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नोटबंदी: ब्रांड मोदी चमका, आरबीआई की छवि को 'धक्का'

ब्रांड मोदी की असल परीक्षा 2017 के बजट में होगी

Updated On: Dec 31, 2016 08:00 AM IST

Sulekha Nair

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नोटबंदी: ब्रांड मोदी चमका, आरबीआई की छवि को 'धक्का'

नोटबंदी ने पिछले 50 दिनों में जिस तरह से आम आदमी को तकलीफ और पीड़ा दी है उससे भले ही पीएम मोदी की ब्रांड इमेज में कोई विपरीत असर भले ही न हुआ हो, लेकिन इससे भारत की करंसी की देखरेख करने वाली संस्था रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के इमेज जरुर खराब हुई है. ऐसा ब्रांड से संबंधित जानकार मानते हैं.

पीएम मोदी ने 8 नवंबर को नोटबंदी का फैसला लेते हुए 500 और 1000 के नोटों पर रोक लगाई थी. उनके मुताबिक इसका उद्देश्य देश से भ्रष्टाचार हटाना, काले-धन पर शिकंजा कसना, नकली नोटों को बेअसर करना और आतंकवादियों से लोहा लेना है.

इस एक कदम से भारतीय बाजार में फैली हुई 86 प्रतिशत करंसी, जिसका कुल जमा 15.44 लाख करोड़ होता है, वापस ले ली गई. ये करंसी इतनी ज्यादा थी कि देश के केंद्रीय बैंक के पास भी इन्हें रिप्लेस करने लिए पर्याप्त मात्रा में छोटी करंसी नहीं थी. नतीजा, देशभर में नोटों की किल्लत हो गई.

देश की जनता बैंकों और एटीएम के सामने लंबी-लंबी कतारों में खड़ी हो गई, ताकि वे पुराने नोट जमा करा सके और उनके बदले नए नोट ले सके. इसमें सबसे खराब सरकार की तरफ से निकासी पर लगाई गई सीमा थी. सरकार ने बैंकों से एक हफ्ते में सिर्फ 24 हजार और एटीएम से पच्चीस सौ रुपये निकालने की मंजूरी दी थी.

एटीएम पर लगी लाइनों में अब तक सौ लोगों की मौत होने की खबर है.

ब्रांड एंड बिजनेस स्ट्रैटेजी फर्म हरीश बिजूर कंसल्ट्स इंक के सीईओ हरीश बिजूर कहते हैं, ‘इससे शादियों में तो फर्क पड़ा ही, सैंकड़ों लोगों के मरने की भी खबर है, जो काफी कम है.’

एटीएम की लाइन में अब लगभग सौ लोगों की हो चुकी है मौत

एटीएम की लाइन में अब लगभग सौ लोगों की हो चुकी है मौत

 

बिजूर के अनुसार, ‘आम आदमी को तकलीफ जरुर हुई है लेकिन इससे प्रधानमंत्री के इस बढ़िया कदम पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है, क्योंकि लोगों को लगता है कि ये कदम बड़े और दूर तक चलने वाले फायदों के कारण किया गया है. जिसका लोग समर्थन करते हैं.’

बिजूर को लगता है कि जो कोई इस फैसले का विरोध कर रहा है, उसे इससे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. वे मोदी की लोकप्रियता को 80:20 के अनुपात में रखते हैं, जहां 80 प्रतिशत लोगों ने मोदी के फैसले का स्वागत किया है.

मुंबई स्थित ब्रांड स्ट्रैटजी और ब्रांड डिजाइन फर्म की मैनेजिंग डायरेक्टर अल्पना परीदा कहती हैं, ‘एक लोकल सब्जीवाले से लेकर ट्रेडर्स तक हर किसी ने बड़ी जल्दी और आसानी से डिजिटल माध्यम से पैसा खर्च करना सीख लिया.’

परीदा के अनुसार, ‘नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशान व्यापारी वर्ग, छोटे और मंझोले व्यवसायी और नेता हुए हैं. और ये लोग देश की बहुतायत जनता नहीं है.’

परीदा आगे कहती है, ‘मोदी ब्रांड हर तरह से मजबूत हुआ है, क्योंकि देश की जनता के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय समुदाय भी पीएम के इस कदम को उनकी मजबूत सोच और कठोर कदम उठाने की क्षमता के रुप में देख रही है. अगर वे नोटबंदी के साथ-साथ टैक्स सुधार और लोकप्रिय बजट पेश करते हैं तो इससे उनकी अपनी ब्रांड इमेज बेहतर होती है.’

जानकारों के मुताबिक, इस पूरी कवायद का क्या नतीजा निकलेगा इसके बारे में अभी पता लगा पाना मुश्किल है क्योंकि नोटबंदी अभी भी जारी है. कैश पैसों की दिक्कत भी बनी हुई है क्योंकि बाजार में पर्याप्त संख्या में पांच सौ के नोट नहीं आए हैं. कोई भी व्यक्ति बैंक द्वारा उनपर थोपे जा रहे दो हजार के नोट को लेना नहीं चाहता क्योंकि उसका खुदरा मिलना मुश्किल है.

सामाजिक टिप्पणीकार संतोष देसाई कहते हैं,  ‘नोटबंदी के कारण लोगों के नजरिए में बदलाव आया है और इससे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर भी असर पड़ा है ये सभी जानते हैं. लेकिन, इससे ये भी हुआ है कि पीएम मोदी की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर होने लगी है जो कड़े फैसले ले सकते हैं.’

देसाई की सोच से इत्तेफाक रखते हुए बिजूर कहते हैं, ‘मोदी इस कवायद के बाद मजबूत होकर बाहर निकले हैं, क्योंकि लोगों ने उनका साथ दिया है. नोटबंदी पर अब तक जितने भी फैसले लिए गए हैं, उससे होने वाली तकलीफों को झेलने के बाद भी लोगों ने इस कदम का स्वागत किया है क्योंकि वे ये समझते हैं कि ये एक पेचीदा मसला है, जिसमें कई किस्म की बाधाएं आएंगी.’

बिजूर को लगता है कि मोदी ने अपनी पहचान चमकाई ही है. वे कहते हैं, ‘लोगों को लगता है कि लोकतंत्र में मजबूत नेता होना मुश्किल है लेकिन मोदी ने उस सोच को गलत साबित किया है.’

हालांकि लोगों को अपने ही पैसे के लिए बैंकों और एटीएम की लाइनों में लगना पड़ रहा है वे अब ये मानने लगे हैं कि राजनीति में निर्णय लेने की क्षमता जो अब तक पंगु हो गई थी वो अब जाकर गतिशील हुई है. ये कहना है अल्पना परीदा का.

क्या ये मजबूत इमेज बनी रहेगी?

ब्रांड मोदी की असल परीक्षा 2017 के बजट में होगी, जब ये देखा जाएगा कि वित्तमंत्री नोटबंदी से आहत देश की जनता को किस तरह राहत देंगे. बिजूर कहते हैं, ‘अगर 2017 के बजट में आम आदमी को इनकम टैक्स में रियायत, जन-धन खाते वालों को फायदा या अन्य छूट नहीं दी जाती है तब शायद लोगों का मन बदल जाए.’

अगर सरकार की मंशा कालेधन के जमाखोरों को सजा देना था तो आम आदमी चाहेगा कि सरकार की इन कोशिशों के दौरान जो संघर्ष उसने किए उसे उसका इनाम मिले.

देसाई का कहना है, ‘हालांकि नोटबंदी के बाद भी पीएम मोदी के तारे बुलंदी पर हैं पर ये कब तक ऐसा बना रहेगा ये कहना मुश्किल है, क्योंकि बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लाइनें छोटी तो हो रहीं हैं पर कम होने का नाम नहीं ले रही है.'

रिजर्व बैंक की इमेज पर असर

इस बीच नोटबंदी के दौरान आरबीआई की छवि काफी हद तक खराब हुई है. नोटबंदी के बाद जो भी जो कुछ भी दिल्ली में हुआ और इसमें सेंट्रल बैंक की भूमिका नगण्य रह गई. इसके अलावा बार-बार बदले गए फैसलों जो सरकार के मंत्री ले रहे थे उससे भी सेंट्रल बैंक की छवि काफी खराब हुई.

आरबीआई की छवि हुई है खराब

आरबीआई की छवि हुई है खराब

अन्य सरकारी संस्थानों की तरह आरबीआई कभी भी रोजमर्रा के संवाद का हिस्सा नहीं बनता रहा है. इस तरह से उसने अपनी इमेज एक बेहद विश्वासपरक, कुशल और मौलिक संस्था की रही है. कई बार ऐसे भी उदाहरण सामने आए हैं जब सेंट्रल बैंक ने अपने काम-काज में किसी भी तरह की दखलअंदाजी को बर्दाश्त नहीं किया है, जिससे उसकी छवि एक कठोर नियंत्रक के रूप में सामने आयी है.

हालांकि, नोटबंदी के बाद पीएम मोदी के नाम के साथ ‘निडर’ और ‘निर्णायक’ जैसे विशेषणों का इस्तेमाल किया गया जिससे आरबीआई की छवि पर असर पड़ा.

आरबीआई के मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल अपने उप-गवर्नर वाले दिनों से चुपचाप रहना पसंद करते हैं. वे अपने पूर्ववर्ती रघुराम राजन के बिल्कुल उलट हैं. नोटबंदी के शुरुआती दिनों की उनकी चुप्पी भी कई बार उनकी स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती है.

उर्जित पटेल की छवि राजन की तरह नहीं थी. उन्हें राजन की करिश्माई परछाई के पीछे देखा जा रहा था. अगर पटेल की छवि ऐसे व्यक्ति की थी जो पर्दे के पीछे रहकर काम करने में भरोसा रखते हैं तो उनकी इस छवि को अच्छा खासा नुकसान हुआ है. ऐसा देसाई को लगता है.

परीदा को लगता है कि रिजर्व बैंक और गवर्नर उर्जित पटेल के पास अपनी दृढ़ता स्थापित करने के लिए अभी भी समय है. ‘ये ब्रांड किसी भी तरफ जा सकता है. वो बिल्कुल सिरे पर पहुंचा हुआ है और उसकी फिर से ताकतवर होने की पूरी संभावना अभी भी बाकी है.’

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