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#Metoo: महिला पत्रकारों का यौन उत्पीड़न, मीडिया संस्थाएं अपने गिरेबां में झांके...!

तनुश्री सिर्फ एक प्रतीक या नाम हैं, असल में भारत की महिलाओं का एक वड़ा वर्ग गुस्से में है. यह वो वर्ग है, जिसने घर के बाहर कदम रखा... पुरुषों के क्षेत्र में अपने पांव जमाने की कोशिश की, उनके साथ प्रतिस्पर्धा किया, उन्हें हराया, उन्हें चित किया, कई बार उनके इरादों पर पानी फेरा तो कई बार उन्हें अपमानित भी किया

Updated On: Oct 07, 2018 08:04 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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#Metoo: महिला पत्रकारों का यौन उत्पीड़न, मीडिया संस्थाएं अपने गिरेबां में झांके...!

एक औरत होने के नाते मेरा स्वाभाविक रुझान महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लिखना है, लेकिन आज पहली बार समझ नहीं पा रही हूं कि क्या लिख दूं या क्या छोड़ दूं, क्योंकि मसला उस दुनिया से है, जो परिवार के बाद हमारा (पत्रकार बिरादरी की महिलाओं) का दूसरा ठिकाना है. कई बार इतना ज्यादा, कि हम होशो-हवास में वहां और वहां के लोगों के साथ... परिवार से ज्यादा समय बिताते हुए पाए जाते हैं. और जब हमसे पूछा जाता है कि क्या आप के 16-17 साल के करियर में कभी यौन हमला, सेक्सुअल मिसकंडक्ट, सेक्सुअल एडवांसमेंट या फिर बिना किसी उकसावे के आपके सामने किसी ने कोई इंडीसेंट प्रपोजल रखा है? किसी ने कोई अपमानजनक कमेंट या टिप्पणी की है, किसी ने आपको ऑब्जेक्टिफाई किया है? तो ऐसे कई अनुभव एकाएक सामने आ जाते हैं. लेकिन- क्या ये सिर्फ उस व्यक्ति का दोष है, जिसने यह जुर्रत की... या फिर उस इंडस्ट्री या संस्थान का भी, जो आपको यानी महिलाओं को सुरक्षा देने में नाकाम रहा ? आज जरूरत है इसपर गंभीरता से चर्चा करने और इसपर बात करने की...

सेक्सुअल मिसकंडक्ट का मामला साल भर पहले अमेरिका में शुरू हुआ था

औरतों के साथ पहली बार सेक्सुअल असॉल्ट या सेक्सुअल मिसकंडक्ट का मसला आज से ठीक एक साल पहले अमेरिका में शुरू हुआ था, जब हॉलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे व्हाईंस्टीन के खिलाफ अभिनेत्री रोज मैक्गोवन ने सेक्सुअल असॉल्ट का आरोप लगाया था. जिसके बाद मैक्गोवन के आह्वान पर दुनियाभर की औरतें एकजुट हुईं और #Metoo कैंपेन की शुरुआत हुई. इसके ठीक एक साल बाद भारत में इस समय एक बार फिर से इस आंदोलन की गूंज तेज हो गई है. शुरुआत, पूर्व मिस इंडिया और अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के 10 वर्षों के बाद भारत लौटने और लौटने के बाद फिर से एक्टर नाना पाटेकर खिलाफ आवाज उठाने से हुई. तनुश्री ने नाना पाटेकर पर उनके साथ 10 साल पहले एक फिल्म की शूटिंग के दौरान गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया था. लेकिन, उनकी आवाज को दबा दिया गया था. लेकिन, इस बार तनुश्री के समर्थन में फिल्म जगत से ही कई लोग सामने आए हैं.

Tanushree Dutta

नाना पाटेकर-तनुश्री दत्ता

लेकिन, तनुश्री सिर्फ एक प्रतीक या नाम हैं, असल में भारत की महिलाओं का एक वड़ा वर्ग गुस्से में है. यह वो वर्ग है, जिसने घर के बाहर कदम रखा... पुरुषों के क्षेत्र में अपने पांव जमाने की कोशिश की, उनके साथ प्रतिस्पर्धा किया, उन्हें हराया, उन्हें चित किया, कई बार उनके इरादों पर पानी फेरा तो कई बार उन्हें अपमानित भी किया. लेकिन इतना सबकुछ करते हुए- यह भी हुआ कि, पुरुषों से लोहा-लेती यह महिलाएं भी परेशान हुईं, प्रताड़ित हुईं, रोई-धोईं, अपनी आप पर शक किया, अपनी क्षमता को संदेह की नजर से देखा, नौकरी छोड़ी, घर में बंद हो गईं, काम से हाथ धो बैठीं, सालों-साल अवसाद में रहीं. यह महिलाएं अब बोल रहीं हैं... कई बड़े किले एक साथ ध्वस्त हो रहे हैं.

एक तरफ जहां फिल्मी दुनिया से कंगना रानौत, विकास बहल के खिलाफ बाहर आईं तो दूसरी तरफ अकादमिक की दुनिया में रेया स्टीयर ने कुछ समय पहले ऐसे पर्वट्स प्रोफेसर्स के नाम सार्वजनिक करने का आह्वान किया था, जिन्होंने अपनी स्कॉलर्स और छात्राओं के साथ गलत व्यवहार किया था. लेकिन, फिलहाल इस वक्त हम बात करेंगे - मीडिया की दुनिया से - जहां एक साथ कई किले ढह रहे हैं, जहां एक तूफान आ खड़ा हुआ है.

पत्रकार आयुष ने शुरू से सेक्सुअल फ्लर्टिंग करनी शुरू कर दी थी

इसकी शुरुआत मुंबई की एक रिसर्चर ने पत्रकार आयुष सोनी के साथ एक डेटिंग ऐप पर हुई जान-पहचान और फिर बाद की मुलाकात और उस मुलाकात के बाद उनके व्यवहार के बाद की घटना से शुरू की. लड़की के मुताबिक वो उनसे जान-पहचान बढ़ाने के मकसद से मिली थीं, लेकिन आयुष ने शुरू से उनके साथ सेक्सुअल फ्लर्टिंग करनी शुरू कर दी थी, जिससे वो काफी परेशान हुईं और बड़ी मुश्किल से उनसे पीछा छुड़ाया. इसके बाद द वायर की पत्रकार अनु भुयन ने पत्रकार मयंक जैन पर ऐसे ही आरोप लगाए, उन्होंने यह भी कहा कि - जब उन्होंने मयंक का विरोध किया तो मयंक ने उनसे कहा कि - उन्हें ऐसा लगा कि वो ‘उस तरह’ की महिला हैं,  हफपोस्ट के पूर्व ट्रेंड्स एडिटर अनुराग वर्मा के खिलाफ 3 महिलाओं ने उन्हें आपत्तिजनक मैसेज भेजने और उनसे उनकी न्यूड तस्वीरें मांगने का आरोप लगाया है. फिर, अचानक से ट्विटर पर बेंगलुरु के मिरर नाउ अखबार की पूर्व पत्रकार संध्या मेनन ने टाइम्स ऑफ इंडिया के रेजिडेंट एडिटर के.आर श्रीनिवास पर साल 2008 में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. संध्या ने एचआर से इसकी शिकायत भी थी लेकिन कोई राहत नहीं मिली. अंत में उन्होंने नौकरी छोड़ दी. कुछ ऐसा ही अनुभव हिंदुस्तान टाइम्स की एक लीगल स्टाफ को साल 2014 में हुआ जब वो अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के लिए काम करने लगीं और वहां उनका सामना नेश्नल पॉलिटिकल अफेयर्स एडिटर प्रशांत झा से हुआ. प्रशांत का व्यवहार भी लगभग वैसा ही था - जैसा हर प्रिडेटर का होता है, और उस महिला को नौकरी छोड़ कर जाना पड़ा.

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अब बात इस मसले पर मेरे निजी अनुभवों और राय की. जब मैं यह लिख रही हूं तो सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर लोग यह भी लिख रहे हैं कि कैसे काम के दौरान, न्यूजरूम में - उन्हें किसी महिलाकर्मी की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा, उनका प्रमोशन नहीं हुआ, उनके पैसे नहीं बढ़े. ऐसा लिखने वालों में महिलाएं भी हैं और पुरुष भी. ऐसा नहीं है कि यह होता नहीं है - मैं खुद यह मानती हूं कि ऐसा होता है और कई बार मुझे भी ऐसी स्थिति से दो-चार होना पड़ा है, खामियाज़ा भुगतना पड़ा है और दुखी भी होना पड़ा है. लेकिन, मैं यह भी मानती हूं कि इस तरह के व्यवहार के लिए एक अलग शब्द बना है जिसे ‘फेवरिटज्म’ कहते हैं. बॉस को कोई भी इंसान ज्यादा पसंद आ सकता है - वो पुरुष भी हो सकता है और महिला भी. इंसान को कमजोर इंसान ही करता है - और वो पुरुष भी हो सकता है और औरत भी, यह हालात और संयोग की बात है. इसलिए - जो लोग, ऐसे मौके पर यह लिख रहे हैं वो असल में इस पूरे मुद्दे को भटकाने का काम कर रहे हैं.

यौन उत्पीड़न के जितने भी मामले हो रहे थे, वो मीडिया संस्थानों की चारदीवारी के भीतर हो रहे थे

दूसरी और जो ज्यादा जरूरी बात है, वो यह कि - यौन उत्पीड़न के यह जितने भी मामले हो रहे थे, वो इन मीडिया संस्थानों की चारदीवारी के भीतर हो रहे थे. यह काम के दौरान, मीटिंग्स के दौरान, शूट के दौरान, खाना-खाने के दौरान, पार्टी करने के दौरान हो रहे थे. जब यह हुए तब इनमें से अधिकांश महिलाओं ने अपने एचआर या वरिष्ठों से शिकायत भी की थी - लेकिन उनकी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया गया. ऐसे में यह ज्यादा खतरनाक ट्रेंड हैं. हम यह क्यों नहीं माने विशाखा कमिटी के लागू होने के वर्षों बाद भी हमारा वर्कप्लेस - औरतों के लिए सुरक्षित नहीं है. हम यह क्यों नहीं माने कि संस्थानों के पास इतनी कुव्वत ही नहीं है कि वो अपनी महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकें, यह क्यों नहीं माने कि औरतों की इज्जत उनकी प्राथमिकता नहीं है, हम यह क्यों नहीं माने कि पूरी देश-समाज के वंचित लोगों की आवाज बनने का दावा करने वाले यह संस्थान असल में एक बहुत बड़ी नाकामी की गाथा है.

अपने डेढ़ दशक से ज्यादा के संस्थागत जीवन में मुझे भी ऐसी परिस्थितियों से कई बार दो-चार होना पड़ा है और मैं ऐसा मानती हूं कि, महिलाओं के साथ होने वाले सेक्सुअल मिडकंडक्ट का मूल सेक्सीजिम ये लैंगिक भेदभाव है. उनको हल्का करने की एक आदत सी बन गई है, कई बार ऐसा हुआ कि एचआर हेड के पद पर बैठी महिला अधिकारी ने मामले को दबा दिया, अपने शिफ्ट इंचार्ज से कुछ हुआ तो वो झूठे आश्वासन देता रहा, लेकिन... कई बार ऐसा भी हुआ (अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में) कि जब मैंने शिकायत की तो उसपर गहराई से जांच-पड़ताल भी हुई और एक्शन भी लिया गया. मैंने ऐसे मामले भी देखे हैं जहां शिकायत के बाद, आरोपी की नौकरी भी चली गई है. अनुभव हर तरीके के हैं. यह भी कि - किसी ने कोई सेक्सुअल ऑफर दिया तो मना करने पर उसने मुझे दोबारा कभी परेशान नहीं किया. मेरे ‘ना’ को ‘ना’ समझा गया,  इतना ही नहीं बल्कि अगले दो महीने तक गाहे-बगाहे मुझसे मेरी मेंटल स्टेट्स के बारे में पूछा गया, ताकि मैं किसी तरह के अवसाद में न जाऊं. उस शख्स ने मुझसे यह कहा कि, मैं इस घटना को भूल जाऊं और खुद को दोष न दूं. क्योंकि, उनको समझने में गलती हुई थी. नतीजा यह है कि वो व्यक्ति आज भी मेरी फ्रेंडलिस्ट में है और गाहे-बगाहे हम एक-दूसरे का हाल-चाल भी ले लेते हैं. लेकिन, एक बार ऐसा भी हुआ कि बहुत सारी मानसिक प्रताड़ना झेलने के बाद, जब मैंने अपने एचआर और एक जानी-मानी फेमिनिस्ट एक्टिविस्ट से मदद मांगी तो उन्होंने मुझसे कहा कि - तो यह साफ है कि आपके साथ सेक्सुअल मिसकंडक्ट नहीं हुआ है?

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प्रतीकात्मक तस्वीर

पहले खुद को सही करना चाहिए... फिर, पत्रकारिता के परचम लहराने चाहिए

यह समय आत्ममंथन का है - हम सबके लिए, जो लोग इस इंडस्ट्री का हिस्सा हैं उनके लिए भी और जो लोग मीडिया हाउसेज चला रहे हैं उनके लिए भी, उनकी एचआर के लिए भी - क्या वो इतने तैयार हैं, इतने प्रोग्रेसिव हैं, इतने ह्यूमन हैं कि अपनी महिला कर्मचारियों को इज्जत से नौकरी करने के लिए अपने संस्थान के प्रीमाइसेस (परिसर) में बुला सकें?

अगर नहीं... तो उन्हें पहले अपने आप को सही करना चाहिए... फिर, पत्रकारिता के परचम लहराने चाहिए.

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