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एमपीपीसीएस: क्या एमपी में व्यापमं पार्ट टू शुरू हो चुका है

एक ही समुदाय के छात्रों के एमपीपीसीएस में चुने जाने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं

Dinesh Gupta Updated On: Oct 03, 2017 05:55 PM IST

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एमपीपीसीएस: क्या एमपी में व्यापमं पार्ट टू शुरू हो चुका है

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दी गई सफाई पर यदि यकीन किया जाए तो मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में जैन समुदाय के 17 प्रतिभागियों का उत्तीर्ण होना संयोग मात्र है. सरकार ने परीक्षा में आयोग अधिकारियों के हस्तक्षेप की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है. बड़ी संख्या में जैन समुदाय के लोगों के परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आरोप यह लगाया जा रहा है कि लोकसेवा आयोग की परीक्षा व्यापमं की तर्ज पर हुई है.

जैन समुदाय के दो अधिकारियों के आयोग में परीक्षा नियंत्रक के पद पर पदस्थ होने के कारण आरोप को बल मिल रहा है. ये अधिकारी मदनलाल गोखरू (जैन) और दिनेश जैन हैं. मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले प्रतिभागियों का प्रारंभिक परीक्षा केन्द्र आगर, मालवा में था. आयोग द्वारा जारी किए गए परीक्षा परिणाम में इन सत्रह छात्रों के नाम रोल नंबर के अनुसार एक क्रम में हैं. समुदाय विशेष के प्रतिभागियों के रोल नंबर एक क्रम होने के कारण इसे महज संयोग नहीं कहा जा रहा है.

विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह ने पूरे मामले जांच सीबीआई से कराने की मांग की है. पूर्व केन्द्रीय मंत्री सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट कर कहा कि सरकार के नुमाइंदों ने फिर एक भ्रष्ट खेल को अंजाम दिया है. उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है. जवाब में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि साक्ष्य होंगे तक सरकार कार्यवाही भी करेगी. मुख्यमंत्री आयोग की परीक्षा प्रणाली को देश की सबसे बेहतर परीक्षा प्रणाली बताया है.

अंतिम चयन की प्रक्रिया अभी बाकी है

आयोग की जिस मुख्य परीक्षक के परिणाम को लेकर विवाद की स्थिति निर्मित हुई वो 3 जून से 8 जून तक राज्य के 4 संभागीय मुख्यालय इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर के केन्द्रों पर आयोजित की गई थी. मुख्य परीक्षा के लिए आगर मालवा में कोई केन्द्र नहीं था. आगर मालवा में प्रारंभिक परीक्षा के लिए दो परीक्षा केन्द्र बनाए गए थे. प्रारंभिक परीक्षा फरवरी 2017 में आयोजित की गई थी. यह परीक्षा राज्य सेवा के कुल 507 पदों के लिए थी.

मध्य प्रदेश में राज्य सेवा की परीक्षा तीन चरणों में आयोजित की जाती है. प्रारंभिक परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों पर आधारित होती है. इस परीक्षा में उत्तीर्ण प्रतिभागियों को ही मुख्य परीक्षा देने का अवसर मिलता है. मुख्य परीक्षा क्लीयर करने वालों की इंटरव्यू बोर्ड के समक्ष बुलाया जाता है.

प्रारंभिक परीक्षा के लिए केन्द्र राज्य के सभी 51 जिलों में बनाए जाते हैं. परीक्षा आवेदन ऑनलाइन भरना होता है. प्रारंभिक परीक्षा में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागी अपनी पसंद के जिले का चयन कर सकता है.

सरकारी प्रवक्ता का दावा है कि परीक्षा केन्द्र और रोल नंबर का आवंटन रैंडम होता है. इसमें लोकसेवा आयोग के अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं होती. जैन समुदाय के जिन सत्रह उम्मीदवारों के परीक्षा परिणामों पर संदेह प्रकट किया जा रहा है, उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा पहले ही पास कर ली थी.

आगर मालवा केन्द्र के कुल 47 अभ्यार्थी पास, इनमें 29 जैन

आयोग के अनुसार प्रारंभिक परीक्षा केन्द्र समस्त 51 जिला मुख्यालय में बनाए जाते हैं. आगर मालवा शहर में दो केन्द्र बनाए गए थे. पहला शासकीय नेहरू पीजी महाविद्यालय, आगर मालवा दूसरा एक्सीलेंस हायर सेकेंड्री स्कूल, आगर मालवा. दोनों परीक्षा केन्द्रों पर कुल 624 अभ्यर्थी थे.

इन कुल 624 अभ्यर्थियों में से 58 जैन समुदाय के अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा में उपस्थित थे, जिसमें से 29 अभ्यर्थी पास हुए और 29 अभ्यर्थी फेल हुए. आगर मालवा से कुल 47 अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा में पास हुए. प्रारंभिक परीक्षा में पास 47 अभ्यर्थियों में से मुख्य परीक्षा में कुल 23 अभ्यर्थी पास हुए हैं. इनमें से 18 जैन सरनेम के हैं. प्रदेश में मुख्य परीक्षा में 1528 अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए हैं, जिनमें 60 जैन सरनेम के अभ्यर्थी हैं.

MPPCS JAIN SCAM RESULT

आयोग ने अपने समुदाय विशेष के अधिकारियों का बचाव करते हुए कहा कि प्रारंभिक परीक्षा के संचालन के समय परीक्षा नियंत्रक श्री आर.आर. कान्हेरे पदस्थ थे. उस समय श्री मदनलाल जैन (गोखरू) उप नियंत्रक के पद पर थे. उनका परीक्षा संचालन से सीधा कोई संबंध नहीं था. अन्य परीक्षा नियंत्रक श्री दिनेश जैन केवल मूल्यांकन और परिणाम तैयार करने का काम कर रहे हैं. परीक्षा संचालन, केन्द्र आवंटन, रोल नंबर आवंटन आदि कार्य ये नहीं करते हैं. इसलिए इन कामों में श्री दिनेश जैन और मदनलाल जैन की कोई सीधी या अप्रत्यक्ष भूमिका नहीं रही है.

एक समुदाय के छात्रों को कैसे मिले रोल नबंर

सरकार के दावे को यदि सही मान भी लिया जाए तो सवाल यह उठता है कि एक ही समुदाय के छात्रों को क्रम से रोल नंबर और परीक्षा केन्द्र कैसे मिल गया? शक के घेरे में एमपी ऑनलाइन के अधिकारी भी हैं. मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग के एक पूर्व सचिव ने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि छात्र परीक्षा केन्द्र मिलने के बाद निजी कारणों से केन्द्र बदलने की मांग आयोग से करते हैं. अधिकांश मामलों में केन्द्र बदल दिया जाता है.

इस अधिकारी ने बताया कि यह तो जांच के बाद ही सामने आएगा कि केन्द्र आयोग के स्तर पर बदले गए या फिर एमपी ऑनलाइन ने ही तय किए. एमपी ऑनलाइन में रोल नंबर और केन्द्र आवंटन की प्रक्रिया क्या है, इस बारे में आयोग के अधिकारियों को कोई जानकारी नहीं है. राज्य में एमपी ऑनलाइन की विश्वसनीयता पर लंबे समय से सवाल खड़े हो रहे हैं.

दूरदराज के केन्द्रों में रहती है नकल की संभावना

व्यापमं के घोटाले के बाद मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं को लेकर भी विवाद हो चुका है. आयोग द्वारा सरकारी कॉलेज के प्रोफेसर पद के लिए परीक्षा आयोजित की थी. इस परीक्षा में फर्जी दस्तावेजों के आधार चयन करने का आरोप लगा था. सरकार ने जांच के बाद साठ से अधिक नियुक्तियों को निरस्त कर दिया था. आयोग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मध्यप्रदेश दस से अधिक जिले ऐसे हैं,जहां स्थानीय प्रशासन भी नकल नहीं रोक पाता है. ग्वालियर-चंबल संभाग इसके लिए बदनाम है. आदिवासी जिला डिण्डोरी, मंडला में भी नकल कराए जाने के मामले सामने आते हैं.

प्रारंभिक परीक्षा केन्द्र का चयन कलेक्टर के प्रस्ताव पर किया जाता है. मुख्य परीक्षा केन्द्र कमिश्नर के प्रस्ताव पर तय होता है. आयोग की परीक्षा के पेपर लीक होने के मामले की पुलिस जांच भी चल रही है. शिकायत और कोर्ट के आदेश के बाद कई परीक्षा परिणाम आयोग ने संशोधित किए. जिस परीक्षा परिणाम को लेकर विवाद पैदा हुआ है, उसमें आयोग ने प्रारंभिक परीक्षा होने के बाद दो बार पदों बढ़ाए.

आयोग का मूल विज्ञापन कुल 190 पदों के लिए था. बाद में उसे बढा़कर 359 किया गया और फिर 507 पद कर दिए गए. आयोग कुल पदों की संख्या के आधार पर तीन गुना उम्मीदवारों का चयन करता है. प्रारंभिक परीक्षा होने के बाद बढ़ाए गए पदों के लिए कोई नए आवेदन नहीं बुलाए गए. परीक्षा दे चुके उम्मीदवारों को ही बढ़े हुए पदों का लाभ मिला.

आयोग सदस्य की नियुक्ति को लेकर भी है विवाद

आयोग में सदस्य नियुक्त किए गए डॉक्टर राजेश लाल मेहरा की नियुक्ति को लेकर भी विवाद है. राजेश लाल मेहरा रतलाम के पीजी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे. लोकसेवा आयोग द्वारा उनका चयन इस पद के लिए किया गया था. प्रोफेसर के पद के लिए पीएचडी के साथ-साथ दस साल पढ़ाने का अनुभव भी जरूरी योग्यता है. आयोग ने ऐसे 103 उम्मीदवारों का चयन किया था, जिनके पास जरूरी योग्यता नहीं थी.

हाईकोर्ट के आदेश पर जांच हुई. उच्च शिक्षा विभाग ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी. कमेटी ने जांच रिपोर्ट में पीएससी पर संदेह जाहिर करते हुए कहा कि उसने विज्ञापन जारी होने के बाद अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया और अनुदान प्राप्त गैर सरकारी कॉलेजों के अनुभव को भी मान्य करने का संशोधन किया.

इसका फायदा उठाकर कई अयोग्य उम्मीदवार भी प्रोफेसर बन बैठे. कमेटी ने इसे नियमों के खिलाफ मानते हुए कहा है कि ऐसी पूरी जानकारी विज्ञापन में दी जाना चाहिए. यदि बाद में संशोधन जरूरी था तो पूरी प्रक्रिया निरस्त कर फिर से आवेदन मंगवाने चाहिए थे. कई प्रोफेसरों द्वारा पेश किए गए अनुभव प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए. पीएससी ने उनकी प्रामाणिकता की जांच की जरूरत भी नहीं समझी. जिस विषय में पीएचडी नहीं है, उस विषय में उम्मीदवारों का प्रोफेसर पद पर चयन किया गया.

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