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बीजेपी की 'पेनल्टी कॉर्नर पॉलिटिक्स' की मिसाल है, इलाहाबाद का नाम बदलना

नाम बदलने का योगी सरकार का एक और फैसला प्रधानमंत्री मोदी और संघ प्रमुख भागवत के `विविधता का सम्मान’ वाले बयान का सीधा-सीधा मजाक है.

Updated On: Oct 16, 2018 03:07 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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बीजेपी की 'पेनल्टी कॉर्नर पॉलिटिक्स' की मिसाल है, इलाहाबाद का नाम बदलना
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हॉकी के खेल में जब किसी टीम को पेनल्टी कॉर्नर मिलता है, तो इस बात की प्रबल संभावना होती है कि वह टीम गोल कर पाएगी. पेनल्टी कॉर्नर विपक्षी टीम की रक्षा पंक्ति के खिलाड़ियों की किसी गलती की वजह से दिया जाता है. इन गलतियों में गेंद पर पैर लगाना भी शामिल हैं.

आक्रमण करने वाली टीम के खिलाड़ी एक रणनीति के तहत जानबूझकर गेंद विपक्षी डिफेंडर के पांव पर मार देते हैं, ताकि पेनल्टी कॉर्नर मिल सके. मौजूदा दौर में बीजेपी `पेनल्टी कॉर्नर’ हासिल करने की इसी रणनीति के तहत काम कर रही है. मतलब बहुत साफ है, जानबूझकर ऐसे फैसले लिए जाएं जिनका विरोध हो और फिर उस विरोध को आधार बनाकर पूरे विपक्ष को हिंदू विरोधी साबित किया जा सके. नाम बदलने की इस पूरी कवायद पर गौर करेंगे तो इसमें एक पैटर्न दिखाई देगा. बीजेपी शासित राज्य सरकारें एक नाम का शिगूफा छोड़ती है. वह कुछ समय तक जिंदा रहता है. उसके खत्म होने के कुछ समय बाद फिर ऐसा ही कोई नया फरमान लेकर आ जाती हैं, ताकि येन-केन-प्रकारेण हिंदू-मुस्लिम प्रसंग जिंदा रहे.

मुगलसराय स्टेशन को दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन किए जाने के बाद अब इलाहाबाद को प्रयागराज किए जाने की तैयारी है. मुगलसराय एक ऐतिहासिक शहर है. जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय से मुगलसराय का नाता यह है कि इसी स्टेशन पर रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई थी. जाहिर है, मुगलसराय के साथ दीनदयाल उपाध्याय से जुड़ी कोई सुखद स्मृति नहीं है. फिर भी स्टेशन का नाम बदलकर उनके नाम पर रख दिया गया.

mughalsarai junction

वजह दीनदयाल उपाध्याय का सम्मान करना नहीं बल्कि मुगलसराय का नाम मिटाना था. अगर सम्मान करना होता तो केंद्र और राज्य सरकारों के पास फंड की क्या कमी है? वे जहां चाहतीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर एक भव्य स्मारक बना देतीं, लेकिन असल में यह है ही नहीं. दरअसल संघ परिवार गैर-हिंदुओं के खिलाफ एक तरह की प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ रहा है, जिसके तहत उनसे जुड़ी हर तरह की पहचान आहिस्ता-आहिस्ता खत्म की जानी है. मुगलसराय का नाम मिटाए जाने के पीछे उन लोगों की भावनाओं को तुष्ट करना था, जिन्हें मुगलों नाम से नफरत है.

मंशा यह रही होगी कि इस फैसले को लेकर मुसलमानों के बीच प्रतिक्रिया हो और फिर उसके आधार पर वोटरों को यह बताया जा सके कि देखो इस देश का हिंदू इतना पीड़ित है कि अपनी इच्छा से अपने एक बड़े नेता के नाम पर किसी स्टेशन तक का नामकरण भी नहीं कर सकता. लेकिन यह कोशिश बेकार गई. मुगलसराय का नाम बदले जाने को लेकर कोई खास शोर-शराबा नहीं हुआ.

इलाहाबादी लोग अब क्या कहलाएंगे?

इलाहाबाद भारत का एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शहर रहा है. इसकी धार्मिक पहचान प्रयाग के रूप में रही है. कुंभ जैसे मेलों के समय इसे प्रयाग कहा जाता है लेकिन सामान्य बोलचाल में यह इलाहाबाद है. आधुनिक इलाहाबाद शहर अकबर के समय बसाया गया था. कहते हैं कि अकबर ने सर्वधर्म समभाव पर आधारित अपने नए पंथ दीन-ए-इलाही की बुनियाद इसी शहर में रखी थी. अकबर या उसके बाद के किसी और मुगल बादशाह के समय इस शहर की हिंदू पहचान को बदलने की कोशिश नहीं की गई.

इलाहाबाद और प्रयाग के बीच सदियों से एक तरह का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व रहा है लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने अब इलाहाबाद और प्रयाग को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. इलाहाबाद को एक मुस्लिम पहचान से जोड़ दिया गया है, जब वास्तविक अर्थों में यह सरासर गलत है. किसी आम इलाहाबादी को इस बात का ख्याल तक नहीं आता कि उसके शहर के नाम की जड़ें कहां हैं लेकिन योगी सरकार के फरमान का संदेश बहुत साफ है-जो इसके पक्ष में होगा वह हिंदू समर्थक यानी देश भक्त, जो इसकी मुखालफत करेगा वह हिंदू विरोधी यानी राष्ट्रदोही.

साफ है, राजनीतिक ध्रुवीकरण के अलावा इस फैसले का कोई और मकसद नहीं है. यूपी सरकार ने यह दावा किया है कि नाम बदलने का फैसला संतों की इच्छा का सम्मान करते हुए किया गया है. क्या राज्य सरकार ने यह जानने की कोशिश की है कि इस शहर के लोगों की इच्छा क्या है? जिन लोगों की कई पुश्तें इस शहर में गुजर गईं वे रातो-रात भला कैसे स्वीकार कर पाएंगे कि अब वे इलाहाबादी नहीं हैं.

इलाहाबादी अमरूद से लेकर अकबर इलाहाबादी तक अनगिनत हस्तियां इस शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही हैं. निराला और महादेवी की छायावादी हिंदी कविताएं और फिराक गोरखपुरी की विश्व-प्रसिद्ध उर्दू शायरी इसी इलाहाबाद में परवान चढ़े हैं. ऐसे में यह साबित करने की जिद क्यों कि धार्मिक पहचान के अलावा इस शहर की कोई और पहचान नहीं है? बेशक योगी आदित्यनाथ को लगता होगा कि इस बहुरंगी शहर के बाकी सब रंग मिटाकर सिर्फ भगवा रंग पोत देने से उन्हें ज्यादा वोट मिल जाएंगे लेकिन यह फैसला उस विराट भारतीय पहचान का अपमान है, जो न जाने कितने तरह की संस्कृति और अस्मिताओं को साथ लेकर चलती है।

नामकरण पर अपनी नीति स्पष्ट करे बीजेपी

narendra modi

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हमें भारत की विविधता को सेलिब्रेट करना चाहिए. क्या इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयाग करना ऐसा ही सेलिब्रेशन है? क्या सदियों से गुड़गांव पुकारे जाने वाले शहर को रातों-रात गुरुग्राम बनाना इसी सेलिब्रेशन का हिस्सा है? संघ प्रमुख मोहन भागवत भी भारत की विविधता के बारे में बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें कह चुके हैं. उन्होंने तो यहां तक कहा है कि मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र का कोई मतलब नहीं है.

फिर कथनी और करनी में इतना बड़ा फासला क्यों है? दरअसल यह आरएसएस की राजनीति की चिर-परिचित शैली रही है. बयान हमेशा इस तरह के दिए जाते हैं, जिनके कई मतलब निकाले जा सकें. शीर्ष नेतृत्व कहते कुछ हैं और बाकी नेता करते कुछ अलग हैं. यह वही बीजेपी है, जिसके सर्वोच्च नेता और देश के प्रधानमंत्री भारतीय संविधान के रास्ते पर चलने का संकल्प दोहराते हैं और उन्ही की सरकार के मंत्री अनंत हेगड़े खुलकर कहते हैं कि हम संविधान बदलने के लिए ही सत्ता में आए हैं.

अगर शहर, गांव और मोहल्लों के नाम बदलना ही सर्वोच्च प्राथमिकता है, तो सरकार को यह बात पूरी ईमानदारी से अपने वोटरों को बतानी चाहिए. यह भी साफ करना चाहिए कि कब तक और कितने नाम बदले जाने हैं. कायदे से बीजेपी को यह बातें अपने चुनावी घोषणापत्र में भी बतानी चाहिए.

नाम बदलने की कवायद अंतहीन है. अगर आप हिंदू पौराणिक ग्रंथों में ढूंढेगे तो एक-एक शहर के कई नाम मिलेंगे. कोई यह जिद कर सकता है कि दिल्ली का नाम हस्तिनापुर होना चाहिए. फिर यह भी सवाल उठ सकता है कि हस्तिनापुर ही क्यों इंद्रप्रस्थ या खांडवप्रस्थ क्यों नहीं?

यह बात समझने की कोशिश करनी चाहिए कि इतिहास के किसी भी कालखंड में ऐसा संभव नहीं हो पाया कि किसी पुरानी सांस्कृतिक पहचान को जड़ से मिटाया जा सके. संघ परिवार को जिस मुगलकाल काल से सबसे ज्यादा नफरत है, उस दौर में भी ज्यादातर भारतीय शहरों और तीर्थों की सांस्कृतिक पहचान पूरी तरह कायम रही. रामपुर जैसे न जाने कितने शहर इस बात की जीती जागती मिसाल हैं, जहां शासन तो मुसलमानों का रहा लेकिन नाम नहीं बदला. अलगावाद के संकट से जूझ रहे कश्मीर तक में इस बात की मांग नहीं उठती कि श्रीनगर और अनंतनाग जैसे हिंदू पहचान वाले शहरों के नाम बदले जाएं.

इस्लामिक पाकिस्तान तक में लव का लाहौर नहीं बदला

लाहौर हाईकोर्ट की तस्वीर

लाहौर हाईकोर्ट की तस्वीर

पाकिस्तान का गठन धार्मिक पहचान और विधर्मियों के प्रति नफरत के आधार पर हुआ. बंटवारे के बाद वहां साझा हिंदू-मुस्लिम विरासत को खत्म करने की साझा और सुनियोजित कोशिशें की गईं. बहुत सी पुरानी पहचान जबरन मिटा दी गईं लेकिन इन कोशिशों में पाकिस्तानी हुकूमत की सांस फूलने लगी. नतीजा यह हुआ कि थक-हार कर हुकूमत को हथियार डालना पड़ा. आज भी पाकिस्तान में बहुत से शहरों के नाम ऐसे हैं, जिनका नाता पुरातन हिंदू इतिहास से है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान की सांस्कृतिक राजधानी लाहौर है. कहते हैं कि लाहौर को भगवान राम के पुत्र लव ने बसाया था और लव नाम के अपभ्रंश लह से लाहौर बना था. क्या लाहौर में रहने वाला कोई शख्स खुद को लाहौरी के बदले किसी और नाम से पुकारा जाना स्वीकार करेगा? शायद इलाहाबादी भी नहीं करेगा.

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