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तेलंगाना: मॉब लिंचिंग के मामले में पत्रकार की गिरफ्तारी कितनी जायज

गिरफ्तारी की कार्रवाई क्या कुछ ज्यादा ही कठोर नहीं है. खासकर इस तथ्य को ध्यान में रखकर कि ये काम गलत मंशा से नहीं किया गया है

T S Sudhir Updated On: Jul 10, 2018 05:59 PM IST

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तेलंगाना: मॉब लिंचिंग के मामले में पत्रकार की गिरफ्तारी कितनी जायज

शूट द मैसेंजर. हैदराबाद पुलिस द्वारा 27 मई को भीड़ के हाथों एक ट्रांसजेंडर की हत्या के तुरंत बाद एक पत्रकार को वारदात के आरोप में गिरफ्तार करना यही दिखाता है.

उस दिन आधी रात से कुछ वक्त पहले, एक कैफे में दो ट्रांसजेंडरों पर कुछ लोगों ने हमला किया. ये कैफे हैदराबाद के ओल्ड सिटी इलाके में चंद्रयानगुट्टा थाने के तहत आता है. ट्रांसजेंडरों पर बच्चा चोर होने का शक था. ट्रांसजेंडरों और लोगों में कहासुनी होने लगी. बात इतनी बढ़ी कि लोगों ने ट्रांसजेंडरों पर हमला कर दिया और एक की मौत हो गई. 52 साल का पीड़ित चंद्रैया दक्षिण तेलंगाना के महबूबनगर जिले का रहने वाला था. रिपोर्ट के मुताबिक वो तीन अन्य लोगों के साथ रमजान के दौरान खैरात पाने के मकसद से हैदराबाद आया था.

स्थानीय लोगों के पास शक करने की वजहें भी थी. हालांकि उनके द्वारा कानून अपने हाथ में लेने को कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. एक व्यक्ति के पास एक वीडियो था, जिसमें तेलंगाना के दूसरे हिस्से में पुलिस द्वारा एक ट्रांसजेंडर जोड़े की गिरफ्तारी और उसे ले जाते हुए दिखाया गया था. आरोप था कि ये वही समूह है जो हैदराबाद में बच्चों को अगवा करने की साजिश रच रहा है. कहासुनी के कुछ मिनटों के भीतर ही, भीड़ उनके खून की प्यासी हो उठी. एक निर्माणाधीन इमारत से कंक्रीट का एक खंभा उठाया गया और चंद्रैया के सिर पर मारा गया.

जब तक पुलिस वहां पहुंची, कंगारू कोर्ट क्रूर सजा दे चुका था. चोट के कारण चंद्रैया ने अस्पताल में दम तोड़ दिया, जबकि दूसरा शख्स स्वामी गंभीर रूप से जख्मी हो गया.

पुलिस दो नाबालिग समेत उन 16 लोगों को गिरफ्तार करने में कामयाब रही, जिन्होंने हमला किया था. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि पुलिस ने दो ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया, जो घटना के वक्त वहां मौजूद ही नहीं थे. इनमें से एक सुभान पेशे से पत्रकार हैं जबकि सैयद सलीम सामाजिक कार्यकर्ता हैं. पुलिस ने हत्या के लिए उकसाने और साथ ही एससी/एसटी कानून के तहत मामला दर्ज किया है, क्योंकि चंद्रैया दलित था. 29 मई को दोनों की अनौपचारिक गिरफ्तारी के बाद सुभान और सलीम ने अगले 17 दिन जेल में गुजारे.

क्या सुभान ने फर्जी खबर पोस्ट की थी कि ट्रांसजेंडर बच्चा चोर शिकार पर हैं? सुभान के पास 23 साल का पत्रकारिता का अनुभव है. वो हैदराबाद के कई प्रमुख उर्दू अखबारों में काम कर चुके हैं. वो फेसबुक पर एक पेज चलाते हैं जिसका नाभ 'रिपोर्टर सुभान' है. 21 मई को तड़के उन्होंने महबूबनगर में ट्रांसजेंडरों पर स्थानीय लोगों के हमले की खबर छापी थी.

यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि महबूबनगर की घटना सुभान की कल्पना तक में नहीं थी.

अपनी खबर को विश्वसनीय बनाने के लिए उन्होंने भीड़ पर हमले का वीडियो भी पोस्ट किया. मीडिया में आई दूसरी खबरों के मुताबिक पुलिस ने ट्रांसजेंडरों को भीड़ से बचाने के लिए हिरासत में लिया था. वो उनको ऑटो पर लेकर जा रही थी लेकिन ऑटो बीच में ही टूट गया और गुस्साई भीड़ ने वाहन को आग के हवाले कर दिया.

चार दिन बाद, तेलंगाना के पुलिस प्रमुख महेंद्र रेड्डी ने वीडियो संदेश में लोगों से बच्चा चोरी की अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील की. उन्होंने उन लोगों को चेतावनी दी जो शक की बिना पर लोगों पर हमला करते हैं. सुभान ने ये संदेश अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया और ये सुनिश्चित करने के लिए कि पाठक महबूबनगर की खबर और वीडियो से प्रभावित न हो जाएं, उन्होंने 25 मई को इसे डिलीट कर दिया.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

सुभान का कहना है, 'मई में मेरे फेसबुक पेज को महज तीन हजार लोग फोलो करते थे, इसलिए मेरी पहुंच सीमित थी. अब इसके 10 हजार से अधिक फोलोअर हैं. 25 मई के बाद भीड़ द्वारा हत्या की कोई खबर मेरे पेज पर नहीं है. तो फिर पुलिस ने 27 मई को किस आधार पर मुझे हत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया? "

पुलिस ने खबर को प्रस्तुत करने के तरीके को लेकर आपत्ति जताई है. पुलिस के मुताबिक सुभान का पोस्ट कहता है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के गैंग को महबूबनगर में पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा है. खबर को सनसनीखेज बनाने के लिए सुभान ने लिखा कि अगवा करने वाले बच्चों को नशीला पदार्थ खिला देते हैं और फिर उन्हें दूसरे राज्यों में बेचते हैं. उसने खबर में संपादकीय पुट देते हुए ये लिखा कि लोग चिंतित हैं जबकि पुलिस आलसी है.

सलीम ने अपनी तरफ से कुछ जोड़ते हुए इस खबर को शेयर किया था. उसने लिखा था कि महबूबनगर पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है, जो बच्चा चोरी करने शहर में आए थे.

हैदराबाद के डीसीपी वी सत्यनारायण ने कहा, 'जब हमने ये स्पष्ट कर दिया कि बच्चा चोरी करने वाला कोई गैंग नहीं है तो उसने ये खबर क्यों प्रकाशित की? चंद्रैया को मारने वाली भीड़ ने स्वीकार किया है कि उन्होंने फेसबुक पर ये खबर पढ़ी थी. वह बार-बार जुर्म करने वाला शख्स है. पूर्व में उसने म्यांमार और सीरिया जैसे देशों में अंग निकालने वाली डरावनी तस्वीरें पोस्ट की थी.'

यह स्पष्ट है कि विशुद्ध रूप से स्थानीय खबरें अधिकतर व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिए पढ़ी जाती हैं. अधिकांश बार इन सूचनाओं की फिर से पुष्टि करने की कोशिश नहीं की जाती है जैसा कि मुख्यधारा की मीडिया में दो स्त्रोत से खबर पुष्ट करने की परंपरा है. आस-पड़ोस में होने वाली घटनाओं से जुड़ी खबरों की मांग बहुत अधिक है. इस स्थिति में सोशल मीडिया के ये दो रूप न्यूज सोर्स के रूप में काम कर रहे हैं और इस सूचना को देने वाले ‘पत्रकार’ के पास धारणाओं को पुष्ट करने की ताकत है.

तब भी, गिरफ्तारी की कार्रवाई क्या कुछ ज्यादा ही कठोर नहीं है. खासकर इस तथ्य को ध्यान में रखकर कि ये काम गलत मंशा से नहीं किया गया है. पुलिस की दलील है कि ऐसे आजाद पत्रकार मीडिया पर निगरानी रखने वाली प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी किसी भी संस्था के दायरे में नहीं आते हैं और ऐसी स्थिति मे आईपीसी की धारा लगाने के अलावा इनसे निपटने का दूसरा रास्ता नहीं है.

इसे लेकर बहस शुरू हो गई है कि ये मामला कोर्ट में टिकेगा या नहीं. लेकिन ये स्पष्ट है कि हैदराबाद पुलिस दोनों को एक नजीर की तरह पेश करना चाहती है. सूचना साझा करने वालों को पुलिस ये संदेश देना चाहती है कि अगर वो संवेदनशील मसलो से खिलवाड़ करते पाए गए तो उन पर कानून का शिकंजा कस सकता है. स्मार्टफोन में सोशल मीडिया ऐप ने हरेक नागरिक को सिटीजन जर्नलिस्ट बना दिया हो, ऐसे में यह मामला एक चाबुक की तरह है कि कोई लक्ष्मण रेखा पार नहीं करे.

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