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नेशनल प्रेस डे के दिन राजस्थान पत्रिका ने खाली छोड़ा संपादकीय कॉलम

संपादकीय पेज देखने वाले स्टाफ ने कहा कि संपादकीय कॉलम खाली छोड़ना अध्यादेश का विरोध करने और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अखबार के संकल्प को व्यक्त करने का तरीका था

FP Staff Updated On: Nov 17, 2017 07:39 PM IST

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नेशनल प्रेस डे के दिन राजस्थान पत्रिका ने खाली छोड़ा संपादकीय कॉलम

प्रमुख हिंदी अखबार राजस्थान पत्रिका ने राष्ट्रीय प्रेस दिवस के दिन यानी गुरुवार को वसुंधरा सरकार की उन ऑर्डिनेंस के विरोध में अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिया जो मीडिया पर पाबंदी लगाता है और राज्य के लोक सेवकों को संरक्षण देता है. राष्ट्रीय प्रेस दिवस,  देश में स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता के तौर पर मनाया जाता है. जयपुर स्थित इस न्यूजपेपर ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बहिष्कार की भी घोषणा की थी.

6 सितंबर को क्रिमिनल लॉ (राजस्थान संशोधन) ऑर्डिनेंस- 2017, को प्रस्तुत किया गया था. इन ऑर्डिनेंस के माध्यम से रिटायर्ड और कार्यरत जस्टिस, मजिस्ट्रेटों और पब्लिक सर्वेन्ट के खिलाफ ड्यूटी के दौरान किसी कार्रवाई को लेकर सरकार की पूर्व अनुमति के बिना उन्हें जांच से संरक्षण मिलेगा. इसके साथ ही बिना अमुमति के ऐसे मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग से भी रोकता है.

अधिकारियों को दी गई व्यापक शक्तियों के खिलाफ विरोध दर्ज करते हुए राजस्थान पत्रिका एडिटर इन चीफ गुलाब कोठारी ने खाली छोड़े गए संपादकीय में लिखा 'आज यानी राष्ट्रीय प्रेस दिवस यानी स्वतंत्र और उत्तरदायित्वपूर्ण पत्रकारिता का दिन है. लेकिन राजस्थान में राज्य सरकार द्वारा बनाए गए काले कानून से यह खतरे में है. संपादकीय खाली छोड़कर हम लोकतंत्र के हत्यारे ‘काले कानून’ का पूर्ण मनोयोग से विरोध करते हैं.'

वसुंधरा के अध्यादेश के विरोध में खाली छोड़ा कॉलम

द हिन्दू के खबर के मुताबिक अखबार ने 1 नवंबर को अखबार ने जब वसुंधरा के बहिष्कार की बात कही तब उसने अखबार के फ्रंट पेज पर ‘जब तक काला, तब तक ताला’ हेडलाइन से एक संपादकीय प्रकाशित किया था, जो अभी भी रोज प्रकाशित हो रहा है. ‘ताला’ में कहा गया है कि इस मुद्दे में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोगों की आवाज की सर्वोच्चता शामिल है.

संपादकीय पेज देखने वाले स्टाफ ने कहा कि संपादकीय कॉलम खाली छोड़ना अध्यादेश का विरोध करने और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अखबार के संकल्प को व्यक्त करने का तरीका था. उन्होंने कहा कि इसके अलावा इस मुद्दे से जुड़े ओपिनियन, पाठकों के पत्र और लेख नियमित रूप प्रकाशित किए जा रहे हैं.

इस अध्यादेश को बदलने पर पुनर्विचार के लिए 23 अक्टूबर को विधानसभा में विधेयक पेश किया गया जो सदन की एक चयन समिति के पास है. हालांकि अध्यादेश अब भी लागू है.

राजस्थान उच्च न्यायालय के जोधपुर और जयपुर खंडपीठों ने अध्यादेश को चुनौती देने वाली आठ रिट याचिकाओं पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किए हैं. हालांकि राज्य सरकार ने अभी तक अदालत में अपना जवाब नहीं दिया है.

अखबार के एडिटर इन चीफ गुलाब कोठारी ने कहा था कि जिस तरह से विधेयक को विधानसभा में पेश किया गया था और सेलेक्ट पैनल को रेफर किया गया वह बिल्कुल गलत था और अधिनायकवादी नियम के तहत लोकतंत्र पर प्रभुत्व हासिल करने की कोशिश की तरह था.

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