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'मोदी केयर' चुनावी शिगूफा नहीं: पीएम ने जनवरी 2016 में की थी पहल, दो साल में बनी योजना

नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम के तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा की सुविधा दी जाएगी

Updated On: Feb 07, 2018 10:45 AM IST

Yatish Yadav

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'मोदी केयर' चुनावी शिगूफा नहीं: पीएम ने जनवरी 2016 में की थी पहल, दो साल में बनी योजना

सालाना बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 'आयुष्मान भारत' नाम से एक फ्लैगशिप योजना को लॉन्च किया. जिसे 'नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम' के तहत अमल में लाए जाने का ऐलान किया गया है. नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना माना जा रहा है. इस योजना को 'मोदी केयर' भी कहा जा रहा है. नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम (राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना) के तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा (हेल्थ इंश्योरेंस) की सुविधा दी जाएगी. यह योजना नए वित्त वर्ष यानी 1 अप्रैल 2018 से लागू होगी. मतलब यह कि गरीब परिवारों के लोग आगामी 1 अप्रैल से 5 लाख रुपए तक का इलाज मुफ्त में करवा सकेंगे.

'मोदी केयर स्कीम' ट्रस्ट मॉडल या इंश्योरेंस मॉडल की तर्ज पर काम करेगी. यानी इस योजना का लाभ उठाने वाले गरीब मरीजों का बीमा (इंश्योरेंस) किया जाएगा. और फिर गरीब मरीज किसी भी सरकारी या प्राइवेट अस्पताल में कैशलेस इलाज करा सकेंगे. रिइंबर्स मॉडल को इस योजना से दूर रखा गया है. यानी पहले खुद के खर्चे से इलाज करवाकर सरकार से पांच लाख रुपए तक की रकम वापस पाने का झंझट इस योजना में नहीं होगा.

'मोदी केयर' एनडीए सरकार की सबसे बड़ी योजना

'मोदी-केयर' को एनडीए सरकार की सबसे महत्वकांक्षी योजना माना जा रहा है. सरकार ने भले ही इसका ऐलान 2018 के बजट में किया है, लेकिन इस योजना की पहल दो साल पूर्व ही हो चुकी थी. दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में दिल्ली के साउथ ब्लॉक स्थित अपने कार्यालय में इस मुद्दे पर एक अहम बैठक की थी. उस बैठक में अलग-अलग मंत्रालयों के 11 वरिष्ठ नौकरशाह (ब्यूरोक्रेट्स) शामिल हुए थे.

धारणाओं के विपरीत, प्रधानमंत्री की स्वास्थ्य सेवा योजना कोई लोकलुभावन तरकीब या हवा हवाई विचार नहीं है. और न ही प्रधानमंत्री का मकसद इस योजना के जरिए 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए समर्थन जुटाना है. साल 2016 में प्रधानमंत्री मोदी और नौकरशाहों के बीच हुई वह बैठक बहुत खास थी. उस बैठक में प्रधानमंत्री ने पावर पॉइंट प्रेज़ेंटेशन दिया था. जिसके जरिए उन्होंने वहां मौजूद नौकरशाहों को स्वास्थ्य के क्षेत्र (हेल्थ सेक्टर) में अपनी उम्मीदों और अपेक्षाओं से अवगत कराया था. यानी प्रधानमंत्री मोदी की बहुत पहले से यह दिली तमन्ना थी कि गरीबों के लिए एक स्वास्थ्य सुरक्षा योजना होना चाहिए. इसके अलावा वह भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के तौर-तरीकों में भी ढांचागत बदलाव लाने के बारे में अरसे से सोच रहे थे.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ नौकरशाहों की उस बैठक के बाद स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुसंधान (रिसर्च) के लिए आला अफसरों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और बुद्धिजीवियों का एक दल गठित किया गया. उस दल में मौजूदा वित्त सचिव हसमुख अधिया भी शामिल थे, जो उस वक्त वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग में काम करते थे. हसमुख अधिया को उस दल का विशेष दूत नियुक्त किया गया था. उनके अलावा दल में तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बीपी शर्मा और वैज्ञानिक सौम्य स्वामीनाथन भी थे. उस वक्त केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों के 30 संयुक्त सचिवों की मदद से अधिया और उनकी टीम ने 9 अहम बैठकें की थीं. इन बैठकों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में आमूल-चूल बदलाव लाने के मसले पर माथापच्ची की गई. बैठकों के दौरान स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिष्ठित हस्तियों के सुझावों पर भी गौर किया गया. इनमें डॉ. अभय बंग, डॉ. देवी शेट्टी और डॉ. नंपेरुमलासामी के सुझावों का खास अध्ययन किया गया.

2016 में तैयार हुआ खाका

साल 2016 के मध्य में, तमाम मंथन के बाद नौकरशाहों ने एक सुसंगत और नीतिगत ख़ाका (रोडमैप) तैयार किया. अपने रोडमैप के साथ नौकरशाह प्रधानमंत्री मोदी के पास पहुंचे और उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना शुरू करने का सुझाव दिया. इस सुझाव के साथ प्रधानमंत्री को 'यूनिवर्सल एक्सेस एंड क्वालिटी' नाम के शीर्षक वाली 28 पन्नों की एक रिपोर्ट भी सौंपी गई थी. इस रिपोर्ट में हसमुख अधिया, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बीपी शर्मा, आयुष सचिव अजीत एम शरण, महिला एवं बाल विकास सचिव वी सोमसुंदरन, खाद्य और सार्वजनिक वितरण सचिव वृंदा सरुप, सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण सचिव अनीता अग्निहोत्री, स्कूल शिक्षा सचिव सुभाष सी खुंटिया और विदेश मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव मुक्ता तोमर के दस्तखत थे. इन लोगों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में खामियों, क्षमताओं और संभवनाओं की गहन जांच की थी, ताकि देश में एक समग्र और गुणवत्ता वाला विश्वसनीय नीति तंत्र तैयार किया जा सके.

हसमुख अधिया की टीम ने स्वास्थ्य सेवा योजना पर जो प्रस्ताव दिया था, फ़र्स्टपोस्ट ने उसकी समीक्षा की है. इस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, सरकार को सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) के आधार पर 10 करोड़ गरीब और वंचित परिवारों को मुफ्त में स्वास्थ्य सुरक्षा मुहैया करानी होगी. दो साल बाद, अब यह प्रस्ताव हकीकत में बदलने जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 'इस योजना के दायरे में देश के सभी नागरिकों को लाया जाना चाहिए. 10 करोड़ वंचित परिवारों (एसईसीसी के अनुसार) को इस योजना का लाभ मुफ्त में मिलना चाहिए, जबकि अन्य नागरिकों को भुगतान के आधार पर इस योजना की सुविधा मिलना चाहिए.'

स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के संबंध में रिपोर्ट में कहा गया है कि, 'सेवाओं के गुणवत्ता मानकों को स्पष्ट रूप से परिभाषित और व्यापक रूप से प्रचारित किया जाना चाहिए. इस योजना को निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के द्वारा कार्यान्वित किया जाना चाहिए. राज्य स्तर की स्वास्थ्य संस्थाएं और ट्रस्ट इस योजना को सीधे तौर पर लागू कर सकते हैं. योजना के तहत कैशलेस स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने वाले लोगों का ऑनलाइन रिकार्ड होना चाहिए. सूचीबद्ध स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और राज्य की स्वास्थ्य संस्थाओं के पास योजना के लाभार्थियों के बायोमेट्रिक सत्यापन की सुविधा होगी.' रिपोर्ट में योजना की अनुमानित लागत 10,000 करोड़ रुपए आंकी गई है. साथ ही केंद्र और राज्य के खर्च का अनुपात 60-40 रखने की सिफारिश की गई है.

प्रधानमंत्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में नौकरशाहों ने इस योजना को लागू करने के लिए विभिन्न चरणों का सुझाव दिया था. योजना के कार्यान्वयन से पहले, सुझाव दिया गया था कि 10 करोड़ परिवारों का एसईसीसी डेटा उपलब्ध कराया जाए, ताकि सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता और राज्य स्वास्थ्य संस्थाएं उनका उपयोग कर सकें. एक सुझाव यह भी था कि, राज्य की स्वास्थ्य संस्थाएं निजी और सार्वजनिक अस्पतालों से आवेदन मांग सकती हैं, ताकि योजना के अंतर्गत आने वाले लोग किसी भी पब्लिक या प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल में जाकर कैशलेस कार्ड के ज़रिए अपना इलाज करा सकें. लेकिन इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से रेफरल लैटर लेना अनिवार्य होगा. अधिकारियों ने पाया है कि, स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉक्टरों की कमी की समस्या हल करना दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है.

Health issues identified - Page 1

नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री को बताया था कि, 'देश में करीब सात लाख आयुष डॉक्टर मौजूद हैं. इन आयुष डॉक्टरों को छह महीने का ब्रिज कोर्स करवा कर एलोपैथिक दवाओं के नुस्खे लिखने में सक्षम बनाया जा सकता है. उसके बाद इन आयुष डॉक्टरों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात किया जा सकता है. ऐसा करने से कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष डॉक्टरों की मौजूदगी से लाभ मिल सकता है. वहीं आशा कार्यकर्ताओं के कौशल और योग्यता को बढ़ाने के लिए कुछ उपयुक्त पाठ्यक्रम तैयार किया जा सकते हैं. ऐसा करने से आशा कार्यकर्ता एलोपैथिक दवाओं के ज़रिए सामान्य बीमारियों का इलाज करने में सक्षम हो सकते हैं. इस पहल से दूर-दराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी की समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है. इसके अलावा अन्य संबद्ध स्वास्थ्य कर्मियों का कौशल बढ़ाने की भी गुंजाइश है. इससे न केवल मरीजों की बेहतर देखभाल होगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे.'

अगली कड़ी बना है नया नेशनल मेडिकल कमीशन बिल 2017

नया नेशनल मेडिकल कमीशन बिल 2017 संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में पेश हो चुका है. इस बिल का मसौदा (ड्राफ्ट) शीर्ष नौकरशाहों और स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों की सिफारिशों से प्रेरित है. बिल में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को नए मेडिकल एजुकेशन रेगुलेटर में बदलने का प्रस्ताव है. इसके अलावा ब्रिज कोर्स के बाद आयुर्वेद और होम्योपैथी डॉक्टरों को एलोपैथिक पद्धति से मरीजों का इलाज करने की इजाजत देने का भी प्रस्ताव है.

रिपोर्ट में डॉक्टरों की कमी और उनकी गैर मौजूदगी की बात कबूल की गई है. वहीं देश के गरीब वर्गों के लिए दवाइयां मयस्सर (उपलब्ध) न होने का हवाला भी दिया गया है. साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए विकसित टेक्नॉलजी की मदद लेने का सुझाव दिया गया है. रिपोर्ट में प्रस्ताव दिया गया है कि, हर राज्य में मेडिकल कॉल सेंटर स्थापित किए जा सकते हैं. इन कॉल सेंटरों में डॉक्टरों की नियुक्ति की जाए, ताकि वे फोन पर लोगों को चिकित्सीय सलाह या मार्गदर्शन दे सकें. ऐसा करने से स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की मौजूदा क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है. नौकरशाहों ने इस क्रांतिकारी योजना को कलमबंद करके प्रधानमंत्री को सौंप दिया, लेकिन उन्हें स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को बीमार बनाने वाली समस्याओं के बारे में लगभग अनजान ही रखा:

नौकरशाहों ने बताया कि, भारत में स्वास्थ्य सेवा का वितरण तंत्र मुख्य रूप से निजी (प्राइवेट) हाथों में है. उन्होंने तर्क दिया कि, अधिकांश राज्यों में सरकार द्वारा संचालित वितरण तंत्र की गुणवत्ता अच्छी नहीं है और अस्पतालों में मरीजों की भरमार रहती है. जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं या तो बेहद कम हैं या उनका पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो पाता है.

अधिया और उनकी टीम द्वारा तैयार रिपोर्ट के मुताबिक, "दवाओं के ज़रिए रोगों के निदान में सबसे ज्यादा खर्च आता है. सरकारी अस्पतालों की वर्तमान व्यवस्था बेहद खराब है. ज्यादातर अस्पताल कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, जैसे- नाकाम पड़ी मशीनें, तकनीशियनों की कमी, दवाइयों और जरूरी उपकरणों का अभाव. यहां तक कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रक्त (ब्लड) और मूत्र (यूरीन) के परीक्षणों की सुविधा नहीं है. लिहाजा मामूली सी बात के लिए भी लोगों को मजबूरी में शहरों का रुख करना पड़ता है. जबकि होना तो यह चाहिए कि, सभी नागरिकों को मानक सेवाओं और सस्ती दरों वाले इलाज की सुविधा की गारंटी मिले.

सरकार ने इस योजना का ऐलान नौकरशाहों और विशेषज्ञों की टीम द्वारा तैयार ब्लूप्रिंट के आधार पर किया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि, नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन स्कीम के दायरे में 10 करोड़ गरीब और कमजोर वर्ग के परिवारों को रखा गया है. हर परिवार को सालाना 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा की सुविधा मिलेगी. यानी इस योजना से करीब 50 करोड़ लोगों को लाभ होगा. जेटली ने इसे दुनिया की सबसे बड़ी सरकार द्वारा वित्त पोषित स्वास्थ्य सेवा योजना करार दिया है. साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया है कि, इस योजना के निर्बाध कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाएगा.

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