पूरे घोटाले को दफन कर दिया, क्योंकि बैंक के सभी शीर्ष अधिकारी लोन की मंजूरी देने में शामिल थे. जब से मैं एनपीए का चेयरमैन बना हूं, मैं लगातार बैंक अधिकारियों से डूब चुके कर्ज की रिकवरी के लिए कह रहा हूं, लेकिन वे मेरी नहीं सुन रहे हैं, क्योंकि मेरे पास सजा देने का अधिकार नहीं है. बोर्ड में निदेशक पद पर होने के बावजूद मैं असहाय महसूस करता है, क्योंकि राज्य सरकार ने पूरे घोटाले पर आंखें मूंद रखी है.'

ये भी पढ़ें: मोसुल में 39 भारतीयों की हत्याः 2014 से थी खुफिया एजेंसियों को जानकारी, इन वजहों से नहीं हुई थी 

फर्स्टपोस्ट को मिले दस्तावेजों के मुताबिक, बैंक ने 2016-17 में कोई रिकवरी केस नहीं दायर किया. वित्त वर्ष के दौरान कुल रिकवरी महज 3.11 लाख थी. दस्तावेज के मुताबिक, 'राजस्व विभाग ने कोई वजह बताए बिना मामलों को बैंक को वापस भेज दिया. बैंक ने वापस भेजे गए मामलों पर आगे की कार्रवाई के लिए संज्ञान नहीं लिया था.' रिकवरी से जुड़े मामले निपटाने को प्राथमिकता देते हुए सहकारी समिति के रजिस्ट्रार को संबंधित स्टाफ पर दबाव बनाना चाहए,  ताकि बैंक में एनपीए के स्तर को मुनासिब सीमा के दायरे में रखा जा सके.'

कुमार ने माना कि उस खास वित्त वर्ष में रिकवरी थोड़ी सुस्त थी, लेकिन पिछले साल अप्रैल से वह बकाया लोन की रिकवरी की कोशिश कर रहे हैं और कानूनी तौर-तरीकों के जरिये डिफॉल्टर्स से निपट रहे हैं.

मुख्य बैंकिंग मकसद को नजरअंदाज करना

कोऑपरेटिव बैंकों का मुख्य मकसद ग्रामीण विकास की आर्थिक बेहतरी में कृषि क्षेत्र की मदद करना है. हालांकि, नाबार्ड ने आरोप लगाया है कि यूएससीबी ने ठीक इसका उल्टा किया. नाबार्ड की आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया कि बैंक किसानों की मदद करने में नाकाम रहा, लिहाजा उन्हें महाजनों से लोन लेने को मजबूर होना पड़ा. 21 सितंबर 2017 को राज्य सरकार को भेजे गए नोट में बैंकिंग सिस्टम के अंदर सड़ चुकी व्यवस्था के बारे में खुलासा हुआ.

रिपोर्ट में बताया गया कि 'वे शराब के ठेकों के लिए करोड़ों का कर्ज दे रहे थे, जबकि राज्य में कृषि सहकारी समितियों द्वारा किसानों को अधिकतम कर्ज देने के लिए अलग-अलग सीमा है. यह सीमा फसल लोन के लिए योग्यता के हिसाब से 50,000 रुपये से तीन लाख रुपये तक है. किसानों को तीन लाख तक के लोन पर केंद्र सरकार से ब्याज पर मिलने वाली सब्सिडी और इंसेंटिव से वंचित रहना पड़ा और उन्हें अपने कर्ज की जरूरतों के लिए सूदखोरों और अन्य संसाधनों पर निर्भर होना पड़ा.'

नाबार्ड का यह भी कहना था कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और निजी दुर्घटना बीमा योजना (एनडीए सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम) को कोऑपरेटिव बैंक द्वारा सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा था.

Salary Money Indian Currency Incentive Payment

इस सिलसिले में नाबार्ड की टीम द्वारा 31 जुलाई से 24 अगस्त 2017 के बीच जांच की गई. इस खास जांच रिपोर्ट में कहा गया, 'बैंक की जिला शाखाओं (डीसीसीबी) में कर्ज लेने वाले किसानों का कवरेज काफी खराब था. राज्य का अहम बैंक होने के कारण यह बैंक राज्य में स्कीम के अमल की निगरानी नहीं कर रहा था. साथ ही, बैंक की जिला शाखाओं से किसी भी तरह का आंकड़ा भी नहीं इकट्ठा कर रहा था. हालांकि, निजी दुर्घटना बीमा योजना सभी उधारकर्ताओं के लिए जरूरी है, लेकिन राज्य में डीसीसीबी सक्षम किसान क्रेडिट कार्ड धारकों के लिए इस स्कीम को लागू नहीं कर रहे थे.'

नाबार्ड के जांच अधिकारी जुगल किशोर ने एक गोपनीय सिफारिशी नोट में कहा कि यूएससीबी ने कर्ज के लिए मंजूरी देने में रिजर्व बैंक की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया. नोट के मुताबिक, 'बैंक ने भुगतान और निपटारा प्रणाली कानून 2007 (2007 का अधिनियम 51) की धारा 18 का उल्लंघन किया था. बैंक ने उधार सूचना कंपनी नियमन कानून, 2005 की धारा 11 (1) के प्रावधानों का पालन नहीं किया. बैंक ने उत्तराखंड सहकारी समिति नियम, 2004 के नियम 207(4) का भी पालन नहीं किया था और उसने बिना सरकारी गारंटी हासिल किए शुगर मिलों को फंड मुहैया कराया.'

नाबार्ड के एक गोपनीय नोट में एस. एन. चलिया ने कहा, 'बैंक की नियंत्रण और जांच की आंतरिक व्यवस्था कमजोर थी.' उनका यह भी कहना था कि यूएससीबी ने बैंकिंग नियमन कानून 1949 के कैश रिजर्व, सब्सिडियरी कंपनियों की प्रकृति वाली इकाइयों पर पाबंदी और रिजर्व बैंक को मासिक रिटर्न सौंपने से जुड़े प्रावधानों यानी धारा 18, 19 और 27 का पालन नहीं किया था.

इस गंदगी को कौन साफ करेगा?

नाबार्ड की एक चिट्ठी में कहा गया: 'यूएससीबी बोर्ड ने अपने 3 मई 2017 के प्रस्ताव संख्या 24(27) के जरिये बोर्ड सदस्यों से इतर विभिन्न कमेटियों का गठन किया था, जिनके कामकाज और अधिकारों के बारे में नहीं बताया गया था. जानकारी की कमी, सदस्यों के पास अनुभव का अभाव और कमेटियों के कामकाज और जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी नहीं होने के कारण ये कमेटियां असरदार तरीके से काम करने में नाकाम रहीं. बोर्ड ने एचओ लोन कमेटी, ब्रांच लोन कमेटी जैसी कई लोन कमेटियां बनाई थी और इनके सदस्य के तौर पर इसके एक डायरेक्टर सीधे तौर पर बैंक के कामकाज में रोजाना दखल दे रहे थे.'

नाबार्ड के एक सीनियर अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर बताया कि यूएससीबी में गंदगी को साफ करने और सहकारी नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को आगे आना पड़ा. यूएससीबी के कामकाज की निगरानी करने वाले उत्तराखंड सहकारी समिति के रजिस्ट्रार ने बताया कि वह अनियमितताओं की जांच कर रहे हैं और जल्द सख्त कार्रवाई करेंगे. मौजूदा रजिस्ट्रार बी. एम. मिश्रा ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि शराब के ठेके और अधिकारियों के रिश्तेदारों को  दिए गए लोन व एनपीए के बार में पता लगाने के लिए विभिन्न स्तरों पर जांच की जा रही है.

उन्होंने कहा, 'कुछ मामलों में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मैंने पहले ही राज्य सरकार से सिफारिश कर दी है. अंतिम रिपोर्ट आने के बाद हम बाकी मामलों में कार्रवाई करेंगे.'

इस पूरे घोटाले में एक और दिलचस्प मोड़ है. जो नाबार्ड टीम 31 जुलाई 2017 से 14 अगस्त 2017 के दौरान यूएसबीसी के बही-खातों की पड़ताल के लिए गई थी, उसे 19 अगस्त को धमकी भरी गुमनाम चिट्ठी मिली. हिंदी में लिखी गई इस चिट्ठी को फर्स्टपोस्ट ने भी देखा है. इसमें संदेश भेजने वाले ने नाबार्ड के अधिकारियों को चेतावनी दी कि यूएसबीसी के बारे में प्रतिकूल रिपोर्ट आने पर उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकते हैं. इसके बाद नाबार्ड ने राज्य सरकार को नवंबर 2017 में भेजे नोट में कहा था, 'धमकी वाली चिट्ठी के कारण कोऑपरेटिव बैंक की जांच के दौरान टीम की सुरक्षा को लेकर काफी तनाव और चिंता का माहौल रहा.'

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi