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मोहन भागवत ने संघ की सच्ची तस्वीर सामने रखी है...भ्रम तो आलोचकों में है

भागवत के कहे को या तो ‘आरएसएस के रुख’ से एकदम ही अलग मानकर देखा गया या फिर ये सोचा गया कि यह सब मोदी के ऊपर अंकुश लगाने और परिवार की विचारधारा को गढ़ने वाले गुरु के रूप में आरएसएस की साख और धाक को नए सिरे से जताने की कवायद है.

Updated On: Sep 27, 2018 04:22 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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मोहन भागवत ने संघ की सच्ची तस्वीर सामने रखी है...भ्रम तो आलोचकों में है

Editor's note: सिर्फ रूस ही ‘रहस्य के आवरण में लिपटी अबूझ पहेली’ नहीं. रूस को लेकर विंस्टन चर्चिल के कहे इस मुहावरे को कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ठीक बताएंगे. इसी कारण बहुत से विश्लेषक दोनों (मोदी और आरएसएस) की व्याख्या अपने मनचाहे ढंग से करते हैं. बीते 17, 18 और 19 सितंबर को दिल्ली के अभिजन लोगों के बीच मोहन भागवत ने जब अपनी बात रखी तो बिल्कुल यही हुआ. भागवत ने बताया कि भारत के बारे में आरएसएस की सोच क्या है. उन्होंने मुस्लिम, हिन्दुत्व, कांग्रेस तथा भारत में मौजूद जातिगत बंटवारे के बारे में भी अपनी बातें रखीं.

भागवत के कहे को या तो ‘आरएसएस के रुख’ से एकदम ही अलग मानकर देखा गया या फिर ये सोचा गया कि यह सब मोदी के ऊपर अंकुश लगाने और परिवार की विचारधारा को गढ़ने वाले गुरु के रूप में आरएसएस की साख और धाक को नए सिरे से जताने की कवायद है. आरएसएस के इर्द-गिर्द रहस्य का जो आवरण खड़ा करने की कोशिश की जाती है, हम तीन कड़ियों की इस सीरीज में उसे भेदने की कोशिश करेंगे, साथ ही ,सीरीज में आरएसएस से बीजेपी के रिश्ते पर बात की जाएगी. सीरीज में यह भी दिखाया जाएगा कि मोदी की राजनीति आरएसएस के राष्ट्र-निर्माण के एजेंडे से अलग नहीं है. पेश है पहली कड़ी...

‘इतिहास अपने को दोहराता है, पहली बार त्रासदी और दूसरी दफे प्रहसन के रूप में-’ कार्ल मार्क्स के गढ़े इस मुहावरे के बाद से चलन ये बन पड़ा है कि कहीं किसी बात में निरंतरता दिख पड़े तो उसे विचार-बुद्धि के विरुद्ध और कमतर माना जाय. इतिहास की निरंतरता की व्याख्या अक्सर इसी मुहावरे का चश्मा चढ़ाकर की जाती है.

जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक का सवाल है, उसके उद्देश्य तथा उद्देश्य से जुड़े व्यापक विमर्श में एक निरंतरता रही है लेकिन इस निरंतरता की अनदेखी की जाती है ताकि आरएसएस को लेकर कुछ नई-नवेली या कह लें विचारोत्तेजक जान पड़ती बातें कही जा सकें. आरएसएस ने अपने आलोचकों तथा असहमतों से संवाद कायम करने के ख्याल से सितंबर के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत में तीन दिन का एक सम्मेलन आयोजित किया था और उस सम्मेलन के साथ ऐसा ही हुआ.

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 19 सितंबर को ‘भारत का भविष्य: आरएसएस का नजरिया’ शीर्षक से अपने विचार रखे और कहा कि उनका संगठन समावेशी(युक्त) भारत की बात कहता है तो कुछ लोगों ने भागवत के बातों का अर्थ ये निकाला कि दरअसल वे बीजेपी के नेतृत्व को खरी-खोटी सुना रहे हैं क्योंकि बीजेपी तो कांग्रेस-मुक्त भारत बनाने पर तुली हुई है.

भागवत ने कांग्रेस के पुराने नेतृत्व की प्रशंसा की तो ये माना गया कि ऐसा कहकर भागवत ने सत्ता के अहंकार से भर चुकी बीजेपी को फटकार लगाई है. कुछ लोगों ने, जिन्हें लगता है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष बीजेपी की काट के लिए जरूरी मुहावरे नहीं गढ़ पा रहे हैं, बैठे-बिठाए अपनी कल्पना में यह कहानी गढी और मजा लिया कि चलो, कम से कम राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बीजेपी और आरएसएस में मतभेद तो उभरकर सामने आया.

mohan bhagwat

लेकिन अगर आरएसएस के इतिहास पर नजर डालें तो दिखेगा उसमें एक पैनी निरंतरता मौजूद रही है और निरंतरता के सहारे आरएसएस ने राष्ट्रीय मसलों पर विचार किया है तथा बदलते वक्त के हिसाब से उसमें बदलाव किया है. बीते दशकों में आरएसएस ने भारतीय समाज और राजनीति में हुए बदलावों के हिसाब से अपने को ढाला और विभिन्न मसलों पर अपने नजरिए में जरूरी सुधार किया है.

‘आरएसएस एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और वह हिंदुओं को संगठित करने के लिए प्रतिबद्ध है-’ अपनी ऐसी पहचान और साख को स्थापित करने के लिए आरएसएस को महात्मा गांधी की हत्या के बाद के वक्त से ही सार्वजनिक जीवन में कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा है. महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस के ऊपर प्रतिबंध लगाया और फिर 1975 में उनकी बेटी ने आपातकाल की घोषणा के बाद इस संगठन पर प्रतिबंध लगाए.

दोनों ही वक्त आरएसएस पर आरोप लगा कि वो गुपचुप षड्यंत्र रचता है जिससे समाज में विद्वेष बढ़ता है और हिंसा फैलती है. आरएसएस पर ये आरोप खूब इफरात से बार-बार लगाया जाता रहा है लेकिन कानून के कठघरे में ये आरोप कभी सही नहीं पाए गए. आरएसएस को लेकर बनी चली आ रही धारणा की बुनियाद में यही बात है और इसी कारण आरएसएस को एक खास चश्मा चढ़ाकर देखा-समझा जाता रहा है.

आरएसएस के नेतृत्व ने बहुत लचीलापन दिखाया है और वक्त के हिसाब से अपने को ढाला है लेकिन इस बात की अक्सर अनदेखी की जाती है ताकि आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों को लेकर एक खास किस्म की कहानी फैलाई जा सके और इस तरह आरएसएस को एक रुढ़िवादी छवि(स्टीरियोटाइप) में कैद किया जा सके. याद करें कि बाला साहब देवरस (साल 1973 से 1994 के बीच के निर्णायक वर्षों में आरएसएस के तीसरे संघचालक) ने आपातकाल के बाद के दौर में कैसे संघ के दरवाजे मुसलमानों के लिए खोल दिए थे. हिंदुओं के हित के लिए प्रतिबद्ध एक संगठन के लिए यह बदलाव की एक निर्णायक घटना थी.

इसमें कोई शक नहीं कि देवरस ने बहुत साहसी फैसला लिया था और इस फैसले के लिए आरएसएस के भीतर ही उनकी आलोचना हुई. इस दौर का सटीक वर्णन करने वाली किताब लास्ट इयर्स ऑफ आरएसएस (2011) में संजीव केलकर ने देवरस की हो रही आलोचनाओं का हवाला देते हुए लिखा है कि महाराष्ट्र के आरएसएस प्रमुख केबी लिमये ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा, 'आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का वह आसन दिया गया जिसपर कभी डॉ. हेडगेवार बैठे थे. कृपा करके उसी संघ को चलाइए और उसके बढ़वार की राह तैयार कीजिए. उसे बदलने की कोशिश मत कीजिए. आपको लगता है कि बदलाव जरूरी है तो फिर एक नया आरएसएस बना लीजिए. हिंदुओं को संगठित करने को प्रतिबद्ध डॉक्टर जी के आरएसएस को हमारे लिए छोड़ दीजिए. अगर आपने इस आरएसएस को बदला तो फिर ऐसे संघ में मैं कोई रिश्ता नहीं रख सकूंगा.' लेकिन देवरस डिगे नहीं और उन्होंने अपनी पहल जारी रखी.

बालासाहेब देवरस ( तस्वीर विकीपीडिया से साभार )

बाला साहब देवरस ( तस्वीर विकीपीडिया से साभार )

आरएसएस के भीतर यह नया प्रयोग कैसे शुरू हुआ, इसकी भी एक कहानी है और इस कहानी को जानना हमारी समझ में इजाफा कर सकता है. इमरजेंसी के दौर में जब इंदिरा गांधी ने देवरस और आरएसएस के कई अन्य पदाधिकारियों को जेल में डाल दिया था तो इन नेताओं की भेंट जमात-ए-इस्लामी के नेताओं से हुई. इमरजेंसी के अत्याचार अपने चरम पर थे और दोनों ने इस अवसर का इस्तेमाल एक-दूसरे से ज्यादा बेहतर तरीके जानने-समझने में किया. इमरजेंसी के बाद के दौर में देवरस ने बड़ी दूरंदेसी दिखाते हुए न सिर्फ अपनी राजनीतिक इकाई भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी में मिल जाने की अनुमति दी बल्कि यह भी वादा किया कि वे आरएसएस को लेकर जो भ्रांतियां बनी चली आ रही हैं उसे दूर करने की कोशिश करेंगे. उन्होंने अनुमति दी कि मुस्लिम आरएसएस को एकदम नजदीक से देखें और उसकी जांच करें.

‘हिंदुत्व मुसलमानों के बगैर अधूरा है-’ जो लोग भागवत के इस दावे से चकित हैं उन्हें शायद एक और वाकये का भी ख्याल नहीं. वो वाकया भी अपने नजरिए में बदलाव की गहरी इच्छा से भरा हुआ है. वाकया ये है कि आपातकाल के बाद मौलानाओं का एक जत्था आरएसएस के नेताओं से मुलाकात करने नागपुर के मुख्यालय पहुंचा. बातचीत चूंकि लंबी चली सो मालाना कुछ चिंतित नजर आए क्योंकि शाम ढल रही थी और उनके नमाज अदा करने का वक्त हो चला था. मेजबान ने पेशकश की कि वे चाहें तो आरएसएस के मुख्यालय में ही नमाज अदा कर लें और मालानाओं ने हामी भर दी. शायद, ये कहना ठीक होगा कि आपातकाल के बाद के उस दौर में आरएसएस और मुसलमानों के बीच मेल-भाव अपने चरम पर था.

अगर कोई संदेह हो तो आपको मोहम्मद अली करीम चागला की बातों पर गौर करना चाहिए. वे एक मशहूर न्यायविद् और पूर्व केंद्रीय मंत्री थे. उन्होंने आरएसएस की प्रशंसा की और अपने को ‘धर्म से मुसलमान तथा नस्ल से हिंदू’ बताया था. इसके लिए उन्हें रुढ़िपरस्त और उदारवादी दोनों ही तरह के मुसलमानों की नाराजगी झेलनी पड़ी.

आपातकाल तो खत्म हो चला था लेकिन आरएसएस के लिए इम्तिहान अभी खत्म नहीं हुए थे. भारतीय जनसंघ के सदस्य अब जनता पार्टी का हिस्सा थे और दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाकर उनपर निशाना साधा गया. समाजवादियों ने जनता पार्टी और आरएसएस की उनकी सदस्यता को लेकर सवाल खड़े किए. जनता पार्टी को तोड़ने और कांग्रेस विरोधी गठबंधन को गिराने के लिए यह एक बहाने के तौर पर उछाला गया मुद्दा था लेकिन इसके बहुत पहले के ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब समाजवादी खेमे के सबसे बड़े नेताओं ने राष्ट्र के निर्माण में आरएसएस की भूमिका को याद करते हुए उसका जयगान किया था. ऐसे नेताओं में मधु लिमये और मधु दंडवते का नाम शामिल है.

मधु लिमये

मधु लिमये

आरएसएस को लेकर जनता परिवार के भीतर जब उठा-पटक मची तो देवरस ने फौरन एक चिट्ठी लिखी और अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे अपने विवेक के आधार पर कोई भी पार्टी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. चिट्ठी का एक छुपा हुआ संदेश यह भी था कि आरएसएस अपने स्वयंसेवकों की राजनीतिक पसंद को निर्धारित करने का काम नहीं करेगा. भगवा खेमे में देवरस के इस रुख को लेकर एक बार फिर से आलोचना हुई.

भागवत ने मुसलमानों के बारे में जो कहा उसे अगर आप आपातकाल के बाद के वक्त में आरएसएस के पूर्ववर्ती सरसंघचालक के हाथों हुए बदलाव की रोशनी में पढ़ें तो आपको एक निरंतरता मिलेगी. यह निरंतरता उन तर्कों के खिलाफ है जो मशहूर बुद्धिजीवियों (ज्यादातर मार्क्सवादी खेमे के) ने अपनी तरफ से गिनाए हैं. मार्क्सवादी छाप वाले ऐसे बुद्धिजीवियों का तर्क है कि आरएसएस रुढ़िपरस्त और असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली नफरत की विचारधारा से संचालित होता है. शायद, सच तो ये है कि सुधार के एजेंडे पर चलने के कारण आरएसएस के नेतृत्व को अपने खेमे के भीतर रुढ़िपसंद पुरातनपंथियों की आलोचनाएं कहीं ज्यादा झेलनी पड़ी हैं. आरएएस में खुद को बदलावों के हिसाब से ढाल लेने की अनोखी ताकत है और भागवत ने दिल्ली में जो कुछ कहा वह आरएसएस के इस गुण के एकदम मेल में है.

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