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आम बजट 2017: क्या ये साल किसानों के लिए रिफॉर्म लाएगा?

बजट से पहले कृषि क्षेत्र में मोदी के ग्रैंड प्लान पर एक नजर

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Jan 27, 2017 05:50 PM IST

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आम बजट 2017: क्या ये साल किसानों के लिए रिफॉर्म लाएगा?

हरित क्रांति का 'ज्यादा उगाओ और ज्यादा कमाओ' का वायदा क्या जारी रहेगा? 1978 से लेकर अब तक अनाज उत्पादन के मामले में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में है.

2011-12 के दौरान अनाज उत्पादन के लक्ष्य से 22 मिलियन टन अधिक उत्पादन हुआ. 12वीं पंचवर्षीय योजना में भी 25 मिलियन टन अतिरिक्त अनाज उगाने का लक्ष्य रखा गया है.

इन अच्छे आंकड़ों के साथ ही एक दुखद पहलू भी जुड़ा हुआ है, इसी दौरान नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो आफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक 5,650 किसानों ने आत्महत्या की. अगर किसानों की आत्महत्या के मुद्दे को देखें तो 2005 से लेकर 10 साल तक के दौरान किसानों की आत्महत्या की दर प्रति एक लाख पर 1.4 से 1.8 के बीच है. यह एक गंभीर समस्या है.

'भारत' बनाम 'इंडिया'  

ऐसे समय में जब हमारे किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं, तो क्या इस बात की खुशी मनाना ठीक है कि हम खाद्यान्न मामले में आत्मनिर्भर हैं?

विकास ब्रांडेड सरकार की एक कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत है. राष्ट्रवाद की तरह यह मात्र उत्तेजना या जोश बढ़ाने वाली चीज नहीं है. वास्तविक बदलाव के लिए हमें अपने रास्ते को उत्पादन के बजाय प्रॉफिट पर लाना पड़ेगा.

एक तरफ 'इंडिया' है, जो डिजिटल है, कॉरपोरेट है और दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है. दूसरी तरफ 'भारत' है जो मिट्टी का एहसास कराता है और 'इंडिया' के लिए अनाज उगाता है.

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'कृषि क्षेत्र को विभिन्न पाबंदियों से मुक्त कराने और ऐसी सीमाएं जो किसानों की आय और विकास में बाधा बन रही है' के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने पत्र के माध्यम से साउथ ब्लॉक में एक बैठक बुलाई.

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इसमें कैबिनेट सेक्रेटरी, एग्रीकल्चर सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सेक्रेटरी, कंज्यूमर अफेयर सेक्रेटरी, मुख्य आर्थिक सलाहकार और पर्यावरण मंत्रालय के सेक्रेटरी ने बैठक में हिस्सा लिया. पीएमओ ने अपने नोट में इस बात पर जोर दिया कि कृषि नीतियां ऐसी नीतियों के अवशेषों से घिरी हुई है जो कृषि क्षेत्र को लगातार कमजोर बनाने का काम कर रही हैं.

सुझाव के मुताबिक इस बार मामला अलग है, क्योंकि कृषि नीतियों को सुधारने के लिए आजादी के बाद ऐसा कदम कभी नहीं उठाया गया. हाल ही में तेलंगाना (मेडक जिला), तमिलनाडु (इरोड) और पंजाब (मालेरकोटला) में किसानों की आत्महत्या जैसे कदम उठाने को देखते हुए इसे एक स्वागतयोग्य कदम माना जा सकता है.

पुरानी और बेकार नीतियों को बदलने की जरूरत 

इस बात ने एक और गंभीर मुद्दे को जन्म दिया है, किसानों की आत्महत्या करने की वजह क्या है, वो हमारी पुरानी नीतियां हैं या फिर कमियों से भरे ऐसे कदम जो किसानों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए लाए गए थे?

फ़र्स्टपोस्ट को मिले एक्सक्लूसिव सरकारी नोट से पता चलता है कि एग्रीकल्चर रिफॉर्म के तहत एसेंशियल कमोडिटीज ऐक्ट, 1955 और दूसरी पुरानी हो चुकी नीतियों को समाप्त किया जा सकता है. सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि ऐक्ट कीमतों को रोकने में कामयाब नहीं हो पाया है.

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सरकार के नोट के मुताबिक, 'कालाबाजारी और ब्लैक मार्केटिंग को रोकने के लिए एसेंशियल कमोडिटीज ऐक्ट को लगाया जाता है. इस एक्ट के बावजूद कीमतों में तेज वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है... सिस्टम को नियंत्रित करने के बजाय सरकार नियम बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगी.'

पिछले साल एक किलो तूर दाल की कीमत 175-180 रुपये के बीच चल रही थी. कुछ समय पहले यह कीमत 150 रुपए पर थी. एक और बिंदु के मुताबिक सरकार एग्रीकल्चर कमोडिटीज में फ्यूचर ट्रेडिंग पर पाबंदी लगा सकती है. लेकिन, यहां पर सवाल यह उठता है कि सरकार हजारों छोटे ट्रेडर्स पर कैसे नजर रखेगी?

पिछले साल प्रधानमंत्री ने यूनिफाइड एग्रीकल्चर मार्केट के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म की शुरुआत की थी. इस पर पीएमओ ने टिप्पणी की है. इसके मुताबिक, 'अभी तक प्रगति बहुत धीमी रही है. यहां तक कि कमोडिटी के चुनाव के मामले में भी सीमाएं हैं और कुछ मामलों में यह गलत है.'

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एक्सपर्ट का मानना है कि इसकी वजह संसाधनों में कमी है. उनका मानना है, जब तक पूरे राज्य में एक बड़ा प्लेटफॉर्म न हो, गुणवत्ता में सुधार न हो, ट्रांसपोर्ट को न सुधारा जाए और ट्रेडर्स-किसानों के बीच सीधी बातचीत न हो, तब तक किसानों की स्थिति में सुधार नहीं होगा. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के अकोला, गुजरात के वडोदरा, पंजाब के फरीदकोट, कर्नाटक के बीजापुर और तमिलनाडु के त्रिनावेली के कपास मार्केट में एक प्लेटफॉर्म से पहुंच होनी चाहिए.

एक्सपर्ट का कहना है कि जब तक हम स्टैंडर्ड मानक तैयार नहीं करते, तब तक पारदर्शी और निष्पक्ष आनलाइन सेल मुश्किल है. उदाहरण के लिए काजू बीज (निर्यात कमोडिटी) के लिए मानक तय हैं. डब्ल्यू 280 का मतलब है एक पौंड में 280 सफेद बीज मिलेंगे. इसी तरह बड़े नट, टूटे नट और प्रीमियम नट के लिए अलग बाजार है.

एग्रीकल्चर मार्केटिंग एक्सपर्ट का मानना है कि अच्छी कीमतें ही किसानों को गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रेरित करेंगी. रत्नागिरी में किसानों ने अल्फांसो आमों की ‘प्राकृतिक रूप से पके’ के रूप में ब्रांडिंग की है.

vegetable market

सीधी बिक्री का रास्ता किसानों के लिए कितना आसान?

शॉर्ट टर्म में रिफॉर्म के लिए सरकार के बीच कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को और छूट देने की बात चल रही है. इसे पहली बार 2003 में लाया गया था, लेकिन तब से लेकर अब तक इस दिशा में कोई खास काम नहीं किया गया है.

पीएमओ के नोट में उत्पाद को सीधे प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और निर्यातकों को बेचने का प्रस्ताव दिया गया है. एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी एक्ट (एपीएमसी) इमें एक बड़ी रूकावट है. इस महत्वपूर्ण सुझाव में कहा गया है, 'मौजूदा संबंधित ऐक्ट के तहत ही बिना किसी मिडिलमैन को शामिल किए बगैर उत्पादकों को सीधे बिक्री करने की आजादी होनी चाहिए.'

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पंजाब स्टेट एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन रवींद्र सिंह चीमा को इस बात पर संदेह है. उनका मानना है कि क्या किसानों के पास खरीदार खोजने और डायरेक्ट सेल करने का समय है? और अगर किसान यह सब करेंगे तो इस बीच उनके खेतों की देखभाल कौन करेगा?

फूड एंड ट्रेड पॉलिसी एनालिस्ट देविंदर शर्मा का मानना है कि सरकार जिस कदम को एक महत्वपूर्ण रिफॉर्म बता रही है, वह कॉरपोरेट जगत को लाभ पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं है. शर्मा का मानना है आर्थिक समझ और कॉमन सेंस के बीच कोई मेल नहीं है.

उनका कहना है, 'डायरेक्ट सेल कर रहे 94 फीसदी किसानों से पूछना चाहिए क्या वे अच्छा कर रहे हैं? पंजाब में एपीएमसी मंडी है. यहां पर किसानों को प्रति क्विंटल गेहूं की कीमत 1,500 रुपये मिलती है. इसके उलट बिहार में एपीएमसी मंडिया बाजार को नियंत्रित नहीं करती हैं, वहां पर किसानों को प्रति क्विंटल 1,000 रुपये से ज्यादा नहीं मिलता है. मेरा सवाल है अगर एपीएमसी की अनुपस्थिति फायदेमंद होगी तो बिहार में स्थिति खराब क्यों है?'

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किसानों के हिमायती ग्रुप 'विदर्भ जन आंदोलन समिति' के लीडर किशोर तिवारी का सवाल है कि अगर सरकार 1.5 लाख मीट्रिक टन तूर दाल खरीदने के लिए प्रतिबद्ध है तो सरकार भंडारण केवल पांच फीसदी क्यों करती है?

उनका कहना है, 'भंडारण की अनुमति नहीं, कोई लाइसेंस नहीं, ऐसे में एजेंट किसानों से सामने मुश्किलें पैदा करते रहेंगे. सरकार को खरीदारी की शर्तों में ढील देनी चाहिए.'

wheat

एमएसपी पॉलिसी में बदलाव कितना फायदेमंद?

एक और अहम बदलाव के तहत फल और सब्जियों को एपीएमसी ऐक्ट से बाहर ले जाने का है. इसके पीछे दलील है कि इससे बड़ी संख्या में किसानों को मदद मिलेगी. फल और सब्जियों के उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है.

नेशनल हॉर्टीकल्चर बोर्ड के मुताबिक, 2014-15 के दौरान भारत में फलों का उत्पादन 86.602 मिलियन मीट्रिक टन रहा. इसी दौरान सब्जियों का उत्पादन 169.478 मिलियन मीट्रिक टन रहा. इस दौरान फलों का पैदावार क्षेत्र 6.110 मिलियन हेक्टेयर रहा. सब्जियों का जुताई क्षेत्र 9.542 मिलियन हेक्टेयर रहा.

एक्सपर्ट इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य ने एपीएमसी एक्ट को समाप्त कर दिया लेकिन उन्होंने प्राइमरी प्रोसेसिंग सुविधाओं और कोल्ड स्टोरेज बनाने पर खास ध्यान दिया है.

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एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन रिसर्च, बेंगलुरु के डॉक्टर श्रीनाथ दीक्षित का कहना है, 'ऐसे संस्थान खड़े करने की जरूरत है जो किसानों को गुणवत्ता सुधारने में मदद करें. टमाटरों को मात्र इकट्ठा करने की बजाय उनकी ग्रेडिंग जरूरी है. यही केवल एक तरीका है जो किसानों के लिए कीमत 55-60 फीसदी तक बढ़ा सकता है. कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में यह काम हो रहा है.'

उदाहरण के लिए, सीधे टमाटर बेचने के बजाय कर्नाटक के कोलार के किसान प्यूरी बनाने वाली इकाइयों का लाभ उठा सकते हैं. मौजूदा समय में प्यूरी चीन से आयात की जा रही है. प्यूरी, जैम और केचअप इंडस्ट्री के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

छत्तीसगढ़ में कोई एपीएमसी नहीं है फिर भी किसानों को टमाटर गलियों में क्यों फेंकना पड़ रहा है?

पीएमओ नोट में मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) पर भी बात की गई है. नोट में कमियों को स्वीकार करते हुए किसानों के हित सुरक्षित करने का रास्ता बताया गया है.

इसमें कहा गया है, 'केंद्र सरकार की एमएसपी पॉलिसी की वजह से कई फसलों और राज्य सरकारों को भेदभाव झेलना पड़ रहा है, क्योंकि यह केवल तीन फसलों के लिए ही प्रभावी है. कीमतों में तेज गिरावट होने पर किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए नए कदम जरूरी हैं, कीमतों के जोखिम से किसानों को बचाने के लिए कीमत में अंतर का भुगतान सबसे अच्छा आर्थिक हथियार है.'

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एमएसपी से किसानों को बेहतर निर्णय लेने में आसानी होती है, क्योंकि कीमतों को पहले ही घोषित करना सरकार की खरीदारी की इच्छा को स्पष्ट बताती है.

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हाल में दालों की रिकॉर्ड पैदावार हुई. इसके लिए प्रोग्राम चलाया गया, बीजों को उपलब्ध कराया गया. साथ ही किसानों को तकनीकी ट्रेनिंग भी दी गई. कृषि विज्ञान केंद्र देश भर में किसानों को नई तकनीकी की ट्रेनिंग देते हैं.

दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि एमएसपी के दायरे को बढ़ाया जाए. उनका कहना है कि अगर सरकार अनाज का भंडारण नहीं कर सकती है तो खरीदारी कैसे? कीमत तय करने के साथ ही भंडारण सुविधाओं को भी बढ़ाना बहुत जरूरी है. प्राइवेट सेक्टर पहले ही उत्पाद को खरीदने की इच्छा जता चुका है.

शर्मा का कहना है, 'मॉडल प्राइसिंग के तहत कीमत तय की जाती है. इसके अनुसार अगर सुबह कीमत तय की गई है तो कीमत दिन भर वही रहेगी. अब अगर कीमत 30 पैसा तय कर दी गई तो उससे किसानों का भला कैसे होगा?'

तूर दाल की एमएसपी 4,625 रुपये प्रति क्विंटल तय करने के बावजूद यह काफी कम कीमतों पर बेची जा रही है. 2016-17 के लिए तूर दाल की एमएसपी को 5,050 रुपये प्रति क्विंटल करने का सुझाव दिया गया है.

खरीद-बिक्री की कीमतों पर लगाम जरूरी 

किसान हितों के एक्टिवस्ट का कहना है कि देश को किसानों के लिए आय स्रोत देने की जरूरत है. उनका कहना है कि किसानों और उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए खरीद और बिक्री की कीमत पर लगाम की जरूरत है.

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वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, '2031 तक भारतीय शहरों की आबादी 600 मिलियन हो जाने का अनुमान है. बेहतर ढंग से प्रबंधित शहरीकरण से इन लोगों को बहुत लाभ मिलेगा. भारत की सहायता करने के लिए नई रणनीति के मुताबिक गांवों से शहरों में प्रवास को प्रोडक्टिव बनाने के लिए विकास, इनक्लूजन और शहरों में रहन-सहन को सुधारने पर ध्यान दिया जा रहा है.'

'यह ध्यान खासतौर पर टियर-2 शहरों पर दिया जा रहा है, जहां जनसंख्या बढ़ रही है. इसके साथ आर्थिक और सामाजिक ढांचे में कृषि को लगातार महत्व दिए जाने से यह रणनीति कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेगी.'

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण पर ज्यादा जोर देने और खाद्य कीमतें कम रखने के कारण पैदा हुई विसंगतियां किसानों को गांव छोड़ने पर मजबूर करेंगी.

 

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