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पीएम मोदी का भाषण किसी कॉरपोरेट जगत के महत्वाकांक्षी सीईओ जैसा था

जिन मुद्दों पर पीएम ने बात नहीं की, वो भविष्य में उनकी सरकार के लिए बड़ी समस्या बन सकते हैं

Updated On: Aug 17, 2017 01:46 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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पीएम मोदी का भाषण किसी कॉरपोरेट जगत के महत्वाकांक्षी सीईओ जैसा था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस साल के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में लगभग सभी जरूरी बातें मौजूद थीं. उनका भाषण कुछ ऐसा था कि जैसे कॉरपोरेट जगत का कोई समझदार और महत्वाकांक्षी सीईओ अपनी अब तक की उपलब्धियों को गिना रहा हो.

नाकामियों के लिए मोदी ने अप्रत्यक्ष तौर पर पिछली सरकार की नीतियों पर दोष मढ़ा, साथ ही बताया कि, उनकी सरकार ने कैसे बेहतर काम किया. मोदी ने भविष्य की योजनाएं और लक्ष्य भी गिनाए और बताया कि आने वाले वर्षों में आखिर क्यों केंद्र में उनकी ही पार्टी और सहयोगियों का शासन होना चाहिए.

'न्यू इंडिया 2022' के अपने विजन को देशवासियों के सामने रख कर मोदी ने अगले लोकसभा चुनाव में फिर से अपनी जीत को सुनिश्चित करने की अच्छी कोशिश की.

एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की शहरी आबादी और ग्रामीण जनता से जुड़ने और उसे समझाने के लिए मोदी ने सही मौका और अनुकूल समय चुना जिसमें वो काफी हद तक कामयाब भी हुए. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 2018 के बारे में एक रहस्यमय पहलू भी जोड़ा. उन्होंने कहा कि, '1 जनवरी 2018 का दिन सामान्य दिनों जैसा नहीं होगा, 21वीं सदी में पैदा हुए लोगों के लिए ये तारीख उनकी जिंदगी में बहुत कुछ तय करेगी.'

लाल किले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो-पीटीआई)

लाल किले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो-पीटीआई)

अपने करीब एक घंटे लंबे भाषण में मोदी ने एनडीए सरकार के पिछले तीन सालों के लगभग हर क्रिया-कलाप और योजनाओं को गिनाया, इनमें ग्रामीण भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए किए गए प्रयास, बड़ी आर्थिक पहल जैसे जीएसटी और नोटबंदी, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम, कालेधन को वापस लाने की कोशिशें, सीमाओं पर सुरक्षा की चुनौतियां, सरकार की तैयारियां और गोरखपुर त्रासदी जैसे मु्द्दे भी शामिल थे.

केंद्र की सत्ता पर काबिज मोदी के लिए उनके तीन साल का कार्यकाल काफी महत्वपूर्ण रहा है. उन्होंने अपनी जबरदस्त रणनीति और पुख्ता प्लान के जरिए मैदान मारा. मोदी के शासन संभालने के बाद से यूपीए सरकार के दौरान देश पर छाए कई संकट खत्म हो गए हैं. भ्रष्टाचार के मामलों और घोटालों पर लगाम लगी है, दीर्घकालीन नीतिगत अक्षमता खत्म हुई है, दूरदर्शिता का अभाव नहीं रहा है, वहीं आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी अब अतीत की बात बनकर रह गई है.

मोदी और उनके मंत्रियों के खिलाफ अबतक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा है. सभी नौकरशाह जिम्मेदारी से अपना काम कर रहे हैं, सरकारी दफ्तरों में कामचोरी और आलस का माहौल खत्म हो गया है.

मोदी सरकार ने बड़े आर्थिक सुधार जैसे जीएसटी और दिवालिया कानून की शुरूआत की, सब्सिडी के उचित वितरण और टैक्स आधार को व्यापक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर आधार लिंकेज प्रोग्राम भी चलाया. वहीं ग्रामीण इलाकों के बुनियादी ढांचे में सुधार पर खास जोर दिया गया, बैंकों का कर्ज न चुकाने वालों और समानांतर अर्थव्यवस्था चलाने वालों को चेतावनी दी गई और उनपर निगरानी तंत्र तैनात किया गया.

बेशक, इन सभी उपलब्धियों के लिए सरकार को श्रेय दिया जाना चाहिए. ये वो कदम हैं जिनकी देश को सख्त जरूरत थी. हालांकि, इन सभी उपलब्धियों के बावजूद सरकार के लिए ये समय आत्म निरीक्षण कर अपनी दिशा-दशा में सुधार के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है. लेकिन मोदी के भाषण में इसकी जरा सी भी झलक नहीं मिली, कई गंभीर मुद्दों पर उन्होंने चुप्पी साधे रखी.

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अपने वादे के बावजूद, मोदी सरकार अपने शासन के तीन सालों में बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा करने में नाकाम रही है. देश में बेरोजगारों की तादाद बढ़ रही है, हर साल लाखों लोग नौकरी और मजदूरी की तलाश में सामने आ रहे हैं. ये एक बड़ा और अहम सवाल है, आगे बढ़ने से पहले सरकार को इसका जवाब देना ही होगा.

मोदी ने अपने भाषण में उन योजनाओं का जिक्र किया, जो उनकी सरकार ने रोजगार पैदा करने के लिए शुरू की हैं. जैसे छोटे उद्यमियों को फ्री लोन की पेशकश. लेकिन आंकड़े हमें बताते हैं कि मोदी शासन के तीन सालों में, बेरोजगारी की दर बेतहाशा बढ़ी है. मोदी के सत्ता संभालने से एक साल पहले 2013-14 में देश में बेरोजगारी की दर 4.9 फीसदी थी, लेकिन साल 2015-16 के दौरान इसमें 5 फीसदी का इजाफा हुआ है.

अस्थायी मजदूरी और अस्थायी मजदूरों के रोजगार के स्वरूप में बदलाव भी चिंता का विषय बन गया है, 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी इस बात का उल्लेख किया गया है.

'भारत में रोजगार अपनी संरचना के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती है, जो कि अनौपचारिक और असंगठित है, और इसमें मौसमी मजदूरों का वर्चस्व है. हुनर का अभाव होने की वजह से बड़ी तादाद में बेरोजगारी है, बाजार पर कठोर श्रम कानूनों का बुरा प्रभाव पड़ रहा है, जिससे बंधुआ मजदूरी बढ़ रही है.'

अपने कार्यकाल के आखिरी साल मोदी के सामने नौकरियां पैदा करने की एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि तबतक नौकरियों की मांग करते लाखों और युवा सामने आ जाएंगे. फिलहाल दीन दयाल अंत्योदय योजना, नेशनल अर्बन लाइवलीहुड मिशन और मुद्रा लोन जैसी योजनाएं जरूरत के मुताबिक नौकरियां और रोजगार पैदा करने में नाकाफी साबित हुई हैं.

वहीं एनपीए की समस्या के मामले में एनडीए सरकार समय रहते जागरुक नहीं हो पाई है. सरकार के वर्चस्व वाली बैंकिंग इंडस्ट्री की हालत इनदिनों काफी गंभीर है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) को अक्षमताओं और पूंजीगत झटके से बचाने के दीर्घकालिक उपायों पर अभीतक काम नहीं किया है.

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 2015 में बेड लोन क्लीन अप नाम से एक अभियान चलाया था, जिसका बाद में मोदी सरकार ने समर्थन किया और इसी के तहत बैंकरप्सी यानी दिवालियापन कानून लागू किया गया.

लेकिन ये सब काफी देर से हुआ क्योंकि बैंकिंग सेक्टर को बेड लोन यानी खराब ऋण की समस्या को हल करने के लिए अभी भी लंबा वक्त लगेगा. हठधर्मी बकाएदार और प्रमोटर इन बैंकों की सबसे बड़ी समस्याएं हैं, जिनके पास भुगतान करने की क्षमता तो है लेकिन इच्छा नहीं. जैसा कि पीटीआई की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि, पीएसबी ने बकाया ऋणों में 20 फीसदी के इजाफे की सूचना दी है. ये इजाफा करीब 9 हजार हठधर्मी बकाएदारों की वजह से हुआ है. इन लोगों पर इस साल मार्च के अंत तक 92 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बकाया था.

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[साभार पीटीआई]
जाहिर है, मोदी सरकार ने इस समस्या को समझने और इसे स्वीकार करने में तत्परता नहीं दिखाई और न ही इन बैंकों के फिर से पूंजीकरण का रास्ता साफ करने की ओर कोई कदम उठाया. यहां तक कि बैंकिंग क्षेत्र में निजीकरण पर जोर के लिए भी अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है.

इस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था में एनपीए समस्या एक प्रमुख अवरोध बनी हुई है, क्योंकि बैंकों के पास उत्पादक क्षेत्रों को बड़ा कर्ज देने की क्षमता सीमित हो गई है. शीर्ष रेटिंग वाली कंपनियों को छोड़कर बैंक बाकी किसी कंपनी के लिए जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं. किसी अर्थव्यवस्था की सेहत अनिवार्य रूप से उसके बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी होती है. इसका सबूत हाल की दीर्घ-आर्थिक संख्याओं की एक श्रृंखला में दिखाई दे रहा है. इस मुद्दे पर भी मोदी काफी हद तक चुप थे.

मोदी ने अपने भाषण में आंकड़े पेश करते हुए कहा कि सरकार ने तीन साल में 1.25 लाख करोड़ रुपए का काला धन जब्त किया है. मोदी ने ये भी कहा कि 3 लाख करोड़ रुपए जो कि पहले कभी बैंकों तक नहीं पहुंचे थे वो नोटबंदी अभियान के बाद उजागर हुए.

लेकिन इन आंकड़ों को तब तक आधिकारिक नहीं माना जा सकता जब तक सरकार उनसे जुड़े तथ्य सार्वजनिक नहीं करती. सरकार को बताना होगा कि नोटबंदी के दौरान इस कालेधन को कैसे पकड़ा गया और ये कालाधन किस-किस का है.

नोटबंदी के दौरान जब्त की गई सारी राशि अगर काला धन है और इसमें से करदाताओं को उनका हिस्सा मिलता है. तो ये वाकई एक अच्छी खबर है. नोटबंदी ने यकीनन टैक्स आधार को फैलाने में खासी मदद की है साथ ही इसने बैंकों के काउंटरों को डिपोजिट के जरिए कैश धनराशि से पाट दिया. लेकिन इस कवायद से सरकारी खजाने को कितना फायदा हुआ, इस बात पर संदेह अब भी बरकरार है.

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वास्तव में नोटबंदी की एक प्रमुख वजह ये है कि, आरबीआई ने पिछले साल के अपने आधेे से भी कम लाभांश को इस साल सरकार को हस्तांतरित कर दिया था. नोटबंदी के बाद बैंकों के पास कितनी करेंसी वापस आई इस पर भी अभी तक रहस्य बना हुआ है, हालांकि नोटबंदी की घोषणा को अबतक 8 महीने बीत चुके हैं.

संक्षेप में कहा जाए तो, स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का ये एक विशिष्ट भाषण था. उनके द्वारा गिनाई गईं उपलब्धियों ने हमें सरकार की पिछले तीन साल कार्यप्रणाली की झलक दी जोकि काफी उत्साहजनक है.

हालांकि, जिन मुद्दों पर उन्होंने बात नहीं की, वो भविष्य में उनकी सरकार के लिए बड़ी समस्या बन सकते हैं. इनमें नौकरियों और रोजगार के नए अवसर पैदा करना, और विकास की गति के लिए लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के मुद्दे शामिल हैं.

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