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सूर्य नमस्कार पर विवाद: क्या सजदा पृथ्वी नमस्कार जैसा नहीं?

क्रिकेटर मोहम्मद कैफ के सूर्य नमस्कार जैसी आसन मुद्राओं पर कुछ कट्टरवादी भड़क गए हैं.

Updated On: Jan 02, 2017 05:10 PM IST

Mridul Vaibhav

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सूर्य नमस्कार पर विवाद: क्या सजदा पृथ्वी नमस्कार जैसा नहीं?

क्रिकेटर मोहम्मद कैफ के सूर्य नमस्कार जैसी आसन मुद्राओं पर कुछ मुसलिम कट्टरवादी भड़क गए हैं. कट्टरता चीज ही ऐसी होती है. कट्‌टरता दरअसल आंख की उस पुतली की तरह होती है, जिस पर जितनी रोशनी पड़ती जाती है, वह सिकुड़ने लगती है या देखना बंद कर देती है. फिर भले वे किसी धर्म के कट्‌टरवादी क्यों न हों.

कैफ ने शायद सूर्य नमस्कार के भाव से आसन की वह मुद्राएं नहीं की होंगी, लेकिन उन्होंने शारीरिक क्रियाओं के रूप में इन मुद्राओं को जरूर अपनाया होगा. लेकिन अगर एक रोचक चीज देखें तो योग और नमाज की मुद्राओं में कई चीजें बड़ी रोचक हैं.

मंदिर में लाेग जब आंखें मूंदकर और सावधान मुद्रा में खड़े होकर जब प्रार्थना करते हैं और नमाज पढ़ते समय जब अल-कय्याम मुद्रा में होते हैं तो इनमें ज्यादा क्या फर्क जाता है? बस इतना सा कि मंदिर में हम हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं और नमाज के समय हम अपने हाथों को उदर के पास एक दूसरे पर रखकर आंख मूंद लेते हैं.

हम जब गुरुद्वारे में जाकर गुरु भगवान से प्रार्थना करते हैं तो जिस मुद्रा में अपनी भावाभिव्यक्ति प्रकट करते हैं, उसमें और नमाज के समय सजदा करने में क्या आप कोई फर्क महसूस करते हैं? ये दोनों मुद्राएं बिलकुल एक जैसी हैं.

अगर आपने कभी सिख पंथ में निशान साहब को ठीक से देखा हो तो जरा याद करें. अब आप एक बार ईरान के राष्ट्रीय ध्वज के बीच के निशान को गौर से देखें. क्या इन दोनों में आपको कोई समानता नजर नहीं आई? ये हैरानीजनक चीजें क्यों हैं? ईरान की राजधानी तेहरान और भारत की राजधानी दिल्ली के बीच तो ढाई हजार किलोमीटर से ज्यादा की दूरियां हैं.

ऐसा लगता है कि हमारे सिख धर्म का शानदार चिह्न निशान साहब जैसे ईरान के ध्वज के बीच बीचो बीच ऐसे है, जैसे तिरंगे में चक्र. ये कैसे हो गया? जवाब ये है कि जैसे कट्‌टर हम आज हो गए हैं, वैसे हमारे पुरखे कभी नहीं रहे.

बाबा नानक मक्का और मदीना तक गए थे और वे ये निशान साहब और सजदा जैसी परंपराएं वहां से बड़े खुले दिलोदिमाग से यहां ले आए. ऐसी खुली सोच से ही उन्होंने एक विशाल धर्म की नींव डाली, जिसमें ईश्वर अल्लाह की तरह सर्व व्यापक, बिना किसी मूर्ति का, निराकार, दयालु और एक अोंकार है.

जामा मस्जिद

प्रतीकात्मक तस्वीर।

एक क्रिकेटर मुहम्मद कै़फ तो ट्विटर हैंडल पर सूर्य नमस्कार करते हुए अपनी तस्वीरें साझा करके विवाद में फंस जाता है, लेकिन क्या कभी किसी ने इस्लाम में नमाज पढ़ते समय सजदे के बारे में सोचा है?

भारत में अगर कुछ लोग एक खास तरह की मुद्रा को सूर्य नमस्कार नाम देते हैं तो क्या सजदे की यह मुद्रा पृथ्वी नमस्कार मानकर ग्रहण नहीं की जा सकती. हम अगर योग के आसनों को देखें तो हमारे यहां तरह-तरह के नमस्कार हैं, लेकिन पृथ्वी नमस्कार जैसी कोई मुद्रा नहीं है.

शायद बाबा नानक ने कुछ इसी सोच से इस मुद्रा को लिया हो. सजदा हम कहां नहीं करते. बहुत से हिन्दू मंदिरों में तो साष्टांग नमस्कार करते हैं, लेकिन जब वे पीरों-फकीरों की दरगाहों पर कामनाएं लेकर जाते हैं तो वहां वे साष्टांग नहीं, सजदा ही किया करते हैं.

अगर कट्‌टरता से जरा बाहर आकर सोचें तो नमाज की सभी आठ दस मुद्राएं योग या शारीरिक क्रियाओं की मुद्राएं ही हैं. नमाज करने वाला हर मुसलमान दिन में पांच बार जब ईश्वर से प्रार्थना करता है तो वह शरीर की ये मुद्राएं अवश्य ही करता है. और क्या इसका उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर फर्क नहीं पड़ता होगा? नमाज में भले कय्याम की दोनों मुद्राएं हों या रुकू, तकबीरत हो या तशहुद या फिर सजदा, ये शारीरिक क्रियाएं ही तो हैं. ये भी तो एक तरह का योग ही हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

हमारे देश में एक चीज और भ्रमित करती है. वह है हमने आसनों को योग का नाम दे दिया है. योग अलग चीज है और आसन अलग. आसन योग का एक अंग हैं, आसन का योग नहीं है. योग अगर एक पेड़ है तो आसन उसका एक हिस्सा भर है. लिहाजा अगर कैफ ने कुछ आसन कर भी लिए तो उन्होंने योग नहीं किया.

सूर्य नमस्कार की मुद्रा एक आसन है, लेकिन वह योग की धार्मिक मुद्रा तब बनती है जब आप इस मुद्रा में होते हुए सूर्य को अर्घ्य दें. लेकिन भारत में जिन दिनों योग और अासनों का सृजन हुआ, उन दिनों तो देवताओं की कल्पना कुछ अलग तरह की थी.

अकबर इलाहाबादी का एक मशहूर शेर है कि हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं मारा, चोरी तो नहीं की है. हर जर्रा चमकता है अनवारे इलाही से, हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है.

सच है कि अब पूरी दुनिया में कट्‌टरता का दौर है और इस दौर में अकसर कट्टरता के बुत खुली सोच और मजहब के संकीर्य दायरे तोड़कर इनसानियत को जीने वाले लोगों पर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे लोगाें को सदा यह याद रखना चाहिए कि हिन्दू और मुसलमान बुजुर्ग दोनों ही अपने दीन और धर्म को याद करते समय एक ही जैसी माला के मनकों को फेरते हैं.

एक ईश्वर को याद करता है और दूसरा अल्लाह को. अब या तो यह याद रखने की जरूरत है कि सूर्य नमस्कार हो या सजदा, हम सब एक दूसरे को माला के मनके मानें या कह दें : वो जो तस्बीह (माला) लिए बैठा है, उसे मेरे सामने से उठा दे साकी!

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