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भारत को ऐसे कानून की जरूरत है जो सभी उपेक्षितों की आवाज बन सके

एक आदर्श दुनिया वही कहलाएगी जहां राजसत्ता के सामाजिक एजेंडे का दार्शनिक आधार कुछ इस तरह का बनाया जाए कि किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी संदर्भ में भेदभाव ना हो

Milind Deora Milind Deora, Sanaa Bhutani Updated On: Jan 02, 2018 12:09 PM IST

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भारत को ऐसे कानून की जरूरत है जो सभी उपेक्षितों की आवाज बन सके

संसद का शीतकालीन सत्र 15 दिसंबर से शुरू हो गया. ये 5 जनवरी तक चलेगा. कार्यसूची में कई विधेयक विचार और बहस के लिए शामिल किए गए हैं. इनमें एक अहम विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के हितों की हिफाजत के बारे में है. इसका नाम है ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट) बिल 2016.

इस विधेयक का संदन में पेश होना खुद में ही एक प्रगतिशील कदम है. समाज को ज्यादा समतामूलक बनाने के लिहाज से यह एक सकारात्मक पेशकदमी है लेकिन विधेयक के प्रावधानों को लेकर देशभर में एक्टिविस्ट गुस्से में हैं और अपना विरोध जता रहे हैं.

विधेयक के ब्यौरे या फिर उसको लेकर हो रहे विरोध का जिक्र किए बगैर यहां एक बात दर्ज करना जरूरी है. बात यह है कि किसी इंसाफ-पसंद समाज की बुनियादी मान्यता है कि उसमें राजसत्ता या फिर व्यक्ति अपनी निजी हैसियत में किसी के साथ रोजगार या शिक्षा जैसे विभिन्न संदर्भों में भेदभाव का बर्ताव न करते हों.

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अभी मौजूद या फिर कभी बनाए गए बहुत से विधेयक, कानून अथवा आयोग महिला, बच्चे, अल्पसंख्यक तथा दिव्यांग व्यक्ति जैसे कमजोर माने जाने वाले तबके की हिफाजत के लिए हैं और इस सोच से बनाए गए हैं कि इन तबकों को एक न एक रूप में सामाजिक भेदभाव का शिकार होने से बचाया जा सके.

लिहाजा यह देखना मौजूं होगा कि मेक्सिको में सरकार ने वहां जारी अपवर्जी बर्ताव(सामाजिक भेदभाव के प्रसंग) से निबटने की कैसी कोशिश की है.

transgenders protest

ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के विरोध में कोलकाता में हुए प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर. बीते 10 दिसंबर को समुदाय के लोगों ने अपने अधिकारों की मांग के लिए एकजुट प्रदर्शन किया. (रायटर इमेज)

भारत और मेक्सिको दोनों ऐसे देश हैं जहां सामाजिक-सांस्कृतिक तनाव की वजह से संघर्ष, उथल-पुथल और व्यापक पैमाने पर भेदभाव की जमीन तैयार होती है. यूएन(संयुक्त राष्ट्रसंघ) के सहयोग से आयोजित एक दौरे में हमलोगों में से एक व्यक्ति साल 2007 में मेक्सिको गया.

मकसद वहां की स्वास्थ्य-व्यवस्था के अध्ययन का था, खासकर यह जानने का कि एचआईवी से निपटने के लिए मेक्सिको की सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? वहां हमने भेदभाव रोकने की राष्ट्रीय संस्था नेशनल काउंसिल टू प्रिवेन्ट डिस्क्रिमिनेशन (कोनाप्रेड) की बारीकियों को जाना.

साल 2003 में विंसेंट फॉक्स क्वेसेदा के राष्ट्रपति रहते मेक्सिको में यह एजेंसी (कोनाप्रेड) बनी. एजेंसी को बनाने का मकसद था सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर मेल-जोल को बढ़ावा देना क्योंकि मेक्सिको में सेक्सुअलिटी (यौनिकता) और वंशगत आधार पर खूब भेदभाव प्रचलित है.

व्यवहारिक तौर पर देखें तो यह कई किस्म के भेदभाव को रोकने वाला एक व्यापक नियमन है जो किसी खास वंश, राष्ट्र या लिंग में जन्म लेने या फिर किसी खास उम्र, दिव्यांगता, सामाजिक या आर्थिक हैसियत, सेहत, गर्भावस्था, भाषा, धर्म, मत, यौन-रुझान या वैवाहिक स्थिति को आधार बनाकर नागरिक के साथ होने वाले भेदभाव को रोकता है ताकि नागरिक अपने अधिकारों को प्रयोग बिना बाधा के कर सकें.

भारत में भी इन्हीं आधारों (भाषा, लिंग, दिव्यांगता आदि) पर खूब भेदभाव प्रचलित है. मिसाल के लिए ट्रांसजेंडर बिल समाज के एक ऐसे तबको को कानूनी पहचान और वैधता देने में कामयाब हो सकता है जिसे अब तक हाशिए पर रखा गया है लेकिन धारा 377 अब भी मौजूद है जो कहती है कि किसी व्यक्ति को अपनी सेक्सुअलिटी(यौनिकता) चुनने का कानूनी हक नहीं है.

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शायद हमारे लिए मेक्सिको में जारी पेशकदमी से सबक लेकर वैसा ही व्यापक कानून बनाने की जरूरत है जो ऊपर गिनाए गए तमाम आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोके.

भेदभाव के व्यवहार के एक-एक मोर्चे और तबकों की पहचान करते हुए अधिकारों की हिफाजत में एक-एक करके कानून बनाने की कठिन प्रक्रिया अपनाने की जगह अगर एक ऐसा व्यापक कानून बनाया जाए जो शिक्षा के संस्थानों में दाखिले से लेकर हाउसिंग सोसाइटियों में प्रवेश तक अलग-अलग संदर्भों में हरेक नागरिक को भेदभाव से बचाने की कानूनी गारंटी दे तो ऐसा कानून कहीं ज्यादा कारगर होगा.

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मेक्सिको में ट्रांसजेडर समुदाय के विरोध प्रदर्शन की तस्वीर. (रायटर इमेज)

अलग-अलग किस्म के भेदभाव को रोकने के लिए आयोग बनाए गए हैं और हमारा जाहिर मकसद इनमें से बेअसर साबित होने वाले आयोगों को खत्म करके कोनाप्रेड जैसी व्यापक एजेंसी बनाने का होना चाहिए जो समावेशन की नीतियों के अमल पर नजर रखती है और भेदभाव के बरताव की शिकायतों के निवारण का भी काम करती है.

एक आदर्श दुनिया वही कहलाएगी जहां राजसत्ता के सामाजिक एजेंडे का दार्शनिक आधार कुछ इस तरह का बनाया जाए कि ऊपर बताई गई बातों को आधार बनाकर किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी संदर्भ में भेदभाव ना हो.

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