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नवरात्र स्पेशल: नाज़नीन अंसारी, सिस्टर मरिओला और मुमताज़ काज़ी को सलाम

नारी शक्ति किसी एक धर्म के अध्यायों के पन्नों में सिमट कर नहीं रह सकती.

Updated On: Sep 20, 2017 08:36 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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नवरात्र स्पेशल: नाज़नीन अंसारी, सिस्टर मरिओला और मुमताज़ काज़ी को सलाम

( नवरात्र के मौके पर नवरात्र की पूजा विधि बताने या देवी की प्रार्थना के बजाय आपको मिला रहे हैं कुछ जागृत देवियों से, इन महिलाओं ने ऐसा कुछ किया है कि जो जीवन में शक्ति की मिसाल बनी हैं )

नारी शक्ति किसी एक धर्म के अध्याय के पन्नों में सिमट कर नहीं रह सकती. अलग अलग चेहरे आज के दौर में एक मिसाल बन चुके हैं. कोई सांप्रदायिक बेड़ियों को तोड़कर आपसी भाईचारे को मजबूत करने में जुटी है तो कोई सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ कर देश की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर का तमगा हासिल कर चुकी है, तो कोई जेल में बंद महिलाओं के पुनर्वास के लिये अपनी जिंदगी समर्पित कर चुकी है.

नाज़नीन अंसारी ने कायम की नजीर

बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब में अमन का रस घोलता एक नाम है नाज़नीन अंसारी. धर्म और मजहब की खिड़कियों से बाहर झांकती सोच नाज़नीन की पूरी कहानी बयां करती है. जिस्म पर बुर्का, मजहब इस्लाम लेकिन जुबां पर राम का नाम. नाजनीन अंसारी रामचरित मानस का उर्दू में अनुवाद कर रही हैं. हिंदू धर्म के प्रति उनका सम्मान मंदिर-मस्जिद के बीच के फर्क को मिटाने का काम करता है. नाज़नीन अंसारी अब तक हनुमान चालीसा और दुर्गा चालीसा का उर्दू में अनुवाद कर चुकी हैं.

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बनारस में संकटमोचन ब्लास्ट के बाद सांप्रदायक सौहार्द बिगड़ने लगा था. उस वक्त नाजनीन ने अमन और भाईचारे के लिये सबसे मुश्किल भरा फैसला किया. उन्होंने रामकथा को मुस्लिम समुदाय को समझाने के लिये रामचरित मानस के उर्दू अनुवाद की शुरुआत की. नाजनीन का मानना है कि राम के खिलाफ पूरे देश में बोलने वालों को ये समझाने की जरूरत है कि श्रीराम हमारे पूर्वज थे. मुल्क में उस बहस को नाज़नीन ने बेमानी साबित कर दिया जहां लोग कहते हैं कि राम किसके हैं या राम मेरे हैं.

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मजहब से ऊपर उठकर मुस्लिम विद्वानों ने हिंदू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया था. नकीब खान, कदीर बंदायुनी, अबुल फज़ल जैसे इतिहासकारों की कोशिश थी हिंदू धर्म के सनातन होने की खासियत सभी धर्मों को मालूम होनी चाहिए. अब नाज़नीन भी वही नजीर पेश कर रही हैं.

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नाज़नीन धर्मांतरण के खिलाफ हैं. उनका मकसद सांप्रदायिक एकता को बढ़ाना है तो साथ ही वो गरीब मुस्लिम महिलाओं की तालीम के लिये भी कोशिश कर रही हैं.

नाज़नीन ने अपने बचपन को गरीबी में बिखरते देखा था. गुर्बत के दौर की वजह से पढ़ाई तक छोड़नी पड़ गई थी. लेकिन अब नाज़नीन गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं. वो चाहती हैं कि उनके पढ़ाए हुए बच्चे राष्ट्रवादी बनें.

अजमेर की सिस्टर मरिओला सिक्वेरा

नारी शक्ति का दूसरा रूप सिस्टर मरिओला सिक्वेरा की कहानी में दिखाई देता है. अजमेर की महिला जेल में बंद कैदियों के पुनर्वास के लिये सिस्टर मरिओला ने अपनी जिंदगी नाम कर दी. पिछले 20 साल से सिस्टर मरिओला जेल में बंद उन महिला कैदियों की मदद करती हैं जिनकी जिंदगी में दूर दूर तक अंधेरा है.

दरअसल कई महिला कैदी बिना किसी जुर्म के उम्रकैद काट रही होती हैं क्योंकि  पैसे के अभाव के चलते वो खुद को बेकसूर साबित करने के लिये कानूनी मदद नहीं ले पाती हैं. तो वहीं कई महिला कैदी सजा पूरा करने के बावजूद जेल में बंद रहने को मजबूर होती हैं. ऐसी तमाम महिला कैदियों के लिये सिस्टर मरिओला उम्मीद की किरण हैं.

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सिस्टर मरिओला सप्ताह में एक बार जेल में बंद कैदियों से मिलती हैं. पीड़ित महिला कैदियों को फास्ट ट्रैक से न्याय दिलवाने में मदद करती हैं. महिला कैदियों के लिये वकीलों को मुहैया कराती हैं.

सिस्टर मरिओला का जन्म मुंबई में हुआ था. लेकिन बाद में परिवार गोवा में बस गया. सिस्टर मरिओला को समाजसेवा की प्रेरणा अपनी मां और पिता से मिली. बचपन से ही उन्होंने घर में दूसरों की मदद करने का माहौल पाया.

छह भाई बहनों के परिवार में सिस्टर मरिओला ने नन बनने का फैसला किया और दूसरों की मदद को ही अपना मकसद बना लिया. 1979 में अजमेर आने के बाद वो सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं.

1997 में सिस्टर मरिओला ने अजमेर के सोफिया कॉलेज में पढ़ाना शुरु किया. सोफिया कॉलेज से ही अजमेर की महिला जेल की दीवार सटी हुई है. बाइबिल पढ़ते वक्त सिस्टर मरिओला के जेहन में हमेशा जेल में बंद लोगों की तकलीफ और मदद का ख्याल आता था.

एक दिन उन्होंने जेल का दौरा किया और वहां के कैदियों की तकलीफ जानी. उसके बाद उन्होंने न सिर्फ महिला कैदियों को इंसाफ दिलाया बल्कि पेपर बैग्स बनाकर रोजगार का मौका भी दिया. पिछले 20 साल से सिस्टर मरिओला लगातार महिला कैदियों की मदद कर रही हैं.

महिला कैदियों के प्रति योगदान की वजह से सिस्टर मरिओला को राष्ट्रपति ने ‘श्री शक्ति अवार्ड’ और रिलायंस फाउन्डेशन ने ‘रीयल हीरोज़ अवार्ड’ से सम्मानित किया.

मुंबई की 'मोटर वूमन' मुमताज़ काज़ी

मुंबई की लाइफलाइन कहलाने वाली लोकल ट्रेनों पर रोजाना हजारों मुसाफिर सफर करते हैं. मुसाफिरों को सुरक्षित उनकी मंजिल पर पहुंचाने का काम करती हैं मुमताज़ काज़ी. एशिया की पहली महिला ड्राइवर हैं मुमताज़ जो डीजल और इलेक्ट्रॉनिक ट्रेनें चलाती हैं.

साल 1991 में वो डीजल असिस्टेंट ड्राइवर बनी थीं. साल 2001 में डीजल विज़ ड्राइवर और फिर उसके बाद मोटरमैन बनीं. 44 साल की मुमताज के पास मुंबई लोकल चलाने का 25 साल का लंबा अनुभव है.

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महिलाओं के लिये नामुमकिन से दिखने वाले पेश को मुमताज ने बतौर चुनौती मंजूर किया. हालांकि उनके फैसले का शुरुआत में घर में विरोध भी हुआ था. लेकिन बाद में पूरे परिवार ने मुमताज की करियर बनाने में मदद की. मुमताज के इस पेशे में उनके पति भी उनका पूरा सहयोग देते हैं. घर परिवार की जिम्मेदारियों के साथ नौकरी के दायित्व को वो बखूबी निभा रही हैं.

सौ किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाने वाली मुमताज अपनी ड्राइविंग को लेकर पूरी तरह चौकस रहती हैं. एक एक सिगनल का सतर्कता से ख्याल रखती हैं. आजतक उनकी ड्राइविंग में कोई दुर्घटना नहीं घटी है.

पारिवार की रूढ़िवादी मानसिकता से अलग सोचते हुए मुमताज ने अपना अलग मुकाम बनाया. आज उनकी वजह से दूसरे परिवारों से भी लड़कियां इस पेशे की तरफ आकर्षित हुई हैं. मुंबई की इस ‘मोटर वूमन’ को लिम्का बुक ऑफ अवार्ड्स से सम्मानित किया गया है.

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