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वैदिक ब्राह्मण, सिंधी और कोडावा समुदाय को नहीं मिलेगा माइनॉरिटी दर्जा

नेशनल माइनॉरिटी कमीशन ने यह बात 2016-17 के अपने वार्षिक रिपोर्ट में कही है, जिसे अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है

Updated On: Feb 07, 2018 05:49 PM IST

FP Staff

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वैदिक ब्राह्मण, सिंधी और कोडावा समुदाय को नहीं मिलेगा माइनॉरिटी दर्जा

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने वैदिक ब्राह्मणों, सिंधियों और कोडावा समुदाय द्वारा माइनॉरिटी दर्जे की मांग को खारिज कर दिया है. आयोग ने कहा है कि इन्हें मान्यता देने से हिंदू समुदाय में ‘विभाजन’ पैदा हो सकता है.

नेशनल माइनॉरिटी कमीशन ने यह बात 2016-17 के अपने वार्षिक रिपोर्ट में कही है, जिसे अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है.

न्यूज18 को मिली इस रिपोर्ट की कॉपी के अनुसार कमीशन ने कहा है कि वैदिक ब्राह्मण हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं. केवल वेदिक ब्राह्मणों में केवल कुछ चुनिंदा लोग ही यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें भारत सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में घोषित किया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट को नेशनल माइनॉरिटी कमीशन के दो अध्यक्षों द्वारा देखा गया है. पहले नसीम अहमद द्वारा और फिर मौजूदा अध्यक्ष गयोरुल हसन रिजवी ने इसे रिपोर्ट को देखा है.

वैदिक ब्राह्मणों को माइनॉरिटी स्टेट्स देने की मांग विश्व ब्राह्मण सभा और पूर्वोत्तर बहुभाषीय ब्राह्मण महासभा द्वारा की गई थी.

नेशनल माइनॉरिटी कमीशन एक्ट 1992 के अनुसार माइनॉरिटी शब्द का अर्थ केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित समुदाय से है.

इस वजह से हुई इनकी मांग खारिज

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वैदिक ब्राह्मण इस आधार पर माइनॉरिटी दर्जे की मांग नहीं कर सकते कि यूनेस्को ने वेद और वैदिक संस्कृति की रक्षा करने की बात कही है. वैदिक ब्राह्मणों का कहना था कि वे वेद और वैदिक संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं इस वजह से उन्हें माइनॉरिटी का दर्जा मिलना चाहिए. कमीशन ने कहा कि अगर हम यह मांग स्वीकार कर लें तो इसी आधार पर राजपूत, वैश्य जैसी अन्य जातियां भी माइनॉरिटी दर्जे की मांग करने लगेंगी, जिससे हिंदू समुदाय में विभाजन पैदा हो जाएगा.

सिंधियों के बारे में कमीशन ने कहा कि सिंधी भाषा के आधार पर माइनॉरिटी दर्जे की मांग कर रहे हैं. वे यह नहीं दावा कर रहे हैं कि देशभर में फैले सिंधी हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं हैं. जबकि नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एक्ट, 1992 केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में दिशा-निर्देश देता है. इस वजह से कमीशन को सिंधी समुदाय द्वारा माइनॉरिटी दर्जे की मांग में कोई दम नजर नहीं आया.

इसी तरह कोडावा जाति द्वारा माइनॉरिटी दर्जे की मांग को खारिज करते हुए कमीशन ने कहा कि इस मांग से हिंदू समुदाय में बेवजह विभाजन पैदा हो सकता है.

कमीशन ने इन मामलों में अपना पक्ष रखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2005 में बाल पाटिल बनाम भारत सरकार के फैसले को उद्धृत किया है. इस केस में कोर्ट ने कहा कि भारत में 1956 में ही भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो चुका है. यह समझ में आता है कि किसी राज्य में भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो सकता है लेकिन अगर यह विचार कि इन्हें धार्मिक अल्पसंख्यकों की ही तरह दर्जा दिया जाए तो इससे देश में विभाजन का खतरा पैदा हो जाएगा क्योंकि हमारा देश कई तरह की विविधताओं वाला है और ऐसे फैसलों से विशेष दर्जा देने की मांग में तेजी आएगी.

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