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सच्चे चुनाव सुधारों के लिए इलेक्शन कमीशन को वित्तीय पारदर्शिता और खुद की स्वतंत्रता पर जोर देना होगा

चुनाव सुधार, चुनाव में फंडिंग, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदान के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए कुछ सुझाव हैं, जो कारगर साबित हो सकते हैं.

Milind Deora Milind Deora Updated On: May 23, 2018 06:10 PM IST

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सच्चे चुनाव सुधारों के लिए इलेक्शन कमीशन को वित्तीय पारदर्शिता और खुद की स्वतंत्रता पर जोर देना होगा

मौजूदा चुनाव आयुक्तों ओपी रावत, सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के साथ बैठक में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने कुछ ऐसे मुद्दे उठाए हैं, जो चुनाव आयोग के लिए विश्वसनीयता के संकट की तरफ इशारा कर रहे हैं.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इस बैठक में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ए के जोती के कार्यकाल में आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई. इस दौरान हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव की तारीखों के अलग-अलग ऐलान, आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता बिना सुनवाई के केवल शिकायतों के आधार पर खत्म करने करने जैसे मुद्दे थे.

बैठक में जिन अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई, उनमें नेताओं के नफरत भरे भाषणों और चुनाव प्रचार के लंबे होते फासलों से लेकर ईवीएम और पोलिंग बूथ से जुड़े सुधार शामिल हैं.

देश में चुनाव सुधारों से जुड़े इन मुद्दों पर नए सिरे से शुरू हुई चर्चा का मैं खुले दिल से स्वागत करता हूं. इस बैठक से जो संकेत मिले हैं, उससे लगता है कि चुनाव आयोग अपने कामकाज में सुधार और बदलाव के लिए तैयार है, ताकि वो देश को बेहतर और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया दे सके.

इस मौके की जरूरत ये है कि चुनाव आयोग इन सुधारों को लागू करे. हर वो जरूरी कदम उठाए, जो चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाते हैं. ये कदम तेजी से उठाए जाने की जरूरत है. खास तौर से इसलिए भी क्योंकि 2019 के आम चुनाव करीब हैं.

चुनाव सुधार, चुनाव में फंडिंग, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदान के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए ये कुछ सुझाव हैं, जो कारगर साबित हो सकते हैं.

चुनावी फंडिंग

Voting in Election

चुनावी खर्च की मौजूदा व्यवस्था को नए सिरे से ढालने की जरूरत है, ताकि हम अर्थव्यवस्था में काले धन की आमदो-रफ़्त रोक सकें. नकदी में लेन-देन कम होना जरूरी है. क्योंकि नकदी के जरिए ही चुनाव प्रचार का ज्यादातर खर्च होता है. नकद लेन-देन का नतीजा ये होता है कि इसका कोई हिसाब नहीं होता. किसने पैसा दिया, किसने लिया कुछ पता नहीं चलता. किसी की जवाबदेही तय नहीं होती.

जब तक हम चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता नहीं लाते, ये सुनिश्चित नहीं करते कि हर पैसे का हमारे बैंकिंग सिस्टम में हिसाब हो, तब तक असल चुनाव सुधार नहीं हो सकते. इसमें एक बड़ा कदम चुनावी बॉन्ड के तौर पर उठाया गया है. हालांकि ये भी बेनाम ही होगा, लेकिन इनसे काले धन की खेप नहीं तैयार होगी. नकदी के मुकाबले चुनावी बॉन्ड काफी पारदर्शी हैं.

चुनाव आयोग की निष्पक्षता

खुद चुनाव आयोग ने ये सुझाव दिया है और बरसों से ये मांग करता आया है कि लोकसभा और राज्यसभा की तरह ही चुनाव आयोग का अपना सचिवालय होना चाहिए. स्वतंत्र रूप से सचिवालय होने पर चुनाव आयोग अपने नियम खुद बनाकर, लोगों की भर्तियां, नियुक्तियां, प्रमोशन दे सकेगा. फिर आयोग के कामकाज में सरकारी और सियासी दखलंदाजी रुकेगी. आयोग की निष्पक्षता के लिए सुझाए गए अन्य सुधारों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था लागू करने और मुख्य चुनाव आयुक्त की तरह ही बाकी के दो चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक सुरक्षा की व्यवस्था के सुझाव अहम हैं.

मतदान के बुनियादी ढांचे मे सुधार

हर पोलिंग बूथ में वोटों की गिनती ईवीएम से होती है. इससे हम हर इलाके के वोटिंग के तरीके का अंदाजा लगा सकते हैं. इससे ये भी हो सकता है कि सियासी दल इलाकों के हिसाब से जीत हासिल करने के लिए गैरवाजिब तरीके अपनाएं. इस चुनौती से निपटने के लिए, एक सुधार ये सुझाया गया है कि टोटलाइज़र मशीनों का इस्तेमाल हो. इन मशीनों से 14 ईवीएम में डाले गए वोट एक साथ गिने जा सकते हैं. इससे किसी खास इलाके के पोलिंग बूथ में हुई वोटिंग का अंदाजा नहीं लगाया जा सकेगा.

election evm

वीवीपैट मशीन की मदद से कोई भी मतदाता कागज की पर्ची के जरिए अपने वोट डाले जाने की तस्दीक कर सकता है. ऐसा वो अपना वोट डालने के फौरन बाद वीपीपैट मशीन से निकली पर्ची के जरिए कर सकता है. 2014 के आम चुनाव में वीपीपैट मशीनों को पायलट के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. इसके बाद कुछ राज्यों के चुनाव में भी वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल हुआ है. लेकिन पूरे देश में वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल हो, इसके लिए अब तक जरूरी इंतजाम नहीं हुए हैं. बल्कि इनका विरोध हो रहा है.

जैसा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इस बैठक में कहा कि अभी जो वीवीपैट मशीनें इस्तेमाल हो रही हैं, उनमें किसी भी सीट के एक ही मतदान केंद्र के वोटों से जुड़ी पर्चियां निकलती हैं. मुझे लगता है कि वोटों से छेड़खानी रोकने के लिए वीवीपैट मशीनें बेहद असरदार तरीका हैं. अगर ईवीएम ठीक से काम नहीं करतीं, तो इसमें भी वीवीपैट मशीनें कारगर साबित हो सकती हैं. इसलिए हमें वीवीपैट मशीनों में और निवेश करना चाहिए.

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