S M L

जनरल मोहन भागवत के सपने मुंगेरीलाल वाले हैं लेकिन आइडिया अच्छा है

मुश्किल बस एक ही है: आखिर पता कैसे चले कि जब लट्ठ से वार का मौका आन पड़ेगा तो हमारे ये लठैत अपना जौहर दिखा पाएंगे कि नहीं?

Updated On: Feb 13, 2018 05:41 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

0
जनरल मोहन भागवत के सपने मुंगेरीलाल वाले हैं लेकिन आइडिया अच्छा है

अपने नौजवानी के दिनों में मोहन भागवत जरूर लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ के फैन रहे होंगे. सीरियल में रघुवीर यादव का किरदार खयाली पुलाव पकाने का शौकीन है और ठीक वैसे ही लगता है, आरएसएस प्रमुख ने भी सुंदर सपने देखने की कला में महारत हासिल कर ली है.

एक सपना तो उन्होंने ये देखा कि भारत से जाति-आधारित आरक्षण का चलन खत्म हो गया है. इस सपने के चक्कर में बिहार में बीजेपी की लुटिया ही डूब ही गई. एक सपना उन्हें और आया था. यह एक ऐसे ‘आदर्श समाज’ का सपना था जिसमें महिलाएं घर के कामकाज में ही खुश रहेंगी और उनका काम हमारे ‘समाज, संस्कृति और सभ्यता’ के लिए बच्चे पैदा करने का होगा.

इधर उन्होंने एक और सपना देखा है. इस सपने में आरएसएस देश की सीमाओं का रखवाला है और स्वयंसेवक युद्ध के लिए तैयार सैनिक हैं.

उन्होंने हिन्दुस्तानी फौज की तुलना अपने स्वयंसेवकों से की या नहीं इस पर नुक्ताचीनी हो सकती है लेकिन आइए इस नुक्ताचीनी से हम फिलहाल परहेज करें. चलिए, इस फिक्र को भी छोड़ दें कि मोहन भागवत के बयान को कहीं तोड़-मरोड़कर तो नहीं पेश किया गया क्योंकि इस फिक्र में पड़ेंगे तो जवाब जानने के लिए ज्योतिषियों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं. अब राम जाने क्या वजह है, लेकिन देखने में अक्सर यही आया है कि मोहन भागवत ने कहना कुछ और चाहा लेकिन अर्थ कुछ और ही निकाला गया. ठीक यही कारण रहा जो उन्होंने सिर्फ अपने विजयदशमी वाले भाषण को लाइव टेलीकास्ट करने की अनुमति दी. बाकी हर चीज के लिए उनके प्लान बी यानी अलग से एक योजना हुआ करती है.

सेना में हजारों पद हैं खाली

इस बात से एक मौलिक योजना याद आई. भारत की आबादी तकरीबन 1 अरब 30 करोड़ है. लेकिन भारतीय सेना में अधिकारियों और सैनिकों की लगातार कमी बनी हुई है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2015 में सेना में 55 हजार पद रिक्त थे. इसमें ऑफिसरों के रिक्त पदों की तादाद 11 हजार थी. कल्पना की एक ऊंची छलांग मारकर भागवत ने देश की सेना की ताकत बढ़ाने का एक नायाब नुस्खा खोज निकाला है.

आरएसएस प्रमुख की मानें तो उनके जवान (याद रहे कि शाखा में महिलाएं नहीं होतीं) युद्ध के लिए एकदम तैयार हैं. बस उन्हें तैनात कीजिए, हथियार थमाइए और रणक्षेत्र में भेज दीजिए. फिर देखिए कि दुश्मन कैसे घुटने के बल बैठा नजर आता है! और, गजब ये कि इतना सारा कुछ बस चुटकी बजाते हो जाएगा. इधर आप मसाला मैगी पकाने के लिए पतीला गरमाएंगे कि उधर स्वयंसेवक जंग जीत लेंगे.

ये भी पढ़ें: क्या संघ के स्वयंसेवक हैंडग्रेनेड चलाना सीखते हैं?

कर्मठ हैं संघ स्वयंसेवक

ऐसी मुस्तैदी दरअसल हाफ पैंट में बरसों की जंगी कवायद सीखने के बाद ही आती है. और घुटनों के ऊपर चढ़ी हुई उस हाफ-पैंट का भी क्या कहना! हाल के दिनों तक वह कुछ इतनी ऊंची हुआ करती थी कि स्वयंसेवक के लिए ठीक से बैठना भी मुहाल था. किसी को याद दिलाना होता था कि भाई, पैर मोड़कर बैठिए! खुद स्वयंसेवक ही बताते हैं कि उन्हें नजदीक के पार्क में शाखा बाबू की देखरेख में महीनों लठ्ठ को तेल पिलाना होता है ताकि उसमें चमक आए.

rss sayam sevak sangh training

स्वयंसेवक घंटों संघ की पहचान का पता देते झंडे को सलामी देने का रियाज करता है ताकि हाथ को सही कोण पर मोड़ने का अभ्यास हो जाए. उसे ‘नमस्ते सदा वत्सले’ का युद्ध-नाद ठीक-ठीक बोलने का अभ्यास करना होता है, चाहे ऐसा करते हुए गला बैठ क्यों ना जाए! स्वयंसेवक अपनी लाठी से दुश्मन को भले ही ना मार पाए लेकिन यह तो माना ही जा सकता है कि कच्छाधारी स्वयंसेवक जब रोएंदार पुट्ठों पर ताल देकर ललकारेंगे तो उन्हें देख दुश्मन के पांव उखड़ जाएंगे. बेशक, स्वयंसेवकों को सीमा पर तैनात करने की जरूरत है!

लेकिन जौहर दिखा पाएंगे?

मुश्किल बस एक ही है: आखिर पता कैसे चले कि जब लट्ठ से वार का मौका आन पड़ेगा तो हमारे ये लठैत अपना जौहर दिखा पाएंगे कि नहीं? आजादी की लड़ाई में संघ के जौहर का इम्तिहान नहीं हो पाया था. नेताजी के आजाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए संघ के स्वयंसेवक झुंड के झुंड नहीं दौड़ पड़े थे. साल 1962, 1965, 1971 और फिर करगिल युद्ध में भी उनके लट्ठ कंधे पर ही टंगे रहे, जंग के जौहर ना दिखा सके. ऐसे में हम कैसे यकीन करें कि हमारे ये लट्ठधारी लड़ाके दुश्मन की उस प्लाटून के खिलाफ अपना जंगी जौहर दिखा पाएंगे जो क्लाश्निकोव, रॉकेट लांचर और शायद कम ताकत की एटमी वारहेड से भी लैस है. यह खयाल हम भारतीयों के पेट में मरोड़ उठाने के लिए काफी है!

ये भी पढ़ें: दलितों की नाराजगी दूर करने की कोशिश, मेरठ सम्मेलन से माहौल सुधारेगा संघ!

रक्षा बजट भी बचेगा

अव्याहारिक होने के इस छोटी सी बात को, जो जंग के मैदान में हार का कारण बन सकती है, छोड़ दें तो फिर जहां तक सिद्धांतों का सवाल है, मोहन भागवत के सुझाव के फायदे ही फायदे हैं. एक फायदा तो यही है कि स्वयंसेवक मातृभूमि के प्रति प्राणपण से निष्ठा रखते हैं सो वे अपनी सेवा निशुल्क प्रदान करेंगे और रक्षा के मद में बजट का बोझ कम होगा. वैसे भी इस मद में रकम पहले से ही कम है. चूंकि स्वयंसेवकों को पहले से ही यूनिफार्म उपलब्ध हैं- और अब तो कच्छा की जगह फुलपैंट ने ले ली है- सो अर्थव्यवस्था को उनकी वेषभूषा पर खर्च का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा.

FirstCutByManjul1201201811

और चूंकि चाचा चौधरी की तरह स्वयंसेवक युद्ध के मैदान में अपनी झालरदार मूंछों और लाठी के साथ जाते हैं सो उनकी मौजूदगी से भारत को सुरक्षा के मद में खर्चा कम करने में मदद मिलेगी, हथियारों के सौदागर अपना सा मुंह लेकर अपने-अपने घर जाएंगे. विन चड्ढा को बाय-बाय, ओत्तावियो क्वात्रोच्चि को भी बाय-बाय! और फिर राहुल गांधी के पास भी कहने को क्या रह जाएगा, कोई राफेल डील ही ना होगी जो वे शिकायत करें.

ये भी पढ़ें: संघ से जुड़े संगठन ने बीजेपी सरकार पर लगाया भ्रष्टाचार का आरोप

लीजिए, अब मोर्चा आप संभालिए मेजर मोहन भागवत! ईश्वर आप पर और उन हाफ पैंट्स पर सदा सहाय रहें जिन्हें आपने बड़ी बुद्धिमानी से समय रहते रिटायर कर दिया, वर्ना वे देशभक्त स्वयंसेवक जिन्हें आपने अपने सपने में देखा था, आखिर सियाचिन की लंबी ठंड कैसे गुजार पाते!

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi