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बाढ़ से अब तक देश में 1 लाख से ज्यादा लोग गंवा चुके हैं अपनी जान

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के दिए आंकड़ों के अनुसार बीते 64 वर्षों के दौरान बाढ़ से हर साल औसतन 1654 लोग मारे गए, 92,763 पशु धन की हानि हुई, औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ और 1680 करोड़ रुपए मूल्य की फसलें बर्बाद हुईं

Updated On: Jul 29, 2018 02:00 PM IST

Bhasha

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बाढ़ से अब तक देश में 1 लाख से ज्यादा लोग गंवा चुके हैं अपनी जान

देश में पिछले 64 वर्षों में बाढ़ के कारण 1 लाख 7 हजार लोगों की मौत हुई है, 8 करोड़ से अधिक मकानों को नुकसान पहुंचा है और 25.6 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में 1,09,202 करोड़ रुपए मूल्य की फसलों को नुकसान पहुंचा है. इतना ही नहीं इन 64 वर्षों में बाढ़ के कारण देश में 2,02,474 करोड़ रुपए मूल्य की जनसुविधाओं का नुकसान हुआ है.

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के आंकड़ों से यह जानकारी हासिल हुई है.

मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में पिछले 64 वर्षों के दौरान बाढ़ से हर साल औसतन 1654 लोग मारे गए, 92,763 पशुओं का नुकसान हुआ, औसतन 71.69 लाख हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, 1680 करोड़ रुपए मूल्य की फसलें बर्बाद हुईं और 12.40 लाख मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं.

1953 से 2017 के दौरान देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बाढ़ के कारण 46.60 करोड़ हेक्टेयर इलाके में 205.8 करोड़ जनसंख्या प्रभावित हुई, 8.06 करोड़ घरों को नुकसान पहुंचा, 53,576 करोड़ रूपए मूल्य की संपत्ति को नुकसान हुआ और 60.29 लाख पशु धन की हानि हुई.

 'सामुदायिक जल प्रबंधन से ही होगा समस्या का समाधान'

मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह के अनुसार, बाढ़ और सूखा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए इन दोनों का समाधान सामुदायिक जल प्रबंधन से ही संभव है. जल के अविरल प्रवाह को बनाए रखना होगा और इस काम से ही जल के सभी भंडारों को भरा रखने के साथ बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

A flood-affected villager swims through the flooded waters of river Ganges after heavy rains at Patna district

उनका मानना है कि सरकार को चाहिए कि अंधाधुंध बांध बनाने की वर्तमान नीति पर पुनर्विचार करे. नदियों के पर्यावरणीय प्रवाह को बनाए रखने पर भी जोर देना चाहिए.

'गांव में बाढ़ से बचने के लिए नहीं कोई व्यवस्था'

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार (एनडीएमए) के पूर्व सचिव नूर मोहम्मद ने कहा कि देश में समन्वित बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया. नदियों के किनारे स्थित गांव में बाढ़ से बचाव के उपाए नहीं किए गए. आज भी गांव में बाढ़ से बचाव के लिए कोई व्यवस्थित तंत्र नहीं है.

उन्होंने कहा कि उन क्षेत्रों की पहचान करने की भी जरूरत है जहां बाढ़ में गड़बड़ी की ज्यादा आशंका रहती है. आज बारिश का पानी सीधे नदियों में पहुंच जाता है. वाटर हार्वेस्टिंग (जल संचय) की सुनियोजित व्यवस्था नहीं है ताकि बारिश का पानी जमीन में जा सके. शहरी इलाकों में नाले बंद हो गए हैं और इमारतें बन गई हैं. ऐसे में थोड़ी बारिश में शहरों में जल जमाव हो जाता है. अनेक स्थानों पर बाढ़ का कारण मानवीय हस्तक्षेप है.

किस राज्य में कितना पड़ा असर?

मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1977 में सबसे अधिक 11,316 मानव जीवन की हानि हुई. जबकि इसी साल 5.5 लाख पशुओं की हानि हुई थी.

वहीं, 1953 से 2012 के बीच बाढ़ के कारण आंध्र प्रदेश में औसतन 348 लोग मारे गए, 5.1 लाख हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ. इस अवधि में बाढ़ से उत्तर प्रदेश में औसतन 298 लोग मारे गए, 17 लाख हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ. बीते 6 दशकों में बाढ़ से बिहार में औसतन 173 लोग मारे गए, 12 लाख हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ.

A man shouts toward a rescue boat as he wades through a flooded village in the eastern state of Bihar

गुजरात में औसतन 172 लोग मारे गए, 3.7 लाख हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ. पश्चिम बंगाल में औसतन 187 लोग मारे गए, 8 लाख हेक्टेयर इलाका प्रभावित हुआ छत्तीसगढ़ में औसतन 109 लोग, महाराष्ट्र में औसतन 89 लोग और तमिलनाडु में औसतन 75 लोग मारे गए.

वर्ष 2005 से 2014 के दौरान देश के जिन कुछ राज्यों में नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में बाढ़ की त्रासदी और जलस्तर के खतरे के निशान को पार करने का एक समान चलन देखा गया है, उनमें पश्चिम बंगाल की मयूराक्षी, अजय, मुंडेश्वरी, तीस्ता, तोर्सा नदियां शामिल हैं. ओडिशा में ऐसी स्थिति सुवर्णरेखा, बैतरनी, ब्राह्मणी, महानंदा, ऋषिकुल्या, वामसरदा नदियों में रही. आंध्र प्रदेश में गोदावरी और तुंगभद्रा, त्रिपुरा में मनु और गुमती, महाराष्ट्र में वेणगंगा, गुजरात और मध्य प्रदेश में नर्मदा नदियों में यह स्थिति देखी गई.

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