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स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से एक झटके में नरेंद्र मोदी ने पटेल को अपना बना लिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जिस सबसे ऊंची मूर्ति का बुधवार को अनावरण किया, उसकी बुनियाद उन्होंने 31 अक्टूबर 2013 को रखी थी. उस वक्त मोदी गुजरात के सीएम हुआ करते थे.

Updated On: Nov 01, 2018 12:54 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से एक झटके में नरेंद्र मोदी ने पटेल को अपना बना लिया
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जिस सबसे ऊंची मूर्ति का बुधवार को अनावरण किया, उसकी बुनियाद उन्होंने 31 अक्टूबर 2013 को रखी थी. उस वक्त मोदी गुजरात के सीएम हुआ करते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी हमेशा पटेल की इस प्रस्तावित मूर्ति की एक प्रतिकृति अपने दफ्तर की टेबल पर रखा करते थे.

जब वो अपने ऑफिस में विदेशी मेहमानों की मेजबानी करते थे, तब मोदी इस विशाल प्रोजेक्ट की अहमियत को भी अपने मेहमानों को तफ्सील से बताते थे. बल्कि उन्होंने कई मेहमानों को तो इस मूर्ति की प्रतिकृतियां तोहफे में भी दी थीं.

मूर्तिकला सिर्फ कला का एक रूप भर नहीं है. बल्कि ये राजनीति का भी अहम हिस्सा है. पांच बरस बाद प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति राष्ट्र को समर्पित की. इस के साथ ही उन्होंने बुनियादी तौर पर कांग्रेस के महानायक रहे सरदार पटेल को बीजेपी का बना दिया. जिस पटेल को कांग्रेस ने भुला दिया था, उन पर मोदी ने आने वाले इतिहास को बताने के लिए, अपना और अपनी पार्टी का हक जमा लिया.

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

मोदी ने ये सुनिश्चित किया कि पटेल की विशाल मूर्ति लगाने की इस महात्वाकांक्षी परियोजना में पूरा देश उनके साथ भागीदार बने. उन्होंने देश के हर कोने में रहने वाले लोगों से जज्बाती तौर पर इस प्रतिमा के निर्माण में भागीदार बनने की अपील की. विशाल मूर्ति बनाने के पहले चरण में उन्होंने हर गांव से मूर्ति बनाने के लिए खेती में काम आने वाले औजार दान करने की अपील की, ताकि उन्हें गलाकर मूर्ति बनाने के लिए लोहा जुटाया जा सके.

मोदी की इस मुहिम ने बीजेपी कार्यकर्ताओं ही नहीं, दूसरे राष्ट्रवादी संगठनों में भी नई ऊर्जा का संचार कर दिया. इस अभियान को एक 'ऐतिहासिक गलती' को दूर करने करने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया. वो गलती जो कांग्रेस ने वंशवादी राजनीति के चलते की थी. जिसकी वजह से पार्टी एक परिवार के दायरे से इतर नहीं देख पाई.

इस में कोई शक नहीं कि मोदी ने सरदार पटेल की 143वीं सालगिरह पर, गुजरात के सरदार सरोवर बांध के प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाली केवड़िया कॉलोनी में स्थित जो स्टैच्यू ऑफ यूनिटी देश को समर्पित की, वो विशालता के पैमाने पर दुनिया में अव्वल दर्जे पर आती है. आम जनमानस में ये प्रतिमा सरदार पटेल की अमिट छाप छोड़ेगी.

लोगों को इस मूर्ति की वजह से यकीन होगा कि इस महानायक ने भी राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया, मगर जिसके योगदान को उसकी अपनी पार्टी ने अनदेखा कर दिया. सत्ता के लालची कुछ लोगों ने उस पार्टी की विरासत पर कब्जा कर लिया. इस प्रतिमा के निर्माण में तमाम गांवों और सभी नागरिकों के योगदान का रिकॉर्ड एक टैबलेट में रखा गया है, जो भविष्य के इतिहासकारों के काम आएगा.

मोदी और बीजेपी को इस बात का श्रेय तो मिलना चाहिए कि उन्होंने आजादी की लड़ाई के एक महानायक को इतिहास की किताबों से निकाला और झाड़-पोंछ कर, चमका कर, देश के सामने ऐसे प्रतीक के तौर पर पेश किया, जिसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती. इस मौके पर हमें महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच के टकराव को भुला देना होगा. इस मौके पर ये याद करना भी बेकार होगा कि गृह मंत्री के तौर पर वो सरदार पटेल ही थे, जिन्होंने पहली बार आरएसएस पर पाबंदी लगाई थी.

मोदी के इस सरदार प्रोजेक्ट का पूरा होना असल में देश की राजनीति में आने वाले बड़े बदलाव के मील का पत्थर है. ये प्रोजेक्ट इस बात की पुरजोर कोशिश है कि सरदार पटेल की अगुवाई में कांग्रेस में दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नेताओं का गुट था, जिसमें पुरषोत्तम दास टंडन और केएम मुंशी जैसे नेता शामिल थे. ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के इस धड़े को जवाहरलाल नेहरू और उनके वामपंथी झुकाव वाले साथियों ने पार्टी के भीतर दबाया था. मोदी ने कांग्रेस के भीतर की उस राष्ट्रवादी धारा में नई जान डाल दी है.

मगर, ये बचकानी सोच होगी कि मोदी केवल दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी विचारधारा के मैदान पर कब्जा करना चाहते हैं. प्रतिमा को राष्ट्र को समर्पित करने के बाद अपने 50 मिनट के भाषण में मोदी ने अपने सियासी लक्ष्य को बड़े सधे हुए तरीके से राष्ट्रवादी सोच में मिला दिया, जब उन्होंने 'भारत की सनातनता' का जिक्र करते हुए, दूसरे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नायकों पर हक जताया. मसलन, उन्होंने बी आर अंबेडकर के नाम पर एक स्मारक बनाने की बात की.

मोदी ने हरियाणा में सर छोटू राम की विशाल प्रतिमा लगाने का जिक्र किया. इसी भाषण में मोदी ने श्यामजी कृष्ण वर्मा, भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के योगदान का भी जिक्र किया.

Sardar Patel Statue Of Unity And PM Modi

ये बात तार्किक रूप से भले न ठीक हो कि ऐतिहासिक नायकों को अपना बनाने से मोदी और बीजेपी को वोटों का फायदा होगा. लेकिन, इस बात पर शायद ही कोई शक करे कि ऐसा कर के बीजेपी एक खास सियासी नैरेटिव बनाने में जरूर कामयाब होगी, जिसे पूरे देश में समर्थन मिलेगा.

इसी के साथ, ऐसे कदम से बीजेपी के काडर में नया जोश आएगा. वो विचारधारा की कैद से आजाद होकर अपने परंपरागत वोट बैंक से आगे जाकर भी लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे. इसी संदर्भ में मोदी की ये नई तरह की राजनीति अहम हो जाती है. जबकि कांग्रेस अभी भी पुराने ढर्रे में ही फंसी हुई है. वो उन मुद्दों पर शोर मचा रही है, जिनमें जनता की दिलचस्पी खत्म हो चुकी है.

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