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आधार डेटा की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करे सरकार, खतरनाक होगी इसकी अनदेखी

पत्रकार के खुलासे से यह जाहिर हो गया कि हमारे डेटा पर निहित स्वार्थों के तहत सेंधमारी हो सकती है, साथ ही देश के बाहरी दुश्मन भी इस डेटा को हासिल कर उसका दुरुपयोग कर सकते हैं

Milind Deora Milind Deora Updated On: Jan 13, 2018 05:42 PM IST

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आधार डेटा की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करे सरकार, खतरनाक होगी इसकी अनदेखी

बस पांच सौ रुपए खर्च कीजिए और लाखों भारतीय लोगों के आधार-कार्ड के ब्यौरे आपको हासिल हो जाएंगे- देश के लिए यह सचमुच बहुत चिंताजनक खुलासा है. यूपीए सरकार में रहे हमलोगों के लिए अब यह सोच पाना बड़ी मुश्किल है मौजूदा सरकार आधार का इस्तेमाल किस तरह लोगों की जिंदगी में ताक-झांक करने के एक औजार के रूप में कर रही है.

हमने आधार की कल्पना एक ऐसी प्रणाली के रूप में की थी जो प्रशासनिक कामकाज को एक समान करने में सहायक सिद्ध होगी और निजी तौर पर मेरा खयाल था कि आधार की प्रणाली राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना का व्यापक मंच साबित होगी. हमने यही सोचा था कि यह सूचना और संचार की तकनीकों को संबल देने का एक सहायक माध्यम है और इसके सहारे समय और संसाधन की बर्बादी से बचते हुए लाभार्थियों तक यथासंभव अधिकतम पहुंच बनाई जा सकेगी.

दुरूपयोग रोकने के लिए हिफाजती इंतजाम करे सरकार

दुर्भाग्य की बात है कि आधार की प्रणाली अब विवादों के दायरे में आ गई है और डेटा-संबंधी सार्वजनिक सेवा से इसका रूप बदलकर निगरानी के एक ऐसे विशाल तंत्र में तब्दील हो चुका है जो सब पर नजर रखता है, अपने भीतर सारे कुछ समेटे हुए है और नागरिकों की निजी जिंदगी में ताक-झांक की नियत से दबे पांव दखल दे रहा है.

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मुझे अमूमन यह बात ठीक लगती है कि निजता के अधिकार के कानून अगर अपनी जगह दुरुस्त हों और काम करें तो सरकार कुछ शर्तों के अधीन बिग डेटा और प्रौद्योगिकी के आपसी मेल का फायदा उठाते हुए निगरानी का काम अंजाम दे सकती है. मिसाल के लिए वह किसी क्रेडिट कार्ड के जरिए हुई खरीदारी या ऑनलाइन सर्च-हिस्ट्री के आंकड़े खंगाल कर यह तय कर सकती है कि कहीं कोई व्यक्ति किसी खतरनाक गतिविधि को अंजाम देने के मंसूबे तो नहीं बना रहा. यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-निरोधी भारत के प्रयासों के लिहाज से बहुत जरूरी है. लेकिन सरकार की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वह हिफाजती इंतजाम करे ताकि नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारियां लीक ना हों, उनका दुरुपयोग ना हो सके.

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सरकार पर लगेगा अंकुश

इस सोच से ही हाल में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार करार दिया. बेशक कोई सोच सकता है कि सरकार तो आधार-प्रणाली को ताक-झांक करने के एक औजार में तब्दील करने पर तुली थी लेकिन कोर्ट के फैसले से सरकार की इस मंशा पर पानी फिर गया है और कोर्ट के फैसले से सरकार की बेहयाई पर अंकुश लगेगा.

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कोर्ट को फैसले की रोशनी में उम्मीद की जा सकती है कि सरकार रोडमैप और निर्धारित समय-सीमा के बारे में तेजी से राय बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानूनी रूप देने के प्रस्तावित उपायों का जिक्र करेगी. साथ ही, इस बहस की भी शुरुआत करेगी कि भारतीयों के लिए निजता के अधिकार के क्या मायने हैं और भारतीय संदर्भ में इसे किस तरह सबसे बेहतर रूप दिया जा सकता है.

सरकार का जिम्मा बनता है कि वह नागरिकों के डेटा की हिफाजत करे लेकिन इसकी जगह हमारा सामना अनसुनी और अनदेखी करने के आदी रह चुके एक ऐसे प्रशासन से हो रहा है जिसने डेटा की निजता और सुरक्षा के मोर्चे पर भारी लापरवाही बरती है.

Aadhaar-CARD

पत्रकार के खुलासे से यह जाहिर हो गया कि हमारे डेटा पर निहित स्वार्थों के तहत सेंधमारी हो सकती है, साथ ही देश के बाहरी दुश्मन भी इस डेटा को हासिल कर उसका दुरुपयोग कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रोशनी में इस अवसर का इस्तेमाल निजता के बारे में खास हिंदुस्तानी किस्म की धारणा बनाने में किया जा सकता था. साथ ही, डेटा लीक्स को रोकने के उपाय किए जा सकते थे और डेटा की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान बनाए जा सकते थे.

समझदारी का परिचय दे सरकार

हमारी निजी पहचान से जुड़े डेटा को लेकर सरकार का रुख बहुत अड़ियल है. नागरिकों की निजी जिंदगी में राज्यसत्ता की गैरकानूनी ताक-झांक के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले एडवर्ड स्नोडेन ने अमेरिकी सरकार के सर्विलांस प्रोग्राम (नागरिकों की निजी गतिविधियों पर नजर रखने के कार्यक्रम) प्रिज्म का खुलासा किया था. इन्हीं एडवर्ड स्नोडेन ने अपने एक ट्वीट के जरिए कहा कि सारा दोष यूआईडीएआई का है और सरकार को अगर सचमुच इंसाफ की चिंता होती तो वह ‘उन नीतियों में सुधार करती जो एक अरब भारतीयों की निजता को खत्म कर रही हैं.’

भारत में चल रही निजता संबंधी बहस को लेकर सरकार का रवैया शुतुरमुर्ग की तरफ अपना मुंह सच्चाई से मोड़ लेने का है. पूरी दुनिया में, हमारी तरह के प्रगतिशील और उदारवादी लोकतंत्रों में सरकारें नागरिकों के साथ साझा कायम करके निजता बनाम सुरक्षा के मुद्दे को संतुलित रूप देने में लगी हैं. अब वक्त आ गया है जब भारत की सरकार सच्चाई से मुंह मोड़ रखने की अपनी रीत से उबरते हुए सामने खड़ी चुनौती का मुकाबला करे और समझदारी का परिचय दे.

(लेखक पूर्व सांसद हैं और यूपीए-2 की केंद्र सरकार में आईटी एवं संचार राज्यमंत्री और जहाजरानी एवं बंदरगाह राज्यमंत्री रह चुके हैं)

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