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PM ठीक कहते हैं, BJP में आंतरिक लोकतंत्र ही कामयाबी का मूलमंत्र है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र पर जोर दिया है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Oct 31, 2017 11:57 AM IST

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PM ठीक कहते हैं, BJP में आंतरिक लोकतंत्र ही कामयाबी का मूलमंत्र है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र पर जोर दिया है. उन्होंने पिछले सप्ताह दिवाली मिलन समारोह के मौके पर मीडिया से ये बात कही. प्रधानमंत्री महज भारतीय जनसंघ (बीजेएस) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भावनाओं को व्यक्त कर रहे थे. जनसंघ ही बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी.

बीजेएस के गठन से दो साल पहले यानी 1950 में मुखर्जी ने 'नए राजनीतिक दल के लिए कार्यक्रम' लिखा था. तब वो अपने भविष्य के बारे में सच बोलने से बचते हुए राजनीतिक वनवास झेल रहे थे. उन्होंने लिखा था: 'अगर लोकतंत्र को जिंदा रहना है तो राजनीतिक दलों को भी रहना होगा. नहीं तो लोकतंत्र एक पार्टी का शासन बन जाएगा और फिर एक आदमी का. '

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इसका स्पष्ट परिणाम पार्टी तंत्र पर जवाहर लाल नेहरू का बढ़ता प्रभाव था. इस स्थिति को देखते हुए एक अन्य दिग्गज और तब ऑर्गनाइजर के संपादक के आर मलकानी ने लिखा था, 'गांधीजी का हिंदुवादी असर खत्म हो गया. और अब सरदार का उदारवादी असर भी बेअसर हो गया है.'

श्यामा प्रसाद मुखर्जी

श्यामा प्रसाद मुखर्जी

राजनीतिक दल के रूप में पहले बीजेएस और फिर बीजेपी के उत्थान में स्पष्ट सामंजस्य दिखता है. हालांकि इसमें जनता पार्टी का दौर (1977-1982) शामिल नहीं है. इसके शीर्ष नेतृत्व ने संगठन निर्माण के बुनियादी मूल्यों को मजबूत करने पर हमेशा जोर दिया. संगठन में बड़ी तादाद में ऐसे वॉलंटियर्स शामिल किए गए, जो अपने हितों के बजाए राष्ट्र निर्माण के उच्च लक्ष्य से प्रेरित थे.

इस रणनीति ने मुश्किल वक्त में भी बीजेएस और बीजेपी को अच्छी स्थिति में बनाए रखा. इस मुश्कित दौर में बीजेएस और बीजेपी की यात्रा आजादी से पहले की कांग्रेस के अनुरूप है. तब महात्मा गांधी के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्षता में भरोसा जताते हुए हिंदू धर्म के प्रतीकों को भी शामिल रखा गया था.

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नेहरू के समय में, मजबूत संगठन कांग्रेस के लिए ताकत का जरिया था. इस ताकत ने उन्हें इंदिरा गांधी के जैसी करिश्माई व्यक्तित्व के उभार से पहले लंबे वक्त तक बनाए रखा. 70 के दशक से कांग्रेस संगठन के बजाए अपने नेता के व्यक्तिगत करिश्मे पर ज्यादा भरोसा करने लगी.

अब इसकी बीजेएस के साथ तुलना करें. बीजेएस ने 1958 में संयुक्त महाराष्ट्र समिति का गठन करते हुए कम्युनिस्टों से भी गठबंधन करने से परहेज नहीं किया. 1960 में बीजेएस ने मार्क्सवादियों के साथ मिलकर दिल्ली के मेयर के लिए अरुणा आसफ अली का नाम आगे बढ़ाया. हालांकि इनमें से कोई भी गठबंधन लंबे वक्त तक नहीं टिका.

लेकिन ये बीजेएस के संगठनात्मक नेतृत्व में गजब के लचीलेपन का संकेत था कि उन्हें विरोधियों से भी संगठन के विस्तार के गुर सीखने से परहेज नहीं है. बीजेपी और बीजेएस में जिन्हें संगठन का काम मिला, उन्होंने अपनी विचारधारा को पार्टी के विस्तार में आड़े नहीं आने दिया.

आज के संदर्भ में इस इतिहास का महत्व है. आज बीजेपी ऐसी पार्टी है, जिसके संगठन का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है. कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी की स्थिति ईष्या का कारण है. इसलिए, मोदी द्वारा कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की कमी को निशाना बनाना ठोस राजनीतिक रणनीति है. इसे महज बयानबाजी मानना भारी भूल होगी.

कांग्रेस के विपरीत, बीजेपी ने अपने अनुभवों से पार्टी विस्तार के तीन प्रभावी तरीके सीखे हैं. पिछले कई सालों में, इसने कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करने में महारत हासिल कर ली है. बीजेपी ने कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर पार्टी के प्रभाव को विस्तार दिया है. बीजेपी का अधिकतर प्रमुख कैडर आरएसएस-प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं से आता है. ये कार्यकर्ता अनुशासन और संघ के बुनियादी मूल्यों से बंधे होते हैं. और इन कैडरों की ताकत पार्टी संगठन के लिए मजबूती का काम करती है.

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हालांकि संघ परिवार पर्सनैलिटी कल्ट में विश्वास नहीं करता है. हालांकि आधुनिक संदर्भ में इसका महत्व उन्हें तुरंत समझ आ गया. शुरुआती हिचक के बावजूद वह अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी के चेहरे में रूप में आगे बढ़ाने पर सहमत हो गया. मोदी के मामले में व्यक्तिगत आकर्षण इतना अधिक था कि उन्हें तुरंत नंबर एक स्वीकार कर लिया गया. इसमें दो राय नहीं कि मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व से बीजेपी को बहुत ज्यादा लाभ हुआ है.

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बीजेपी की तीसरी प्रभावी रणनीति पुराने कांग्रेस की नकल से अधिक कुछ नहीं है, जब नामचीन लोगों को उनकी विचारधारा को तवज्जो दिए बिना पार्टी में शामिल किया जाता था. जिस तरह मोदी ने विचारधारा के स्तर पर अलग सहयोगियों से तालमेल बिठाया है, वो काबिलेतारीफ है. उदाहरण के लिए, बिहार में नीतीश कुमार हों या फिर महाराष्ट्र में शिवसेना. ये सब कई तरह की दुविधाओं के बावजूद एनडीए में शामिल हैं.

हालांकि मोदी आरएसएस के बुनियादी सिद्धांतों में पूरी तरह समाए हुए हैं, फिर भी वो अक्सर विचारधारा से आगे बढ़कर पार्टी की स्थिति को मजबूत करते हैं. बल्कि वो बीजेएस के वैचारिक नेता दीनदयाल उपाध्याय के इन शब्दों में विश्वास करते हैं, 'हम बाहर जाकर वोट हासिल कर सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें संगठन और बहुत सारे संगठन बनाने जरूरत है.'

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अगर हम माओ की बातों को मोदी मंत्र में ढालें तो यह ऐसा होगा, 'संगठन से ताकत बढ़ती है, न कि बंदूक से.'

इसमें शक नहीं कि बीजेपी एक मजबूत सांगठनिक ढांचा बना रही है, जबकि कांग्रेस राहुल गांधी के 'करिश्मे के मोह' में पड़ी है. राहुल को इस बड़े राजनीतिक काम को समझने में वक्त लगेगा क्योंकि वह अब भी वो अपने पालतू कुत्ते के साथ ट्वीट कर रहे हैं...कमजोर कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. लेकिन वास्तविकता शायद यही है.

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