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UAE में पीएमः टेरर फंडिंग के पाकिस्तानी धंधे को खत्म करने की होगी कोशिश

पीएम मोदी के साथ देश के उच्च सुरक्षा प्रबंधक भी गए हैं ताकि शेख खलीफा बिन जायद प्रशासन को पाकिस्तान-दुबई टेरर फाइनेंसिंग लिंक को बंद कराने के लिए राजी किया जा सके

Yatish Yadav Updated On: Feb 09, 2018 12:39 PM IST

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UAE में पीएमः टेरर फंडिंग के पाकिस्तानी धंधे को खत्म करने की होगी कोशिश

मार्च 2001 को एक पाकिस्तानी नागरिक दुबई एयरपोर्ट पर एक भारी गियर बैग लेकर सुरक्षा बैरियर को पार कर गया. वह जैसे ही अजीब से तरीके से पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) के बोर्डिंग गेट की तरफ पहुंचा, उसका बैग खुल गया और उससे तीन एके47 असॉल्ट राइफलें नजर आने लगीं. एयरपोर्ट सुरक्षाकर्मियों ने इलाके को घेर लिया, पाकिस्तानी शख्स को एक नया बैग दिया ताकि उसमें वह उन हथियारों को भर सके, इसके बाद उसे सुरक्षित एयरक्राफ्ट तक पहुंचा दिया.

एक भारतीय इंटेलिजेंस ऑपरेटिव उस शख्स पर नजर बनाए हुए था. उसने तत्काल एक खुफिया संदेश दिल्ली भेजा. भारत में सुरक्षा तंत्र से जुड़े हुए वरिष्ठ लोग इस संदेश से चिंता में घिर गए. दुबई के अधिकारियों से कूटनीतिक तौर पर विरोध दर्ज कराया गया. उन्होंने आधिकारिक तौर पर कदम उठाए ताकि मिलिटरी ग्रेड हथियारों के दुबई से पेशावर और कराची सप्लाई को रोका जा सके. पांच साल बाद क्लाश्निकोव की जगह हजारों डॉलर के बिलों ने ले ली. टॉप इंटेलिजेंस अधिकारी कह रहे हैं कि यह प्रैक्टिस अभी भी जारी है.

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ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को यूनाइटेड अरब अमीरात में हैं, देश के उच्च सुरक्षा प्रबंधक उनके साथ गए हैं ताकि शेख खलीफा बिन जायद प्रशासन को पाकिस्तान-दुबई टेरर फाइनेंसिंग लिंक को बंद कराने के लिए राजी किया जा सके. इस फंडिंग का एक हिस्सा जम्मू एंड कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के लिए भी खर्च किया जाता है.

कश्मीरी आतंकियों और अलगाववादियों को बेरोकटोक पैसों की सप्लाई की जांच में नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) को पता चला कि ये पैसे दुबई और सउदी अरब से चलते हैं कश्मीर घाटी पहुंचते हैं. इनकी सप्लाई भारत के हवाला कारोबारी और रावलपिंडी के आईएसआई अफसर करते हैं और इस तरह से घाटी में खून का खेल खेला जाता है.

2015 में मोदी की यूएई की पिछली विजिट से ही भारत चुपचाप सुरक्षा से जुड़े कई मसलों पर यूएई के साथ काम कर रहा है. दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां नियमित तौर पर चरमपंथ के संबंध में सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं. मोदी की 2015 की विजिट के बाद यूएई ने इंडियन मुजाहिदीन के टेररिस्ट अब्दुल वाहिद सिद्दीबप्पा को मई 2016 में भारत के सुपुर्द कर दिया. फरवरी 2002 से कम से कम 18 भगोड़े यूएई अधिकारियों द्वारा पकड़े गए हैं और उनका प्रत्यर्पण भारत किया गया है.

हालांकि, यूएई और दूसरे पश्चिम एशियाई देशों में फंड जुटाने का बड़ा नेटवर्क रखने वाली पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी आईएसआई टेरर फंडिंग को बंद करने की पूरी दुनिया की कोशिशों के बावजूद बेरोकटोक इस धंधे में फलफूल रही है. एनआईए की हालिया चार्जशीट में इस बात को दोहराया गया है कि यूएई और सउदी अरबिया से हवाला के जरिए दिल्ली (बल्लीमारान और चांदनी चौक) के मार्फत कश्मीर घाटी में पैसा पहुंचता है. अलगाववादी इन गैर-बैंकिंग चैनलों पर भारी तौर पर टिके हुए हैं और इनके सहारे से ही कश्मीर घाटी में भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जा रही हैं.

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भारतीय एजेंसियों के पास है सबूत

सुरक्षा तंत्र से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘भारतीय एजेंसियां सुबूतों को यूएई के अधिकारियों के सामने रखेंगी और उनसे अनुरोध करेंगी कि वे पाकिस्तान पर टेरर फंड जुटाने के नेटवर्क को खत्म करने का दबाव बनाएं. यूएई के साथ हमारा अब तक का अनुभव उम्मीद से बेहतर रहा है.’

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के फॉर्मर स्पेशल सेक्रेटरी अमर भूषण ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि यूएई और सउदी अरब को पाकिस्तान की आईएसआई के पैसे जुटाने की गतिविधियों में मदद करने वाली ताकतवर स्वतंत्र इकाइयों पर लगाम लगानी होगी. इस पैसे का इस्तेमाल जम्मू और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में किया जा रहा है.

भूषण ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, ‘यूएई और सउदी अरब में सरकार और सुरक्षा तंत्र का इन ताकतवर समूहों पर कोई कंट्रोल नहीं है. सउदी अरब अब टेरर फाइनेंसिंग के पैमाने पर लगाम लगाना चाहता है, लेकिन ज्यादातर बहावी संस्थान अभी भी पाकिस्तानी कामकाज को चला रहे हैं. टेरर फंडिंग को प्रभावी तरीके से रोकने की तेज कोशिशों से पाकिस्तान में इनका नेटवर्क धराशायी किया जा सकता है.’ एनआईए की जांच में यह भी पता चला है कि आईएसआई ने अपने इंटेलिजेंस सेटअप में एक कश्मीर कमेटी गठित की है. इसकी अगुवाई एक ब्रिगेडियर लेवल का अधिकारी कर रहा है. यह स्पेशल यूनिट स्ट्रैटेजिक प्लानिंग, फंड जुटाने, रिक्रूटमेंट और यूनाइटेड जिहाद काउंसिल से जुड़े हुए आतंकी संगठनों के लड़कों को ट्रेनिंग देने का काम करती है.

एनआईए ने कहा है, ‘यह कमेटी हुर्रियत के प्रतिनिधियों के साथ भी संपर्क में रहती है और इन्हें निर्देश, सलाह और अलगाव का एजेंडा आगे बढ़ाने के सुझाव देती है. इनवेस्टिगेशन से यह भी पता चला है कि कश्मीर कमेटी ने भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के अपने षड्यंत्र के हिस्से के तौर पर आतंकी और अन्य तोड़फोड़ की गतिविधियां चलाने के लिए अलगाववादी समूहों को अलग-अलग तरीकों से रेगुलर तौर पर फंडिंग की एक व्यापक रणनीति बनाई है.’

यूनाइटेड जिहाद काउंसिल को मुत्ताहिदा जिहाद काउंसिल के नाम से भी जाना जाता है. यह जम्मू और कश्मीर में सक्रिय अलग-अलग आतंकी संगठनों का अंब्रेला संगठन है. 1994 में इसका गठन हुआ और फिलहाल इसका चीफ सैयद सलाहुद्दीन है. सलाहुद्दीन आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन चलाता है और यह ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर पाकिस्तानी तंत्र के इशारे पर काम करता है. पाकिस्तानी नागरिक गुलाम मुहम्मद शफी को इसका कोऑर्डिनेटर बनाया गया है. इसके अलावा एक और पाकिस्तानी नागरिक परवेज अहमद पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ संपर्क बनाने का काम करता है और पाकिस्तानी सरकार के निर्देशों को हुर्रियत लीडर्स को और उनके संदेशों को पाकिस्तानी सरकार को पहुंचाता है.

लाइन ऑफ कंट्रोल ट्रेड के जरिए टेरर फाइनेंसिंग

एनआईए की जांच में कश्मीर के अलगाववादियों के टेरर फंडिंग के कामकाज के तौर-तरीकों का दिलचस्प खुलासा हुआ है. एनआईए ने कहा है कि अलगाववादियों ने कश्मीरी ट्रेडर्स को लाइन ऑफ कंट्रोल बार्टर ट्रेड से मंगाए जाने वाले सामान की घटाकर इनवॉइसिंग करने के लिए कहा है. एनआईए ने अपनी चार्जशीट में कहा है, ‘ये दिल्ली में ट्रेडर्स को माल बेचते हैं और प्रॉफिट का एक हिस्सा हुर्रियत लीडर्स और अन्य अलगाववादियों के पास जाता है. यह पैसा एंटी-इंडिया प्रोपेगैंडा चलाने, स्थानीय लोगों को विरोध-प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठा करने और पत्थरबाजी में इस्तेमाल होता है. इसके अलावा इस रकम का इस्तेमाल मारे गए या जेल में बंद आतंकियों के परिवारों को मदद देने में भी किया जाता है. श्रीनगर, नई दिल्ली और अन्य जगहों के हवाला ऑपरेटर्स इस रकम को ट्रांसफर करने का काम करते हैं.’

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प्रतीकात्मक तस्वीर

एनआईए एलओसी ट्रेड टेरर रूट की अलग से जांच कर रही है. ऐसा पाया गया है कि बड़ी तादाद में क्रॉस-एलओसी ट्रेड में लगे ट्रेडर्स के रिश्तेदार सीमा के दूसरी तरफ रहते हैं. इनके हिज्बुल मुजाहिदीन के साथ संबंध हैं. कुछ पूर्व आतंकी और उनके परिवारीजन फर्जी कंपनियों के नाम पर इस ट्रेड रूट का इस्तेमाल वर्जित सामानों और हथियारों की तस्करी के लिए कर रहे हैं.

थर्ड-पार्टी सामानों की बिक्री, कम वजन बताने, अंडर-इनवॉइसिंग, कैश में बड़ी डीलिंग्स और रिकॉर्ड्स में गड़बड़ियां करके भी टेरर गतिविधियों के लिए पैसों का इंतजाम किया जाता है. इस तरीके से भारतीय पक्ष की ओर भारी कैश सरप्लस पैदा होता है. इस कैश को बाद में फॉर्मल बैंकिंग चैनलों और कैश कुरियर्स और हवाला डीलरों के जरिए अलगाववादियों तक पहुंचाया जाता है. इसके अलावा यह नेटवर्क बड़े पैमाने पर स्थानीय डोनेशंस पर भी निर्भर है.

इनवेस्टिगेशन एजेंसी ने कहा है कि जिला प्रेसिडेंट और ब्लॉक लेवल के नेताओं को धार्मिक त्योहारों और रमजान के महीने के दौरान फंड जुटाने की जिम्मेदारी दी जाती है. जांच में पता चला है कि अलग-अलग जिलाध्यक्ष बैतुलमाल के तौर पर हर जिले से 5 लाख रुपए से लेकर 10 लाख रुपए तक इकट्ठा करते हैं. सेब के बागों के मालिकों और कारोबारियों से भी पैसा लिया जाता है. इन्हें हुर्रियत सेंट्रल ऑफिस को पैसे देने पड़ते हैं. इस पैसे का इस्तेमाल प्रशासनिक और ऑर्गनाइजेशनल कामों के लिए किया जाता है. इनमें विरोध प्रर्दशन और हड़तालें शामिल हैं. साथ ही यह पैसा आतंकियों और उनके परिवारों को भी दिया जाता है.

पाकिस्तान में पढ़ रहे कश्मीरी स्टूडेंट्स की भूमिका

एनआईए की जांच में पता चला है कि स्टूडेंट वीजा पर पाकिस्तान जाने वाले छात्र या तो किसी सक्रिय आतंकी के रिश्तेदार होते हैं या पूर्व-आतंकियों के परिवारों से जुड़े हुए होते हैं.

एजेंसी ने यह कहते हुए अपनी जांच का समापन किया है, ‘इनके (छात्रों) के वीजा के आवेदनों की कई हुर्रियत नेता सिफारिश करते हैं. इन नेताओं में तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन एसएएस गिलानी भी हैं. ये सिफारिशें पाकिस्तान के उच्चायोग से की जाती हैं. जो आतंकी या पूर्व-आतंकी पाकिस्तान भाग गए हैं वो इन छात्रों के एडमिशन का बंदोबस्त करते हैं. इसके लिए ये पाकिस्तान में बैठे हुर्रियत नेताओं की मदद लेते हैं. एमबीबीएस और इंजीनियरिंग के लिए इन छात्रों की सिफारिश की जाती है. पाकिस्तान भी कई स्कीमों के जरिए इन्हें स्कॉलरशिप देता है इससे आतंकियों, हुर्रियत और पाकिस्तानी व्यवस्था के बीच के त्रिकोणीय संबंध का पता चलता है. इसके जरिए ऐसे इंजीनियर्स और डॉक्टर्स तैयार करने का काम चल रहा है जिनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ हो. श्रीनगर के पैरीपोरा से अरेस्ट हुए एक आरोपी नईम खान से जब्त हुए एक दस्तावेज में पता चलता है कि उसने एक स्टूडेंट की पाकिस्तान के स्टैंडर्ड मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए सिफारिश की थी क्योंकि उसका परिवार अच्छे और बुरे वक्त में आजादी की लड़ाई के लिए प्रतिबद्ध रहा था.’

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