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कश्मीर पर स्पेशल रिपोर्ट (पार्ट 1): घाटी में इस साल 70% ज्यादातर की मौत, मुखबिरों का अहम योगदान

कश्मीर में विद्रोह का इतिहास तकरीबन तीन दशक पुराना है, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि बगावत की ये लहर एक निजी लड़ाई का रूप ले रही है.

Updated On: Dec 27, 2018 05:43 PM IST

Sameer Yasir

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कश्मीर पर स्पेशल रिपोर्ट (पार्ट 1): घाटी में इस साल 70% ज्यादातर की मौत, मुखबिरों का अहम योगदान

(एडिटर्स नोट : जैसे-जैसे ये साल खत्म होने को है, वैसे-वैसे जम्मू-कश्मीर राज्य के जीवन का भी एक और उपद्रवी और अशांत साल भी खत्म होने की कगार पर है. इस मौके पर फ़र्स्टपोस्ट वहां से रिपोर्ट की गई रिपोर्ताज की श्रृंख़ला छापने जा रहा है, जिसमें ये बताने की कोशिश की जाएगी कि पिछले एक साल में ये राज्य कितना और कैसे-कैसे बदला है. साल 2018 में कश्मीर की धरती पर किस तरह के बदलाव आए हैं. इस सीरीज में खासतौर पर नए दौर में पनपे आतंकवाद और घाटी के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर खास ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा जम्मू कश्मीर के तीनों इलाकों के बीच हर दिन बढ़ती खाई भी इस रिपोर्ताज के केंद्र में होगी.)

कश्मीर में विद्रोह का इतिहास तकरीबन तीन दशक पुराना है, लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि बगावत की ये लहर एक निजी लड़ाई का रूप ले रही है. इसे आज बड़े ही खतरनाक तरीके से लड़ा जा रहा है. कश्मीर घाटी में हर दूसरे दिन फूटने वाली हिंसा की अनेकानेक घटनाओं में अब ये भेद करना मुश्किल होता जा रहा है कि कौन सी घटना को अंजाम आतंकियों ने दिया है, किसे सरकारी सैन्य बलों ने और किसे प्रदर्शनकारियों ने.

इस साल राज्य में आतंकियों को जबरदस्त तरीके से मौत के घाट उतारा गया है,  जिससे हुआ ये कि इस साल मारे गए आतंकियों की संख्या पिछले एक दशक में मारे गए आतंकियों से भी ज्यादा है.

पिछले एक साल में मारे गए ज्यादातर आतंकी इकतरफा हमले या गोलीबारी में मारे गए. 95% मुठभेड़ों में वे सुरक्षों बलों में से किसी सैनिक को हताहत करने में नाकाम रहे. जून महीने से एक भी हफ़्ता ऐसा नहीं रहा होगा जब किसी आतंकी की मौत नहीं हुई हो. 23 दिसंबर तक, कम से कम 247 आतंकी मारे गए जो पिछले साल इस समय की तुलना में करीब 70 प्रतिशत ज्यादा है. मारे गए आतंकी मुख्य तौर पर स्थानीय थे और उन्हें कोई बहुत ज्यादा ट्रेनिंग भी नहीं मिली हुई थी. जिसका नतीजा ये रहा कि उन लोगों को गुरिल्ला लड़ाई की जटिलताओं के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं थी.

इतना ही नहीं, हाल के महीनों में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच होने वाला संघर्ष भी काफी बुरी स्थिति में पहुंच गया है, जिससे ये पूरा इलाका हिंसा की चपेट में फंस कर रह गया है. ऐसे में अक्सर ये होता है कि इन आतंकियों के समर्थक कई मर्तबा उन्हें बचाने की कोशिश में, सुरक्षा बलों पर ही पथराव करना शुरू कर देते हैं.

राज्य के गृहराज्यमंत्री हंसराज अहिर ने संसद में जानकारी देते हुए कहा है कि  राज्य में पिछले साल पत्थरबाजी की 759 घटनाएं सामने आईं हैं जो कई बार जानलेवा भी साबित हुई हैं. इन घटनाओं के दौरान, घटनास्थल पर पुलिस और सुरक्षा बलों की फायरिंग में अब तक 59 नागरिकों की जानें चली गईं हैं.

समीर अहमद भट उर्फ समीर टाइगर के जनाजे की तस्वीर. घाटी में समीर ही मुख्य तौर पर हिज्बुल मुजाहिदीन के लिए भर्तियां करता था. ( तस्वीर: समीर यासिर )

समीर अहमद भट उर्फ समीर टाइगर के जनाजे की तस्वीर. घाटी में समीर ही मुख्य तौर पर हिज्बुल मुजाहिदीन के लिए भर्तियां करता था. (तस्वीर: समीर यासिर )

एक तरफ जहां नागरिकों की मौत ने स्थानीय लोगों में गुस्सा भरने का काम किया है, वहीं दूसरी तरफ आतंकियों का सफाया पहले से आसान हो गया है. उदाहरण के लिए, शोपियां में हुए एक मामले में, जवाबी मुठभेड़ में शामिल एक पुलिस अफसर एक लकड़ी की सीढ़ी में बिना किसी सुरक्षा कवर के चढ़ गया, घर की खिड़की से अपना एके-47 निकाला और बंदूक के ट्रिगर को दबाते हुए चारों तरफ घुमा दिया. वो तब तक फायरिंग करता रहा जब तक कि घर के अंदर छिपे तीनों हथियारबंद आतंकी ढेर नहीं हो गए. इस तरह के एकतरफा हमले, एक घंटे में खत्म हो जाते हैं.

लेकिन, इसके बावजूद ये सोचना गलत होगा कि साल 2019 में समूचा कश्मीर आतंकवादियों से मुक्त हो जाएगा. असल में, डर तो ये है कि कहीं ये हालात पहले से ज्यादा खराब न हो जाएं. जैसे-जैसे वहां दबाव बढ़ता जा रहा है और इस विवाद का कोई राजनीतिक हल निकलता नहीं दिख रहा है, वैसे-वैसे हालात और खराब होते जा रहे हैं.

घाटी के ज्यादा से ज्यादा युवा हिंसा के रास्ते पर चल निकले हैं. अधिकारियों के अनुसार, इसी साल कम से कम 176 कश्मीरी युवा सीमापार जा चुके हैं, और आतंकियों के साथ हो लिए हैं.

अधिकारियों के दावों के विपरीत, कश्मीरी युवाओं लगातार को आतंकी संगठनों में शामिल किया जा रहा है, जो यहां के सुरक्षा विभागों के सामने एक बड़ी मुश्किल बनकर उभरा है. राज्य में किसी भी तरह की राजनीतिक पहुंच न होने के कारण, कश्मीरी लोगों में एक किस्म विराग बढ़ा है. जैसा कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अफसर ने इस रिपोर्टर से कहा – ‘हिंसा इस समस्या का जवाब नहीं है.’

उन्होंने कहा, 'राज्य में आतंकवादी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल हो रहे हैं. वे ऐसा या तो मुठभेड़ में मरकर कर रहे हैं या सुरक्षा बलों पर हमला करके.  इस समस्या का जवाब कहीं न कहीं उन लड़कों को उस जंगल से निकाल कर लाने में और उन्हें ये समझाने में है कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. इन गुमराह बच्चों को दोबारा समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए एक माकूल पुनर्वासन पॉलिसी का होना बेहद जरूरी है, जिसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी समावेश हो. तभी इसके दूरगामी असर होंगे.'

जैसा कि 1990 के शुरुआती सालों में देखा गया था, पिछले साल वैसी ही एक बहुत ही अनोखी घटना घटी जब सभी आतंकी संगठनों ने, जिसमें हिज्बुल मुजाहिदीन भी शामिल था, कश्मीर के हर जिले के लिए अपना एक कमांडर नियुक्त किया. सुरक्षा बलों ने इनमें से लगभग सभी को मार दिया, सिवाए तीन कमांडरों के. ये लोग थे-रियाज़ नायकू (हिज्बुल मुजाहिद्दीन का ऑपरेशनल चीफ), जीनत-उल-इस्लाम (हिज्बुल का ही एक और टॉप कमांडर) और ज़ाकिर मूसा (अलकायदा से जुड़े संगठन अंसार गजवात-उल-हिंद का मुखिया था).

'ये सुरक्षा बलों के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जो ह्यूमन इंटीलिजेंस के एक बहुत ही मजबूत नेटवर्क के कारण ही संभव हो पाया. हमारे कई खबरियों के मारे जाने के बाद भी, जो इंटीलिजेंस की सूचनाएं हमें मिल रहीं थी उसमें कहीं से भी कोई बाधा नहीं आई.' ये कहना था एक पुलिस अफसर का.

शनिवार को, पुलवामा के त्राल इलाके के एक बागीचे में छह आतंकी मारे गए थे. पुलिस के मुताबिक अगर उन्हें स्थानिय लोगों की मदद नहीं मिलती तो ऐसा कर पाना मुश्किल था. इस अफसर ने जोर देकर कहा, 'हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि अगर एक तरफ घाटी में आतंकवादियों के समर्थन में लोग आ रहे हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं जो हर तरह का खतरा मोल कर पुलिस की मदद करने, उन्हें दक्षिणी कश्मीर में सक्रिय इन आतंकवादियों के बारे में जानकारी देने से पीछे नहीं हट रहे हैं.'

चाहे एक पुलिसवाला हो या सैनिक या फिर पारा मिलिट्री ट्रूपर, ये सभी लोग एक आतंकी को तभी मार सकते हैं, जब तक कि उन्हें किसी भरोसेमंद और पक्के खबरी के द्वारा सही समय पर जानकारी दी गई हो. जिस बड़ी संख्या में यहां आंतकवादियों को मारा गया है, वो स्थानीय मुखबिरों के द्वारा दी जाने वाली जानकारी के बिना मुमकिन नहीं होता, जिसके बाद ही इन मुठभेड़ों को अंजाम दिया गया है.

एक मामले में तो दक्षिणी कश्मीर में तैनात एक आर्मी अफसर ने बताया कि उन्हें एक किशोर लड़के ने, जो मुखबिरी का काम करता है, उन्हें फोन करके बताया कि उसने एक अंजान शख्स को उनके घर जाते हुए देखा है. 15 मिनट बाद जब फोर्स वहां पहुंची तब तक उन आतंकियों ने कब्रिस्तान में दो लड़कों को मार गिराया था. कुछ दिनों बाद उन आतंकियों ने उस किशोर मुखबिर बच्चे की भी हत्या कर दी थी.

कश्मीर युनिवर्सिटी का प्रोफेसर रफी भट आतंकी बनने के 40 घंटों के भीतर ही सुरक्षाबलों द्वारा मार गिराया गया. वो उन पढ़े-लिखे कश्मीरियों में से एक था जिन्होंने हिंसा का रास्ता चुना. ( तस्वीर: समीर यासिर)

कश्मीर युनिवर्सिटी का प्रोफेसर रफी भट आतंकी बनने के 40 घंटों के भीतर ही सुरक्षाबलों द्वारा मार गिराया गया. वो उन पढ़े-लिखे कश्मीरियों में से एक था जिन्होंने हिंसा का रास्ता चुना. ( तस्वीर: समीर यासिर)

ये लड़ाई अब इतनी समांनांतर हो गई है कि एक मुखबिर को अच्छी तरह से पता होता है कि जमीन पर कौन (आतंकी) काम कर रहा है और जमीन पर काम करने वाले को पता होता है कि मुखबिरी कौन कर रहा है. दक्षिणी कश्मीर की सड़कों पर, अगर किसी की मौत हो जाती है तो वहां के लोगों को पता होता है कि फलाने की मौत का जिम्मेदार कौन है. उन्हें ये भी पता होता है कि कौन आतंकवादी बन सकता है और क्यों? लेकिन, यहां हो रही लगातार मौतों ने इस संघर्ष को रोकने में कोई मदद नहीं की है. इसके उलट, यहां इस बात पर बहस चल रही है कि क्या आतंकियों की हत्या, इनाम पाने की लालच में किया जा रहा है.

जैसा कि राज्य के पूर्व वित्त-मंत्री डॉ हसीब द्राबु, जिनकी प्रदेश की प्रतिकूल अर्थव्यवस्था पर अपनी एक अलग मजबूत राय है, उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने एक लेख में कहा है, 'राज्य में आतंकवादियों की हत्या एक सिद्धांत बन गया है, जिसपर आतंकियों से निपटने की राज्य सरकार की पॉलिसी तैयार की गई है.' वे आगे कहते हैं, 'एक पूरा सिस्टम-चाहे वो औपचारिक हो या अनौपचारिक खड़ा किया गया है, जिसका उद्देश्य राज्य में आतंकवाद की जगह आतंकवादियों का सफाया करना है. इससे हुआ ये कि एक ऐसी प्रणाली विकसित हो गई है जिसमें हिंसा को एक संस्थागत ढांचा बना दिया गया है, और इसी क्रम में वीरता और बहादुरी को भी नए सिरे से परिभाषित कर दिया गया है. इसमें मीडिया की भी बहुत बड़ी भूमिका है, वो हिंसा का व्यवसायीकरण कर इसमें योगदान देती है. ये न सिर्फ बीमार करने वाला है बल्कि बेहद अंवेदनशील भी है.'

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