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नरोदा पाटिया केस: गुजरात हाईकोर्ट ने दोषियों को सुनाई 10 साल की कड़ी सजा

2002 नरोदा पाटिया मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सजा सुनाई है, दोषियों पर एक हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है

FP Staff Updated On: Jun 25, 2018 01:09 PM IST

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नरोदा पाटिया केस: गुजरात हाईकोर्ट ने दोषियों को सुनाई 10 साल की कड़ी सजा

2002 नरोदा पाटिया मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सजा सुनाई है. उमेश भरवाद, पदमेंद्र सिंह राजपूत और राजकुमार चौमल को कोर्ट ने 10 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है. दोषियों पर एक हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है.

बता दें कि गुजरात के नरोदा पाटिया दंगा मामले में मुख्य आरोपी बनाई गईं गुजरात की पूर्व बीजेपी मंत्री माया कोडनानी समेत 17 अन्य को बरी कर दिया था. जबकि इसी मामले में बाबू बजरंगी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया था. बजरंग दल के पूर्व नेता बाबू बजरंगी समेत 13 लोगों को कोर्ट ने दोषी माना था. निचली अदालत द्वारा बरी किए गए 3 अन्य लोगों को भी हाईकोर्ट ने दोषी करार दिया था. माया कोडनानी को वर्ष 2008 में एसआईटी ने ही पहली बार आरोपी बनाया था.

इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने विशेष जांच दल (एसआईटी) को फटकार लगाई थी. कोर्ट ने कहा था कि एसआईटी की जांच में कई खामियां हैं. जस्टिस हर्षा देवानी और जस्टिस ए एस सुपेहिया की खंडपीठ ने कहा था कि एसआईटी ने जो जांच की है उस पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता. बता दें कि दंगों की जांच के लिए वर्ष 2008 में एसआईटी का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर किया गया था.

क्या है यह पूरा मामला?

फरवरी-मार्च 2002 में गोधरा दंगे के बाद भड़की हिंसा में 97 मुस्लिमों को मार दिया गया था. नरोदा पाटिया दंगा मामला इसी सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा है.

नरोदा पाटिया में लगभग 10 घंटे तक चले नरसंहार में हिंसक भीड़ ने लूटपाट, चाकूबाजी, बलात्कार, हत्या और लोगों को जिंदा जलाने जैसे अपराध किए. इस घटना के बाद पूरे इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया था और सेना बुला ली गई थी. नरोदा का मामला 2002 के गुजरात दंगों का सबसे बड़ा कत्लेआम था, जिसमें सबसे अधिक लोगों की मौत हुई थी.

जनसंहार में बच गए सैकड़ों लोग बेघर हो गए, कई लोगों के यहां कोई कमाने वाला नहीं बचा था और कई बच्चे अनाथ हो गए. कई धार्मिक इमारतों को भी नुकसान पहुंचा था और शिक्षा व्यवस्था पर भी असर पड़ा. हालात को देखते हुए उस वक्त की परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं थी.

दंगों के बाद राज्य पुलिस और सरकार पर कई तरह के आरोप लगाए गए. कहा गया कि सरकारी अधिकारियों और पुलिस अफसरों की दंगों में मिलीभगत थी. हालांकि एक विशेष जांच टीम ने अपनी जांच में इन आरोपों को खारिज कर दिया. केस पर शुरुआती रिपोर्ट फाइल कर गुजरात पुलिस ने 46 लोगों को आरोपी बताया लेकिन स्पेशल कोर्ट ने इस पर भरोसा करने से इनकार कर दिया.

इसके बाद 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने एक एसआईटी का गठन किया जिसने 2009 में अपनी रिपोर्ट में 70 लोगों को आरोपी बताया. इनमें से 61 लोगों पर आरोप लगाया गया. 2012 में स्पेशल कोर्ट ने 32 लोगों को दोषी बताते हुए 29 अन्य को बरी कर दिया. इन 32 लोगों में पूर्व मंत्री माया कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी शामिल थे. माया को 28 साल जेल और बजरंगी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई.

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