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मुन्ना बजरंगी की मौत के बाद फिर चर्चा में है मुख्तार अंसारी

मुन्ना की मौत के बाद से यह खबरें आम हैं कि मुन्ना बजरंगी की हत्या से उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में बंद बाहुबली बीएसपी विधायक मुख्तार अंसारी सहम गए हैं और हत्या के दो दिन बाद तक अपनी बैरक से बाहर नहीं निकले हैं

Updated On: Jul 15, 2018 11:24 AM IST

Utpal Pathak

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मुन्ना बजरंगी की मौत के बाद फिर चर्चा में है मुख्तार अंसारी

कहते हैं कि उत्तर प्रदेश का अपराध जगत संगठित अपराध का एक जीता जागता विश्वविद्यालय है, जहां कुलपति से लेकर विभागाध्यक्ष, और प्रोफेसर तक की पदवी है. ये दीगर बात है कि यहां एक अलग किस्म का ज्ञान और एक अलग किस्म की शिक्षा का आदान-प्रदान होता है. और इनमें से किसको कब पदोन्नति मिल जाए या किसको पदच्युत कर दिया जाए इसका फैसला कोई एक आदमी नहीं ले सकता. लेकिन इस अदृश्य विश्वविद्यालय में एक चतृर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर एक अतिथि वक्ता का भी उतना ही महत्व है जितना एक वरिष्ठ प्राध्यापक या मेधावी विद्यार्थी का.

फिर इन सबके बाद इस विश्वविद्यालय में कई तरह की समितियों के पदाधिकारी भी हैं जो बाहर से ही समय-समय पर अपना योगदान देते रहते हैं. ऐसे में कार्यशाला, संगोष्ठी, विशेष व्याख्यान के साथ वार्षिक, अर्धवार्षिक और प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन भी समय-समय पर किया जाता है. लेकिन कभी- कभार कुछ अनुष्ठान होते हैं जिनका प्रसाद कई घरों में वर्षों तक बंटता है.

बागपत जेल में प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ़ मुन्ना बजरंगी की हत्या भी एक ऐसा ही अनुष्ठान था जिसका प्रसाद सैकड़ों करोड़ रुपयों और नामी- बेनामी संपत्तियों और कंपनियों के रूप में प्रदेश के कोने-कोने में बंटेगा. लेकिन इस प्रसाद के बंटवारे में अभी खासा समय लगेगा और धीरे-धीरे कागज़ों में पहिए लग जाएंगे और फाइलें यथास्थान से बढ़ने लगेंगी. बहरहाल, मुन्ना की मौत के बाद से यह खबरें आम हैं कि मुन्ना बजरंगी की हत्या से उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में बंद बाहुबली बीएसपी विधायक मुख्तार अंसारी सहम गए हैं और हत्या के दो दिन बाद तक अपनी बैरक से बाहर नहीं निकले हैं. यह खबर लगभग सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी है और विभिन्न वेब संस्करणों में भी इसे प्रकाशित किया गया है. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि बीजेपी समर्थक इस बात को कहने से नहीं चूक रहे कि शासन मुख्तार अंसारी को किसी हाल में कोई अतिरिक्त सहूलियत नहीं देगा.

बांदा जेल की हालिया स्थिति-

बांदा जेल की हालिया स्थिति कुछ ऐसी है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता. बीएसपी विधायक के लिए जेल में त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है. बांदा जेल के जेलर वी एस त्रिपाठी ने बताया कि ‘जेल की बैरक संख्या-15 और 16 में बंद मुख्तार अंसारी दो दिन अपनी बैरक से बाहर नहीं निकले और न ही किसी से मुलाकात की इच्छा जताई. फिलहाल वे भोजन और दवाएं इत्यादि ले रहे हैं लेकिन उन्होंने किसी से भी मुलाकात नहीं की. हम उनकी सुरक्षा को लेकर कोई चूक नहीं करना चाहते लिहाजा हमने भीतर और बाहर कड़े बंदोबस्त किए हैं. जेल के मुख्य द्वार पर पुलिस के अलावा पीएसी के जवान तैनात किए गए हैं. अन्य बंदियों के मुलाकातियों पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है और उनकी भी सघन तलाशी ली जा रही है.'

बांदा जेल में न सिर्फ सीसीटीवी कैमरों के जरिए 24 घंटे बंदियों की हरकतों पर कड़ी नजर रखी जा रही है. बल्कि जेल अधिकारी खुद रात भर जगकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं. मुख्तार अंसारी की बैरक में किसी बंदी रक्षक को भी जाने की इजाजत नहीं है और घटना के तुरंत बाद से ही जेल की हर बैरक में दो दिन तक सघन तलाशी अभियान चलाया गया जिसमें कोई भी आपत्तिजनक सामान बरामद नहीं हुआ है.

मुख्तार अंसारी की सुरक्षा को लेकर उनके परिवार वाले भी चिंतित हैं और उनके बड़े भाई और पूर्व सांसद अफजाल ने गुरुवार को फोन पर मीडिया से बताया कि सुरक्षा के सवाल उन्हें इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं हैं. बकौल अफजल अंसारी ‘इस सरकार से हमें किसी तरह की कोई उम्मीद नहीं, सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं, पिछले विधानसभा सत्र में जब मुख्तार वहां सत्र में मौजूद थे तब भी उन्होंने वहां उपस्थित मीडिया से अपनी जान को खतरा बताया था. लेकिन मेरा सवाल यह है कि आखिर सुरक्षा किससे मांगी जाए क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं सदन में कह रहे हैं कि ठोक दिया जाएगा. ऐसे में क्या और किससे उम्मीद करें?’

मौजूदा समय में मुख्तार के ख़ास लोगों में से अंगद राय, भीम राय, गोरा राय, हनुमान पांडेय, राजू कन्नौजिया, जामवंत कन्नौजिया, अमरेश कन्नौजिया, अनुज कन्नौजिया सहित कई अन्य वाराणसी सहित पूर्वांचल की अन्य जेलों में निरुद्ध हैं. इसके अलावा संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा समेत कई अन्य खास लोग भी पश्चिम उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद हैं.

ऐसे में उन सबकी गतिविधियां अपेक्षा के अनुरूप न के बराबर हो रही हैं. लेकिन मीडिया में छप रही मुख्तार से जुड़ी खबरों को सोशल मीडिया में प्रचारित प्रसारित करने में उनके राजनीतिक विरोधियों से ज्यादा सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराने वाले पहरुए की बड़ी भूमिका है जिन्हें मामले का रुख मुख़्तार की तरफ मोड़कर मुन्ना के जाने के बाद पनपी रिक्तता को भरना है. दरअसल मुन्ना की मौत के बाद के समुद्र मंथन के रत्नों को सहेजने के लिए मामले का रुख दूसरी तरफ मोड़ना आवश्यक हो चला था लिहाजा प्रदेश के शक्ति सामंतों ने बड़ी ही चालाकी से सब कुछ मुख्तार की तरफ मोड़ दिया और जनता फिर से मुख्तार की चर्चा करने में लग गई.

Mukhtar Ansari

क्या मुख्तार का डर जायज है -

फिलहाल तो बीएसपी विधायक का डरना इसलिए भी जायज़ है क्योंकि मुन्ना की मौत पर राजनीतिक रंग चढ़ने लगा है. हालांकि इस तमाम डाइवर्जन के पीछे भी राजनीति के धुरंधरों की भी एक मंशा है और इस चर्चा में राजनीतिक रंग तब आया जब अपने ट्विटर अकाउंट पर खुद को बीजेपी के काशी क्षेत्र का यूथ और सोशल मीडिया वॉर रूम का प्रमुख, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रभारी के अलावा काशी क्षेत्र का महासंपर्क अभियान का डेटा प्रमुख बताने वाले डॉ. आदित्य कुमार सिंह नामक व्यक्ति ने दावा किया, मुख़्तार अंसारी को भी मुन्ना बजरंगी की तरह मारा जाएगा.

डॉ. आदित्य ने सोमवार को अपने ट्विटर हैंडल पर ट्वीट कर लिखा, ‘आज स्व. कृष्णानंद राय जी की मौत का आंशिक बदला राजनीतिक सत्ता के हनक द्वारा ले लिया गया. बहुत जल्द ही ठीक इसी प्रकार की व्यूह रचना द्वारा मुख़्तार अंसारी जी को कब्र में दफन करके यह बदला पूर्ण कर लिया जाएगा. जय हो गाजीपुर, जय हो मनोज सिन्हा जी.’ इसके अलावा उन्होंने दूसरा ट्वीट करते हुए लिखा कि बीजेपी का केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने से बजरंगी का मरना तय था. ‘केंद्र और राज्य में पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार आने पर मुन्ना बजरंगी का मरना तो तय था मगर पुलिस प्रशासन को कब, कहां और कैसे के सोच विचार में इतना समय लग गया वरना यह मैटर कभी का सुलट गया होता क्योंकि इस अभियान के पीछे उत्तर प्रदेश के एक केंद्रीय मंत्री की प्रतिष्ठा जो फंसी थी.’

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एक वेबसाइट में इस बाबत खबर छपने के बाद मुन्ना बजरंगी हत्याकांड को लेकर सिंह ने अपने सारे ट्वीट डीलीट कर दिए हैं. इसके साथ ही अब वे किसी का फोन भी नहीं उठा रहे हैं. डॉ. आदित्य के फेसबुक प्रोफाइल से उनके बीजेपी में होने और उनकी राजनीतिक गतिविधियों का अंदाज़ा उनके फेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ लगी उनकी तस्वीरों को देखकर लगाया जा सकता है. बहरहाल डॉ. आदित्य के अतिउत्साह और उत्कण्ठा ने पार्टी के भीतरखाने में चल रही चर्चाओं और मुन्ना की मौत पर चल रहे घमासान के साथ भविष्य की योजनाओं को भी कहीं न कहीं उजागर ही किया है. मुन्ना की मौत के बाद से पूर्व बीजेपी विधायक स्वर्गीय कृष्णानंद राय की चर्चा भी सोशल मीडिया पर ज़ेरे बहस है और उनकी तस्वीरें पूर्वांचल और अन्य इलाकों से पोस्ट और ट्वीट की गई हैं.

किसे लाभ होगा मुन्ना की मौत से-

पूर्वांचल के संगठित अपराध की बात करें तो मुन्ना की मौत का सीधा लाभ माफिया और बीजेपी से एमएलसी बृजेश सिंह को होना है, मुन्ना ने बृजेश और उनके भतीजे बीजेपी विधायक सुशील सिंह की नाक में दम कर रखा था. मुन्ना के गुर्गे कई सरकारी ठेकों और अन्य कामों में बृजेश का रास्ता काटने में लगे रहते थे. नवागत शूटरों की फौज मुन्ना की तरफ अधिक आकर्षित होती थी जिस वजह से बृजेश और सुशील को अपनी सुरक्षा को लेकर संजीदा इतंजाम करने पड़ते थे. अब मुन्ना की मौत के बाद पूर्वांचल का शक्ति संतुलन बृजेश के इर्द-गिर्द घूमेगा. ऐसे में मुख्तार के नाम पर चल रहे डाइवर्जन का लाभ बृजेश को मिलना तय है क्योंकि उनका ताल्लुक सत्ता पक्ष से भी है.

ठीक इसी तरह पूर्वांचल के ही अन्य बाहुबली और पूर्व बीएसपी एमएलसी विनीत सिंह को भी अब उनके प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सोनभद्र मिर्जापुर समेत झारखंड के कुछ इलाकों में मुन्ना की मौत के बाद से उपजे वैक्यूम का सीधा लाभ मिलने की अटकलें लगाई जा रही हैं. इसके अलावा रिंकू सिंह और बीकेडी के भी नाम हैं जो मुन्ना की मौत के बाद खाली हुई जगह को भरने की कोशिश में लगेंगे. लेकिन अब तक इन दोनों के पास भी न कोई राजनीतिक अभिभावक है और न ही एक कुशल प्रबंधक लिहाजा इन्हें अपना वर्चस्व कायम करने के लिए कुछ बड़ा करना होगा.

मुन्ना की मौत में भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के अपराधियों के संलिप्त होने की बात सामने आ रही है लेकिन उत्तर प्रदेश के अपराध में पूरब पश्चिम का समन्वय काफी पुराना है. पश्चिम अगर धनवर्षा का क्षेत्र है तो पूरब ताजा तरीन शूटरों और अड़ियल हत्यारों के लिए चर्चित है. ऐसे में फरारी काटना, आश्रय देना,  हैंडओवर करना, और एक दूसरे के इलाकों में हत्या करना सामान्य माना जाता रहा है. लेकिन पूर्वांचल एक मामले में पश्चिम से बीस हो जाता है और वह है पेशेवर अंदाज़ के साथ कुशल राजनीतिक समझ. मुन्ना की मौत के पीछे भी एक राजनीतिक समझ है और मामले का डाइवर्जन बड़ी ही खूबी से एक एक दिन अलग अलग किस्म की चर्चाओं को खबरों के माध्यम से जन्म देकर किया जा रहा है.

इस बीच मुन्ना बजरंगी की हत्या के आरोपी सुनील राठी को बागपत जिला जेल से हटा कर फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजे जाने के आदेश हो जाने के बाद उसे शनिवार को फतेहगढ़ सेंट्रल जेल ले जाया गया है. बागपत जेल में हत्या की वारदात के बाद कारागार प्रशासन ने सुनील राठी और उस जैसे कुछ अन्य कैदियों का हवाला देते हुए उन्हें जिला कारागारों के बजाए केंद्रीय कारागारों में स्थानांतरित किए जाने का आग्रह किया था. राज्य सरकार ने कारागार प्रशासन के प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए यह आदेश दिए हैं. राठी को फतेहगढ़ के साथ ही लखनऊ अथवा डासना जेल भेजे जाने का प्रस्ताव था. लेकिन लखनऊ जेल में मुख़्तार के कई खास लोगों के पहले से ही मौजूद रहने के कारण प्रशासन ने राठी को लखनऊ ले जाना उचित नहीं समझा. माना जा रहा है कि जल्दी ही उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद कुछ अन्य बाहुबलियों और उनके गुर्गों को भी अलग अलग जेलों में स्थानांतरित किया जायेगा.

तस्वीर फेसबुक से साभार

तस्वीर फेसबुक से साभार

आखिर कर क्या रहा है मुख्तार खेमा-

जानकारों की मानें तो मुख्तार लोकसभा चुनावों तक किसी भी तरह के नए मामले से दूर रहना चाहते हैं. उनका सारा ध्यान आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर लगा हुआ है और वे अपने करीबियों को पूर्वांचल की अलग-अलग सीटों पर सक्रिय कर चुके हैं. उनके इर्द-गिर्द रहने वालों ने भी दबी जुबान में यह स्वीकार किया है कि बाहुबलि विधायक का सारा ध्यान इस वक़्त सिर्फ राजनीतिक बिसात बिछाने में ही लगा हुआ है और पूर्वांचल के गाज़ीपुर, मऊ, बलिया, और आजमगढ़ समेत चंदौली में उनके समर्थक चुपचाप आने वाले चुनावों का इंतजार कर रहे हैं.

पिछले कुछ सालों में किसी भी बड़ी घटना से संबंधित एक भी नया मामला मुख्तार के इर्द-गिर्द होकर नहीं गुजरा है और वे कई लोगों से एक निश्चित दूरी बना कर रख रहे हैं. ऐसे में मुन्ना की मौत के बाद मुख्तार को लेकर चल रही खबरों की असली सच्चाई या तो खुद मुख्तार अंसारी बता सकते हैं और या फिर वो जो कि उनका खास हो. लेकिन जैसी की परंपरा रही है, ऐसे मौकों पर खास लोग भी जवाब नाप तौल कर ही देते हैं. ऐसे में अटकलों और अफवाहों के बीच सैकड़ों कहानियां बाजार में घूम रही हैं और जो वाकई जानकार हैं वे चुपचाप मुस्कुराकर इन कहानियों को सुन कर चुपचाप मान लेने में ही भलाई समझ रहे हैं.

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