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भारत में भीड़तंत्र सिर्फ रावण क्यों पैदा करता है? राम क्यों नहीं?

कहीं एक समूची भीड़ अकेले इंसान पर भारी पड़ती है तो कहीं अकेला कातिल पूरी भीड़ पर भारी

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jul 07, 2017 08:54 PM IST

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भारत में भीड़तंत्र सिर्फ रावण क्यों पैदा करता है? राम क्यों नहीं?

दिल्ली के यमुना पार के मानसरोवर इलाके में एक युवती को दौड़ा-दौड़ा कर चाकूओं से मार डाला गया. लड़की मदद के लिये चीखती-चिल्लाती रही. लेकिन तमाशाई भीड़ में से किसी के पास भी इतना जिगर नहीं था कि वो युवती की जान बचाता. तमाशबीन भीड़ के सामने एक अकेला शख्स था जो लड़की को चाकूओं से गोद रहा था. सीसीटीवी फुटेज में सारी घटना कैद हुई और कैद हुआ भीड़ का दूसरा चेहरा भी.

अमूमन भीड़ का एक ही चेहरा सामने आता है. एक उन्मादी भीड़ किसी इंसान को घेर कर मार रही होती है. वो शख्स बेकसूर भी हो सकता है तो आरोपी भी हो सकता है. लेकिन हाथ में कानून लेकर भीड़ जब जानवर बनने पर आमादा हो जाती है तो हैवान की रूह भी कांप जाती है.

ऐसे वाकये अखबारों की हेडलाइंस और न्यूज चैनलों की सुर्खियों में शुमार कर एक छोटी सी उम्र के बाद खामोश हो जाते हैं. हमला करने वाली भीड़ भी भीड़ में ही गुम हो जाती है. कुछ प्रतिक्रियाओं की धीमी आवाज सुनाई देती है. कोई भीड़तंत्र कहता है तो कोई बदलते समाज में हिंसक होती भीड़ पर सवाल उठाता है. कुछ लोग पुलिस के तमाशाई होने का आरोप लगाते हैं तो सियासी जमात घटना के लिये सरकारों पर सवाल उठाती है.

W Bengal Violence

भीड़ कभी मारती है तो कभी तमाशा देखती है

लेकिन उसी भीड़ का एक दूसरा हिस्सा भी इसी समाज से बाहर फूटता है. मानसरोवर की घटना एक डरावनी मिसाल है जो साबित करती है कि एक भीड़ कितनी असंवेदनशील हो सकती है. लड़की पर लगातार चाकुओं से हमला होता है और वो मदद के लिये भागती है. लेकिन भीड़ में से एक भी शख्स ऐसा नहीं था जो उसकी मदद को लेकर सामने आता.

ऐसी ही घटना कुछ महीनों पहले मेट्रो स्टेशन पर भी घटी थी जहां कि एक सिरफिरे आशिक ने एक लड़की पर कैंची से कई वार कर हत्या कर दी थी. उस वक्त भी एक भीड़ चुपचाप वारदात को देख रही थी.

भीड़ के चरित्र को समझ पाना बेहद मुश्किल है. कभी ये हिंसक होकर हैवान है तो कभी ये बुजदिली के लिये बदनाम है. कहीं ये अचानक उग्र हो जाती है तो कहीं ये जरूरत पड़ने पर भी असहाय और निरीह नजर आती है.

इसी भीड़ का एक और चरित्र भी है कि जब किसी की हत्या हो रही होती है या फिर रोड एक्सीडेंट में कोई सड़क पर तड़प रहा होता है तब कुछ लोग वीडियो बना रहे होते हैं. सामने वाले की आखिरी सांस तक का वीडियो तैयार कर लिया जाता है लेकिन मृत संवेदनाओं में किसी को बचाने का झूठा ख्याल भी इंसानियत का अहसास नहीं जगा पाता है.

सभ्य समाज पर धब्बा हैं भीड़ के दो चेहरे

इस भीड़तंत्र के वक्त और हालात के साथ बदलते चेहरे सभ्यता की दुहाई देने वाले समाज पर धब्बा हैं. ये दाग हैं उस सोच पर जो खुद के इंसान होने का दावा करते हैं. CowProtection

कभी गोरक्षा के नाम पर भीड़तंत्र पहलू खान की मौत का जश्न मनाता है. कभी गोमांस के शक में अखलाक की जिंदगी भीड़ का निवाला बन जाती है, कभी एंटी रोमियो स्क्वॉड के नाम पर भीड़ हाथ में कानून लेकर तय करती है कि रोमियो को क्या सजा दी जाए तो कभी पश्चिम बंगाल और सहारनपुर में भीड़ सांप्रदायिक और जातीय दंगों की वजह बन जाती है. वाकई भीड़ के चेहरों को समझना बेहद मुश्किल है.

जब सरकार और व्यवस्था के खिलाफ ये भीड़ इकट्ठा होती है तो आंदोलन खड़ा हो जाता है. दुनियाभर में हुई क्रांतियों में शुरुआत की मुट्ठी भर लोगों की तादाद ही बाद में भीड़ में और फिर जन सैलाब में तब्दील हुई.

जब निर्भया और जेसिका लाल को इंसाफ दिलाने के लिये ये भीड़ हाथों में मोमबत्तियां लेकर इकट्ठा हुईं तो सरकारें और अदालतें तक हिल गईं. जब विश्व कप जीतने की खुशी में भीड़ घरों से बाहर सड़कों पर निकलती है तो देश जश्न में डूब जाता है .

अन्याय के खिलाफ चुप रह जाना भीड़ की फितरत

लेकिन जब ऐसी ही भीड़ किसी बेगुनाह को पत्थर और लाठियों से मार-मार कर खत्म कर देती है तो फिर देश मातम में क्यों नहीं डूब जाता?

जब किसी की बेटी पर तेजाब फेंका जाता है या फिर चाकूओं से हमला करता है तो देश अपने समाज के गुनाहगारों पर मौन क्यों रह जाता है?

झारखंड के जमशेदपुर में बच्चा चोरी के आरोप में एक भीड़ ने चार लोगों को पीट पीट कर मार डाला. पश्चिम बंगाल में एक नाबालिग की फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट के बाद उसका घर ही जला दिया गया.

अराजक होती भीड़ के खौफनाक चेहरे की तस्वीर हर राज्य में एक सी है. ये भीड़ सड़कों पर मरने-मारने पर उतारू है तो चलती ट्रेन से जुनैद को फेंकने के लिये भी मौजूद है.

lynching

अखलाक, पहलू खान और जुनैद भी भीड़ की ही भेड़चाल का शिकार हुए. इस भीड़ के आंख-कान, दिल और दिमाग नहीं होते. इसे सामने वाले के शरीर से बहता लहू और तड़पता जिस्म नहीं दिखाई देता. इसके कानों में रहम की भीख नहीं सुनाई देती. इसके दिल में मरते हुए इंसान को लेकर संवेदनाओं की हलचल नहीं होती तो इसके दिमाग में अपने किये का असर नहीं होता है. आखिर इस उन्मादी भीड़ के दिमाग में कौन सा फितूर होता है?

राष्ट्रपति- पीएम ने भी बढ़ती हिंसा पर जताई चिंता

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में भीड़तंत्र के दिये जख्म नासूर बनते जा रहे हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को कहना पड़ा कि ‘जब भीड़ द्वारा हत्‍या की घटनाएं बढ़ जाए और अनियंत्रित हो जाए तो हमें रुक कर सोचने की जरूरत है कि क्या हम पर्याप्त तौर से जागरूक हैं?’

गांधी के साबरमती आश्रम से पीएम मोदी ने गोरक्षा के नाम पर अराजक तत्वों को नसीहत दी. लेकिन कहते हैं कि भीड़ की कोई जाति या फिर समुदाय नहीं होता. ये गलत है. अलग अलग घटनाओं में भीड़ का किरदार फिक्स होता है.

किसी भी घटना के बाद भीड़ ‘अज्ञात’ नाम के तत्व में समा जाती है जहां से उसकी खोज मुश्किल होती है. पुलिस अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लेती है. एक बार फिर भीड़ किसी भीड़ में गायब हो जाती है.

बहती गंगा में हाथ धोने वाली भीड़ अपने पापों के घड़े भरने का काम करती आई है. कभी किसी को मार कर या फिर कभी किसी को मरते देख मूकदर्शक बनकर. दोनों ही तरीके की भीड़ का चरित्र एक सा है जो मानवता और भावनाविहीन है.

राजनीतिक रोटी सेंकने का भी जरिया थी भीड़

समाजिक चिंतक बहस कर सकते हैं समाज की इस भीड़ पर लेकिन खुद समाज को सोचना होगा कि सभ्य और विकसित समाज में ये भीड़तंत्र कहीं इतना हिंसक तो कहीं इतना क्रूर क्यों है?

कहीं भीड़ का इस्तेमाल सियासी फायदे के लिये हो रहा है. बंगाल में सांप्रदायिक तनाव के जरिये राजनीति की रोटियां सेंकने के लिये सियासत भीड़तंत्र की गुलामी कर रही है. Heavy police force deployed

कहीं भीड़ को सत्ता का समर्थन मिला हुआ है तो कहीं अपने रक्तचरित्र से वो सत्ता का ख्वाब देख रही है. गुस्से और नफरत से निरंकुश होती ये भीड़ अराजक नहीं बल्कि अपराधी हो चुकी है. लोकतंत्र की हिफाजत और नागरिकों की सुरक्षा के लिये अब ये जरुरी है कि स्लीपर सेल बनी इस भीड़ को सियासी चश्मे से ना देख कानून की नजर से देखा जाए.

कड़े कदम उठाए सरकार वरना कहीं देर ना हो जाए

लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ भीड़तंत्र का उभार इंसानियत का गला रेतने का काम कर रहा है. हिंसा किसी भी रूप में नहीं रुकी तो समाज के जंगल राज में प्रवेश करने से कोई रोक नहीं सकता. अगर भीड़ ही सही और गलत का फैसला करने लगे तो फिर निरंकुश होती भीड़ समाजिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी.

सिर्फ स्तब्ध हो कर और सांस रोक कर होती हुई घटनाओं पर समाजिक चुप्पी एक समय के बाद पश्चाताप की आग में जलने के ही काम आएगी. इसमें दोषी वो भी हैं जो भीड़ का हिस्सा हो कर खामोश हैं.

इससे पहले कि और देर हो, सरकार को जरूरत है कि वो ऐसे कड़े कदम उठाए कि कहीं एक समूची भीड़ अकेले इंसान पर भारी ना पड़े तो वहीं एक अकेला शख्स हाथ में चाकू लेकर सामने वाली भीड़ पर भारी ना पड़े.

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