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मछलियों से ज्यादा है समुद्री कचरा, महाराष्ट्र सरकार जैसे और भी कदम उठाए जाएं

जरूरी है कि हर कोई निजी स्तर पर प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने के लिए कदम उठे

Milind Deora Milind Deora Updated On: Apr 14, 2018 04:10 PM IST

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मछलियों से ज्यादा है समुद्री कचरा, महाराष्ट्र सरकार जैसे और भी कदम उठाए जाएं

प्लास्टिक के व्यापक इस्तेमाल ने हमें दिलचस्प कशमकश और धर्मसंकट में डाल दिया है. प्लास्टिक एक ऐसा सर्वव्यापी उत्पाद है जिसका उपयोग लगभग सभी समुदायों और उद्योगों में, इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और उपकरणों, पैकेजिंग, फर्नीचर, विमानन, मोटर वाहन क्षेत्र, मशीनरी और यहां तक कि जीवन-रक्षक उत्पादों में किया जाता है. दूसरी तरफ, वह प्लास्टिक ही है जो हमारे पर्यावरण में ज़हर घोल रही है. हमारे जल स्रोतों, मिट्टी और प्राकृतिक नज़ारों को तेजी के साथ दूषित करने के लिए अकेले प्लास्टिक ही जिम्मेदार है.

प्लास्टिक अगर कुछ उद्योगों में बेहद उपयोगी है, वहीं दूसरे उद्योगों के लिए बेकार और हानिकारक है. खासकर, एक बार उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद (सिंगल यूज़ प्लास्टिक प्रोडक्ट्स) जैसे कि डिस्पोजेबल स्ट्रॉ, कप और प्लेट्स, सब्जी और फल बेचने वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक बैग्स (पन्नी या थैली) वगैरह भारत में प्लास्टिक के सबसे हानिकारक और गैरज़रूरी रूप हैं. इन प्लास्टिक उत्पादों को रिसाइकिल (पु:उपयोग) नहीं किया जा सकता है. एक बार इस्तेमाल करने के बाद इन प्लास्टिक उत्पादों को कूड़े में फेंक दिया जाता है। फिर फिर प्लास्टिक के उस कचरे को लैंडफिल साइट्स पर डाल दिया जाता है. इसके बाद देर-सवेर उस दूषित कचरे को किसी न किसी तरह से समुद्र तक पहुंचने का रास्ता मिल जाता है. मिट्टी को दूषित करने के बाद समुद्र में पहुंचकर प्लास्टिक का यह कचरा पर्यावरण का और भी ज़्यादा नुकसान करता है.

फ्रांस से बड़ा कचरा

sea garbage (3)

प्लास्टिक के अत्याधिक और अनावश्यक इस्तेमाल की वजह से दुनिया भर में पर्यावरण का भारी नुकसान हो रहा है. पर्यावरण को होने वाली इस क्षति को "ग्रेट पैसेफिक गारबेज पैच" या "पैसेफिक ट्रैश वॉर्टेक्स" के ज़रिए समझा जा सकता है. ग्रेट पैसेफिक गारबेज पैच दरअसल कैलिफोर्निया और हवाई द्वीप के बीच स्थित समुद्र में मलबे का बिखरा हुआ विशाल ढेर है. इस समुद्री मलबे का आकार फ्रांस जैसे देश के क्षेत्रफल से तीन गुना बड़ा है. ग्रेट पैसेफिक गारबेज पैच में 1.8 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकड़ों के रूप में 79,000 टन प्लास्टिक का कचरा मौजूद है.

प्लास्टिक के अंधाधुंध इस्तेमाल से समुद्र का सबसे ज़्यादा नुकसान हो रहा है. विशेष रूप से समुद्र में माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है. माइक्रोप्लास्टिक्स की वजह से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (मैरीन इकोसिस्टम) के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है. माइक्रोप्लास्टिक्स के चलते समुद्र में रहने वाली कई प्रजातियों की प्रजनन क्षमता खत्म होती जा रही है. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का अनुमान है कि, अगर हम इसी तरह प्लास्टिक का उत्पादन, उपयोग और फिर अनुचित तरीके से उसका विसर्जन करते रहे तो साल 2050 तक महासागरों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक की मात्रा ज़्यादा हो जाएगी.

हमारे जल स्रोतों में तेजी से हो रहे ह्रास और दूषण का मैं भी गवाह रहा हूं. जब मैंने पहली बार मैक्सिको के तूलम में समुद्र तटों का दौरा किया, तब वे स्वच्छ-निर्मल जल और रेत के अदभुत विस्तार नज़र आते थे. उस समय उन समुद्र तटों का प्राकृतिक नज़ारा देखते ही बनता था. लेकिन साल 2014 में चार साल बाद जब मैं दोबारा वहां पहुंचा, तो मैंने देखा कि वे सभी संदुर समुद्री तट प्लास्टिक के कचरे से अटे पड़े थे.

निजी स्तर पर जागरुकता जरूरी

sea garbage (2)

प्लास्टिक से होने वाले नुकसान से लोग धीरे-धीरे आगाह हो रहे हैं. लिहाज़ा यह विषय अब उतना निराशाजनक नहीं रह गया है. भारत में प्लास्टिक के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ जागरूकता और सक्रियता लगातार बढ़ रही है. मैं व्यक्तिगत रूप से कई ऐसे लोगों को जानता हूं जो इस मामले में भले ही बड़े पैमाने पर न सही लेकिन अपने छोटे-छोटे तरीकों से बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं. मैं खुद बहुत साफगोई के साथ रेस्तरां और कॉफी शॉप में प्लास्टिक के स्ट्रॉ और चमचों (स्टरर्स) के इस्तेमाल से साफ इनकार कर देता हूं. इसके अलावा मैं लोगों से गुज़ारिश करता हूं कि वे प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर न रखें या किराने के सामान की खरीदारी के लिए घर से अपना खुद का थैला (बैग) लेकर जाएं. हम लोग इस तरह के कामों के ज़रिए प्लास्टिक के उपयोग का विरोध करने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि मुझे विश्वास है कि इस समय, महज़ ऐसी कोशिशें पर्याप्त भर नहीं है.

मेरा मानना है कि, एक बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक उत्पादों के खिलाफ लड़ाई में दुनिया काफी पिछड़ चुकी है. ऐसे में सिर्फ जागरूकता पैदा करके या व्यक्तिगत रूप से प्लास्टिक उत्पादों का उपयोग न करने का संकल्प लेने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं. लिहाज़ा अब इस मामले में हमें ठोस और दूरगामी कदम उठाने होंगे.

प्लास्टिक की समस्या से निजात पाने के लिए हमें बड़े पैमाने पर राष्ट्रव्यापी कार्रवाई की सख्त ज़रूरत है. जब तक कोई व्यक्ति प्लास्टिक की उचित रिसाइकिलिंग (पु:उपयोग) सुनिश्चित करने के लिए किसी टेक्नॉलिजी का आविष्कार नहीं कर लेता, या फिर प्लास्टिक को फिर से पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने का तरीका नहीं खोजा जाता, तब तक एक समुदाय के तौर पर यह हमारे लिए प्लास्टिक उत्पादों के खिलाफ खड़े होने का समय है. हमें एकजुट होकर सामूहिक रूप से अपनी कुछ सहूलियतों का बलिदान करना होगा और प्लास्टिक के ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादों के उपयोग का बहिष्कार करना होगा.

क्या कर रही हैं सरकारें

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प्लास्टिक को लेकर मौजूदा महाराष्ट्र सरकार जागरूक नज़र आ रही है. महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में कई किस्मों के प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण, बिक्री, वितरण, उपयोग और भंडारण पर प्रतिबंध लगाया था.  महाराष्ट्र सरकार के इस अहम और ज़रूरी कदम का लोगों ने स्वागत किया. हालांकि, विशिष्ट प्लास्टिक उत्पादों को लेकर अधिसूचना जारी होने के बाद प्लास्टिक लॉबी (प्लास्टिक उत्पाद निर्माताओं) ने महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. प्लास्टिक लॉबी के दबाव के चलते आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा. अधिसूचना जारी होने के केवल एक पखवाड़ा बाद सरकार को कुछ प्लास्टिक उत्पादों से प्रतिबंध हटाना पड़ा.

इनमें दूध के पैकेट और पीईटी बोतलें जैसे प्लास्टिक उत्पाद शामिल हैं. लिहाज़ा ऐसे में प्लास्टिक के खतरों से निबटने की महाराष्ट्र सरकार की कोशिशें बेनतीजा होती नज़र आ रही हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र में कुछ विशिष्ट प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध महज़ एक अधिसूचना भर था. क्योंकि प्रतिबंध को व्यवहार में लाने के लिए न तो कोई रणनीति बनाई गई थी और न ही कोई निरीक्षण तंत्र तैयार किया गया था. इस बात के पक्के सबूत हैं कि केवल प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने भर से शायद ही कभी कोई ठोस प्रभाव पड़ता है. उचित रणनीति और निरीक्षण तंत्र के अभाव में प्रतिबंध के बावजूद प्लास्टिक का धड़ल्ले से निर्माण, खरीद-फरोख्त और इस्तेमाल होता है.

प्लास्टिक पर प्रतिबंध के मामले में फिलहाल केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार, दोनों संभवत: विश्वसनीयता के संकट गुज़र रही हैं. उनकी तरफ से एक बिगड़ैल बैल को उसके सींगों से पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है. यानी प्लास्टिक जैसी खतरनाक और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह समस्या से निजात पाने के लिए नाकाफी कोशिशें हो रही हैं. सरकार प्लास्टिक लॉबी पर लगाम कसे बिना प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित नहीं कर सकती है. लिहाज़ा सरकार को प्लास्टिक लॉबी के दबाव से छुटकारा पाना ही होगा और मज़बूत इच्छाशक्ति के साथ प्लास्टिक पर प्रतिबंध को प्रभावी तरीके से लागू करना होगा.

हालांकि, जब तक हमारी सरकारें बाहरी प्रभावों से खुद को परे रखने की शक्ति नहीं पा लेतीं, तब तक हम जैसे देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि, हम इस मामले में एक ज़ोरदार आंदोलन का निर्माण करें. हम एकजुट होकर आंदोलन के ज़रिए हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों पर यह दबाव डाल सकते हैं कि वे एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक उत्पादों पर राज्यव्यापी या राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने को मजबूर हों. यही नहीं हमें उस प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए भी मज़बूती के साथ खड़े होना होगा.

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