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पैसिव यूथेनेशिया: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला सम्मान के साथ मरने का हक

एक तो ये मसले स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक हैं, साथ ही किसी समाज के इतिहास, संस्कृति, विचारधारा और कानून से भी उनका बड़ा गहरा रिश्ता है

Updated On: Mar 16, 2018 04:13 PM IST

Milind Deora Milind Deora, Sanaa Bhutani

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पैसिव यूथेनेशिया: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला सम्मान के साथ मरने का हक

दुनिया के विभिन्न धर्म और संस्कृतियों में मृत्यु को लेकर अलग-अलग धारणाएं प्रचलित हैं और मृत्यु से मनुष्य के रिश्ते के बारे में भी कई तरह से सोचा गया है. किसी धर्म या संस्कृति में यह विश्वास प्रचलित है कि मृत्यु के बाद भी एक जीवन है तो कहीं आत्मा के अमर होने की धारणा प्रचलित है और कर्म और पुनर्जन्म की मान्यता पर विश्वास किया जाता है. धर्मों और संस्कृतियों में मरणशील देह और भौतिक जगत से उसके रिश्ते को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं मिलती हैं.

मिसाल के लिए हिंदू धर्म की एक दार्शनिक उपधारा क्रिया-योग में महासमाधि की प्राप्ति की मान्यता प्रचलित है. बुद्धत्व प्राप्त कर चुके योगी का यह अंतिम आचार है जिसमें वह स्वेच्छापूर्वक देह और भौतिक जगत छोड़ने का निर्णय करता है. दुनिया भर में क्रियायोग को लोकप्रिय बनाने वाले और विश्वविख्यात पुस्तक ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी के लेखक परमहंस योगानंद और उनके गुरु युक्तेश्वर गिरि के बारे में माना जाता है कि दोनों ने स्वेच्छापूर्वक महासमाधि लेकर देह-त्याग किया था.

स्वेच्छापूर्वक मृत्यु का वरण या कह लें यह तय करना कि अपना देह-त्याग किस घड़ी करना है, ज्यादातर अध्यात्म के दायरे में ही स्वीकृत है. बीते 9 मार्च को आया सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला इस मान्यता को आगे तनिक और विस्तार देता है. इस फैसले में पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी गई और असाध्य रोगों से पीड़ित मरणासन्न लोगों के लिए लीविंग विल (अपनी मृत्यु के बारे में वसीयतनामा) के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए.

कठिन है ऐसे मसलों पर फैसला लेना

दुनिया के कई देशों और समाजों में यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु), मृत्युदंड और गर्भपात जैसे मसलों पर नैतिकता के कोण से बहसें सरगर्म हैं. इन मुद्दों को लेकर मत-मतांतरों का ध्रुवीकरण बहुत गहरा है सो ऐसे मसलों पर नीतिगत फैसले करना बहुत कठिन है.

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ऐसे मसलों का एक भावनात्मक पक्ष है- हम इस बात को समझते हैं और इसके लिए हमारे मन में सम्मान का भाव है लेकिन हमारा विश्वास है कि यूथेनेशिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत अहम है क्योंकि हमारी समझ में कोर्ट के फैसले से एक बुनियादी अधिकार को औपचारिक स्वरूप और सांस्थानिक वैधता हासिल हुई है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

कोर्ट का 538 पन्नों का फैसला और दिशा-निर्देश बड़ा सुगठित और अपने अर्थों के लिहाज से एकदम स्पष्ट है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब बारी संसद की है. उसके सामने एक सुनहला अवसर है कि वह कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए कानून का मसौदा तैयार करे और उसे विधायी मंजूरी दे. हम इस फैसले का तहेदिल से स्वागत करते हैं. व्यक्ति को निजता और स्वतंत्रता का अधिकार है, उसे गरिमापूर्वक जीवन जीने और मरने का अधिकार है और कोर्ट का फैसला व्यक्ति के ऐसे अधिकारों की राह तैयार करता है.

एक्टिव यूथेनिशिया के इन रूपों पर भी हो बहस

इस मुकाम पर हमें शायद एक्टिव यूथेनेशिया (सक्रिय इच्छामृत्यु) के कुछ रूपों पर भी बहस करनी चाहिए. हम शुरुआत में ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं. बात यह कि एक्टिव यूथेनेशिया अपने सभी रूपों में हमें स्वीकार हो, ऐसा नहीं है. ना ही एक्टिव यूथेनेशिया के कुछ नकारात्मक निहितार्थों के ही हम समर्थन में है.

हालांकि दुख-दर्द चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक एकदम ही आत्मगत मामला है लेकिन चिकित्सीय जांच-परख में अगर यह निकलकर आता है कि किसी व्यक्ति के जीने की एकदम ही उम्मीद नहीं है तो भी हमें नहीं लगता कि ऐसी स्थिति में एक्टिव यूथेनेशिया की अनुमति दी चाहिए, भले ही वह व्यक्ति अपने लिए मृत्यु-दान मांग रहा हो.

Supreme Court (1)

बहरहाल, कोई व्यक्ति सांघातिक बीमारी से ग्रस्त हो, उसके जीवन के चंद दिन ही बाकी हों और जीवन के शेष बचे दिनों में उसकी स्थिति का लगातार नाजुक होते जाना और आखिर को मृत्यु तक पहुंचना एकदम तय हो तो फिर एक्टिव यूथेनेशिया के लिए कुछ गुंजाइश बनती है. अगर उपचार के किसी मुकाम पर मेडिकल बोर्ड और नियमन की अन्य संस्थाएं यह सत्यापित कर दें किसी बीमार व्यक्ति की दशा अब चिकित्सा के जरिए नहीं सुधारी जा सकती तो फिर हमें इस गुंजाइश पर विचार करना चाहिए कि उस व्यक्ति को उपचार से मना कर देने का अधिकार है क्योंकि ऐसे उपचार के सहारे उसका जीवन चंद दिनों तक ही जारी रखा जा सकता है.

जैसे किसी व्यक्ति को व्यर्थ ही मशीनों के सहारे जीवित रहने की जगह गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार है उसी तरह यह भी सोचा जा सकता है कि क्यों ना जिस व्यक्ति की मौत एकदम नजदीक और तयशुदा हो उसे शांतिपूर्वक मृत्यु को गले लगाने का अधिकार दे दिया जाए, आखिर वह चीर-फाड़ और दर्द से भरी चिकित्सीय प्रक्रियाओं से गुजरते हुए उस स्थिति तक पहुंचने का इंतजार क्यों करे जहां उसे पैसिव यूथेनेशिया के योग्य माना जाएगा?

Euthanasia-825

प्रतीकात्मक

ना कुछ सही एक विचार सही लेकिन हमें लगता है कि इस विचार पर देश में बहस चलाने की जरूरत है. जहां तक पैसिव यूथेनेशिया को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सवाल है, हमें उम्मीद है कि सरकार और संसद इसपर कानून बनाने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू करेंगे और इस सिलसिले में कानूनी मामलों और चिकित्सा जगत के लोगों से असरदार ढंग से विचार-विमर्श करते हुए सलाह ली जायेगी क्योंकि विधिक मामलों के विशेषज्ञों के हाथों ही पैसिव यूथेनेसिया से संबंधित विधेयक का मसौदा तैयार होना है और चिकित्सा जगत के लोगों को इस कानून पर अमल करना है.

कोर्ट का फैसला और इसमें बताए गए दिशानिर्देश अपने अर्थ के एतबार से बिल्कुल स्पष्ट हैं, सो हमें उम्मीद है कि वक्त रहते मामलों के पुनरावलोकन और उनपर फैसले के लिए कोई कारगर इंतजाम किया जाएगा. इंसाफ में देर करना इंसाफ से इनकार करना है- यह कहावत ऐसे हालात में एक नया ही अर्थ देती है. ध्यान रहे कि नौकरशाही लाल फीताशाही के अपने रवैए से गरिमापूर्ण मृत्यु के किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन कर सकती है.

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