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फॉरेंसिक रिपोर्ट में गड़बड़ी से हो रहा न्याय का कत्ल, जिम्मेदारी से कब तक बचती रहेगी सरकार?

आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म मामले में फॉरेंसिंक जांच का जिम्मा फॉरेंसिक विज्ञान लेबोरेट्री दिल्ली को सौंपा गया था, हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट में गड़बड़ी को देखते हुए पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है

Updated On: Aug 22, 2018 10:09 AM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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फॉरेंसिक रिपोर्ट में गड़बड़ी से हो रहा न्याय का कत्ल, जिम्मेदारी से कब तक बचती रहेगी सरकार?

फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज के द्वारा की जाने वाली जांच एक बार फिर चर्चा में है. इस बार चर्चा की वजह फॉरेंसिक विज्ञान लेबोरेट्री, दिल्ली में की जाने वाली वो फॉरेंसिक जांच है जिसके तहत एक आठ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म मामले में फॉरेंसिंक जांच का जिम्मा फॉरेंसिक विज्ञान लेबोरेट्री, दिल्ली को सौंपा गया था. हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट में गड़बड़ी को देखते हुए पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है. हाईकोर्ट ने इसे जनहित से जुड़ा मामला माना और कहा कि फॉरेंसिक की झूठी रिपोर्ट तैयार करना न्याय का गला घोंटना है.

ध्यान रहे आरोपी को पहले की फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर निचली अदालत ने बरी कर दिया था. लेकिन हाईकोर्ट में अपील के बाद फॉरेंसिक जांच की असलियत सब के सामने आ गई. ऐसा कोई पहली बार नहीं हैं जब फॉरेंसिक जांच को लेकर सवाल उठे हों. आरुषी और निठारी कांड की जांच को लेकर पहले भी कई सवाल उठे हैं. आरुषि मर्डर की जांच में वेजिनल स्वैब तक बदले हुए मिले थे. यही वजह है कि वैज्ञानिक सबूतों के अभाव में आरुषि मर्डर की जांच हमेशा सवालों के घेरे में रही है. जेसिका लाल मर्डर केस में भी यही हुआ था. लेकिन मीडिया रिपोर्ट के बाद शीर्ष अदालत ने दोषी को सजा मुकर्रर कर न्याय का गला घोटने से बचाया था.

फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट की खामियां

फ़र्स्टपोस्ट को हाथ लगी कुछ एक्सक्लूसिव दस्तावेज फॉरेंसिक जांच की कई गड़बड़ियों को उजागर करती हैं. गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश के सभी जीईक्यूडीज (Government Examiner Questioned Documents, जिसमें दस्तावेज की जांच होती है साथ ही उसमें किए गए हस्ताक्षरों को भी परखा जाता है) से 100 रिपोर्ट मंगाए गए और कुल 300 केसेज में की गई जांच को परखा गया. गृहमंत्रालय द्वारा बनाई गई जांच कमेटी ने पाया कि 300 केसेज में से 49 मामलो में सिर्फ 'नो ऑपिनियन’ (NO OPINION) लिखकर छोड़ दिया गया था. ज़ाहिर है ऐसा रिपोर्ट उन तमाम गाइडलाइन्स की अनदेखी है जिसके तहत ऐसे दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की जांच फॉरेंसिक विभाग द्वारा किया जाता है.

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दरअसल इस तरह की जांच में एनएबीएल (National Accreditation Board For Testing And Calibration Laboratories) के दिशा निर्देश का पालन करना होता है. लेकिन गृहमंत्रालय द्वारा बनाई गई कमेटी ने 49 मामलो में गड़बड़झाला को देखते हुए तीनों सीएफएसएल (CFSL) के डायरेक्टर्स की मदद से एक आंतरिक जांच करने का निवेदन किया जिससे फर्जी दस्तावेज और हस्ताक्षर की जांच सही रूप से की जा सके. गृहमंत्रालय ने अपनी जांच में पाया कि सबसे बुरी हालत शिमला जीईक्यूडी की है और इस मामले में डायरेक्टर और एक अन्य एक्सपर्ट को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया.

रिपोर्ट में गड़बड़ी

दरअसल एनएबीएल से मान्यता मिल जाने पर रिपोर्ट की वैधता देश ही नहीं विदेशों में भी होती है. वहां लिखे गए जांच रिपोर्ट को अच्छी तरह Explain करना पड़ता है. रिपोर्ट पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर लिखा जाता है. 'नो ओपिनियन’ लिखे जाने के पीछे वजह क्या है इसको विस्तार से बताना बेहद जरूरी होता है. क्या सैंपल के नमूने में कोई कमी थी या फिर उसका ऑरिजनल फॉर्म मिल नहीं पाया था या फिर अन्य कई वजहें भी हो सकती हैं.

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इस तरह का गोल मटोल रिपोर्ट लिखकर आरोपी को फायदा पहुंचाना भी मकसद हो सकता है. एक बैंक के खिलाफ मुकदमा लड़ रही गुनिंदर गिल के मुताबिक ‘किसी के फर्जी हस्ताक्षर से पैसे निकाल लिए जाएं या फिर उसकी महत्वपूर्ण चीजें हथिया ली जाएं और जब इस मामले में केस दर्ज हो जाए तो ऐसा रिपोर्ट देकर आरोपी की मदद पहुंचाई जा सकती है. अदालत आरोपी को बेनिफिट ऑफ डाउट में बरी कर देगा और पीड़ित भ्रष्ट व्यवस्था के आगे कई बार लाचार होकर घुटने टेक देगा.’

ज़ाहिर है फर्जी दस्तावेज के कई मामले देश की अदालतों में लंबित हैं. उनके निराकरण में जीईक्यूडी (Gross examiner questioned documents) की जांच रिपोर्ट बेदह अहम है. ऐसे में 300 मामलो की जांच में 49 मामलों में ऐसा ओपिनियन असलियत की पोल खोल देता है.

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश विधानसभा में मिले पाउडर को विस्फोटक बताकर एफएसएल लखनऊ के डायरेक्टर ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी. सरकार को उन्हें गलत रिपोर्ट देने के साथ-साथ सीनियर अधिकारी को गुमराह करने के आरोप में सस्पेंड करना पड़ा. मामले की जांच एनआईए (National Investigative Agency) को सौंपी गई. सेंटर फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री (सीएफएसएल) हैदराबाद के लैब में जांच के बाद साबित हो गया कि संदिग्ध पाउडर बिस्फोटक न होकर सिलीकन ऑक्साइड था.

ज़ाहिर है इस घटनाक्रम के बाद उत्तर प्रदेश के फॉरेंसिक लैब की खूब किरकिरी हुई. इस बात पर भी बहस छिड़ गई कि हमारे देश में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री की दशा क्या है और उसमें काम कर रहे लोगों की काबिलियत कैसी है?

बदहाल फॉरेंसिक वैज्ञानिक प्रयोगशाला

वैसे सीएजी की रिपोर्ट ने अपनी ऑडिट में उत्तर प्रदेश की फॉरेंसिक वैज्ञानिक लेबोरेट्री की हकीकत भी बयां कर दी थी. सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया कि 2011 से 2016 के बीच टेक्निकल स्टाफ की संख्या में लगातार कमी होती गई. साथ ही फॉरेंसिक लेबोरेट्री में आधुनिक उपकरणों की भी बेहद कमी पाई गई. 2012-13 में टेक्निकल स्टाफ की संख्या में 47 फीसदी की कमी थी वहीं 2015-2016 में ये कमी बढ़कर 65 फीसदी हो गई. इन्हीं वजहों से पेंडिंग केसेज की संख्या में तीन गुना बढ़ोतरी हो चुकी थी.

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यूपी के एक सीनियर आईपीएस अधिकारी ने फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए कहा, ‘जिस किसी चर्चित मामले की जांच को पुलिस प्राथमिकता देती है, उसका रिपोर्ट फॉरेंसिक लेबोरेट्री से जल्द मिल जाता है. लेकिन, ज्यादातर मामलों में फॉरेंसिक रिपोर्ट के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है. इसलिए मामले के निपटारे में लंबा वक्त लग जाता है.’

उत्तर प्रदेश में कुल 4 फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज हैं. उन पर बढ़ रहे दबाव को कम करने के लिए 5 रिजनल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज खोलने की योजना 2010 तक पूरी करने की थी, लेकिन आठ साल बाद भी इन रिजनल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज (RFSL) को ऑपरेशनल नहीं किया जा सका. इन रिजनल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज को मुरादाबाद, झांसी, गोरखपुर, इलाहाबाद और गाजियाबाद में खोला जाना था.

एक पूर्व पुलिस महानिदेशक ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा, ‘कुछ जिलों में फॉरेंसिक मोबाइल यूनिट का इंतजाम किया गया है. लेकिन सूबे के ज्यादातर हिस्सों में अभी भी इंन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर की जानकारी काफी लिमिटेड है और वो क्राइम सीन मैनेजमेंट को लेकर सेंसिटाइज नहीं हैं.’

जाहिर है उनका इशारा मौका-ए-वारदात पर सबसे पहले पहुंचने वाले ऑफिसर की ट्रेनिंग को लेकर था, जो क्राइम सीन से सैंपल कलेक्ट करने में वैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं या नहीं.

कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर पूरे देश में फॉलो नहीं हो रहा

लोकनायक जयप्रकाश नारायण नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के सीनियर अधिकारी फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहते हैं, 'कोई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर पूरे देश में फॉलो नहीं हो रहा है. जरूरत है एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर का जिसे हर जांच अधिकारी अपराध की जांच करते समय फॉलो करे. इस पूरी जांच प्रक्रिया की एक मॉनिटरिंग मैकेनिज्म भी हो जो कि पुख्ता हो, जिससे देश के फॉरेंसिक लैब की जांच रिपोर्ट की विश्वसनियता पर सवाल न उठ सके.’

देश के दूसरे राज्य कर्नाटक में भी फॉरेंसिंक लैब में स्टाफ की संख्या में 40 फीसदी कम है. सीएजी ने जांच में पाया कि बायोलॉजी और केमिस्ट्री बैकग्राउंड के लोगों को साइबर फॉरेंसिक साइंस में असिस्टेंट डायरेक्टर की जिम्मेदारी दी गई थी. जबकि फॉरेंसिंक साइंस के इस विभाग में कंप्यूटर या आईटी ट्रेंड लोगों को लिया जाना चाहिए था.

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वैसे राजस्थान में फॉरेंसिक लैब की हालत तुलानात्मक तौर पर बेहतर है. राजस्थान कैडर के एक एडीजी रैंक ऑफिसर ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि, ‘राज्य के हर जिले में फॉरेंसिक मोबाइल यूनिट की व्यवस्था है और जैसे ही किसी बड़ी वारदात की खबर आती है तो मोबाइल यूनिट में बैठा ट्रेंड स्पेशलिस्ट मौका-ए-वारदात पर पहुंच कर सैंपल कलेक्ट करता है और उसे पास के लेबोरेट्री में पहुंचा कर अपने काम को बखूबी अंजाम देता है.’

ज़ाहिर है वैज्ञानिक जांच में मिला सबूत गवाह के बदल जाने पर भी आरोपी को दोषी करार दिलानें में मददगार साबित होता है.

बिहार में आरोपी को दोषी करार देने में फॉरेंसिक सबूत की भूमिका थी अहम

बिहार में कार्यरत एडीजी विनय कुमार सिंह फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए कहते हैं, ‘राज्य में फॉरेंसिक मामलों की संख्या में पांच गुना इजाफा हुआ है. इनको देखते हुए सरकार 3 नए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज खुलने जा रही है. हाल ही में आदित्य सचदेवा मर्डर में रॉकी यादव के खिलाफ सारे गवाह मुकर गए थे. लेकिन रॉकी यादव को दोषी करार दिलाने में फॉरेंसिक सबूत की भूमिका अहम रही.’

ये मामला बिहार के गया का है जहां एक एमएलसी के बेटे रॉकी यादव ने रोड रेज मामले में आदित्य सचदेवा की हत्या कर दी थी.

उत्तर प्रेदश के पूर्व डीजीपी और बीएसएफ के डीजी प्रकाश सिंह फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत करते हुए कहते हैं, ‘क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को ठीक करने के लिए पुलिसिंग प्रक्रिया को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है. लेकिन तमाम पॉलिटिकल पार्टी बेहतर पुलिसिंग के लिए कारगर कदम उठाने से हिचकिचाती है. ज़ाहिर है सत्ताधारी दल पुलिस को लठैत की तरह इस्तेमाल करता है. इसलिए पुलिस पर सरकार का खर्च बेहद कम है. इसलिए फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्रीज भी नेगलेक्टेड हैं.’

प्रकाश सिंह ने अदालत में पुलिसिंग में सुधार के लिए लॉ एंड ऑर्डर, क्राइम और इन्वेस्टिगेशन को अलग-अलग करने की मांग की थी, जिसको लेकर अदालत ने सरकार को कई निर्देश भी दिए थे. अदालत के निर्देश पर फॉरेंसिक साइंस सर्विसेज बिल लाने की बात हुई जिसके लिए साल 2011 में 500 करोड़ भी आवंटित किए गए थे.

फॉरेंसिक साइंस सर्विसेज बिल ड्राफ्ट करने के लिए कमेटी का गठन हुआ था. इस ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए जो कमेटी बनी थी उसके सदस्य रह चुके डॉ मुकेश यादव फ़र्स्टपोस्ट से कहते हैं, ‘गृह मंत्रालय की देख रेख में कमेटी का गठन हुआ था और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्रीज को आधुनिक बनाने के लिए तमाम बातें की गई थी. सरकार अदालत के निर्देश के बाद गंभीर दिखाई पड़ रही थी, लेकिन कुछ समय बाद ही मामले की पेचिदगियों को देखते हुए इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया’

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