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छात्रसंघ चुनाव: राजनीति की नर्सरी को लील रहा है धनबल और बाहुबल

वंशवाद हमारी सामूहिक चेतना पर एक धब्बा है, क्योंकि यह बराबरी के खेल के लोकतांत्रिक सिद्धांत को कमजोर करता है.

Updated On: Sep 07, 2018 08:29 AM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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छात्रसंघ चुनाव: राजनीति की नर्सरी को लील रहा है धनबल और बाहुबल

वंशवाद हमारी सामूहिक चेतना पर एक धब्बा है, क्योंकि यह बराबरी के खेल के लोकतांत्रिक सिद्धांत को कमजोर करता है. चुनावी राजनीति में मेधावी और मकसद के लिए काम करने वाले लोग वंश और वंशवाद का सही विकल्प हो सकते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में 12 सितंबर को छात्र संघ का चुनाव होने वाला है और यहां की राजनीति पर जातिवाद और धनबल का भारी असर है.

पिछले पांच सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) गुर्जर उम्मीदवार उतारती रही है. इसका मुकाबला करने के लिए, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) जाट उम्मीदवार उतारता रहा है. छात्र संघ चुनाव में उम्मीदवार ज्यादातर जाट और गुर्जर समुदाय से आते हैं. 2016-17 में चारों पद (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव) इन्हीं समुदायों के उम्मीदवारों ने जीते.

पिछले साल, एबीवीपी के प्रेसिडेंट पद के उम्मीदवार अंकित बसोया अपनी बेहद महंगी कार की सन रूफ से हाथ हिलाते दिखाई दिए थे. किरोड़ीमल कॉलेज के एक साइंस स्टूडेंट ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'एक शख्स ने हमारे कॉलेज से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और उसे पीटा गया. अगर हम चुनाव लड़ना चाहें, तो भी हम लड़ नहीं सकते. राजनीति गंदी और डरावनी है. वे बड़ी कारों में आते हैं और हमारे क्लासरूम पर धावा बोल देते हैं और क्लासेज बाधित करते हैं. शोर-शराबा जारी है, लेकिन हम अभी भी नहीं जानते कि मेनिफेस्टो क्या है.'

हाल ही में, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) की कवलप्रीत कौर ने एबीवीपी के दो सदस्यों के खिलाफ दिल्ली महिला आयोग में उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई. इस साल आईसा और आम आदमी पार्टी की स्टूडेंट विंग छात्र युवा संघर्ष समिति (सीवाईएसएस) गठबंधन में डूसू चुनाव लड़ रहे हैं.

लिंगदोह गाइडलाइंस के मुताबिक, एक उम्मीदवार प्रचार और अन्य चुनाव-संबंधी कामों के लिए अधिकतम 5,000 रुपए खर्च कर सकता है. पिछले साल, एनएसयूआई का चुनाव अभियान एक आरटीआई के इर्द-गिर्द केंद्रित था, जिसमें एबीवीपी की अगुवाई वाले डूसू पैनल ने चाय, फोटोस्टेट और विविध गतिविधियों पर 22 लाख रुपए खर्च किए थे. रेन डांस, सोनीपत में एम्यूजमेंट पार्क की सैर, मेक-अप किट और टनों मुफ्त पिज्जा, यह वह प्रतिफल है जो नार्थ कैंपस के छात्र चुनाव के दिन के समर्थन के बदले मुफ्त पा रहे हैं.

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अभी पिछले साल तक, दिल्ली विश्वविद्यालय के 22 महिला कॉलेजों में से केवल पांच कॉलेजों ने डूसू चुनावों में हिस्सा लिया था. इनमें अदिति कॉलेज, लक्ष्मीबाई कॉलेज, भगिनी निवेदिता कॉलेज, मिरांडा हाउस और एसपी मुखर्जी कॉलेज फॉर विमेन शामिल हैं. इसका मतलब है कि डीयू की करीब 80 प्रतिशत छात्राओं ने अपना वोट नहीं डालतीं. उत्तर भारत में छात्र संघ चुनाव में राजनीति में गिरावट बहुत गहरी है और यह दिल्ली विश्वविद्यालय तक ही सीमित नहीं है.

जिस जगह गंगा-यमुना-सरस्वती नदी का संगम होता है, उसके पास ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय स्थित है. 1887 में बने भारत के चौथे सबसे पुराने आधुनिक विश्वविद्यालय में, छात्र सरकारों से देश को मिले अच्छे राजनेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है. पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और चंद्रशेखर से लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदातुल्लाह और कमल नारायण सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रहे मदन मोहन मालवीय और भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा; राष्ट्र निर्माण के प्रमुख स्तंभ सबसे पहले शासन के तरीकों से संस्थान के विक्टोरियन हॉल में रूबरू हुए थे.

दशकों कैंपस में एसयूवी की परेड, हॉस्टल में चोरी से अल्कोहल पहुंचाए जाने और बाहुबल के इस्तेमाल के बाद, रिचा सिंह 128 वर्षों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. उन्होंने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'हमने करीब 25 लाख रुपये खर्च चुनाव लड़ने वाली पार्टियों के खिलाफ 1 लाख रुपए के बजट के अंदर एक साधारण अभियान चलाया. हमने स्कॉलरशिप की कमी और शोधकर्ताओं के लिए खत्म होते मौकों जैसे मुद्दों को लेकर ‘संवाद’ या बातचीत पर आधारित वैकल्पिक राजनीति का एक मॉडल पेश किया.'

पूजा शुक्ला वह शख्स हैं, जिन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय के बाहर से उस समय गिरफ्तार किया गया था, जब वह 25 अन्य लोगों के साथ कथित तौर पर वाइस चांसलर द्वारा इंट्रेंस परीक्षा के नतीजे रोके जाने पर इन्हें जारी किए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल कर रही थीं. पूजा कहती हैं कि उन्हें रिचा सिंह की जीत से ताकत मिली है, लेकिन उन्हें लगता है कि धनबल और बाहुबल अब भी राजनीति पर हावी है.

हाल ही में समाजवादी पार्टी में शामिल हुई आइसा की पूर्व सदस्य पूजा शुक्ला कहती हैं कि, 'लखनऊ विश्वविद्यालय ने 2016 में चुनावों पर प्रतिबंध लगा दिया और अधिकारियों ने हाल ही में परिसर में विरोध प्रदर्शन पर भी, भले ही छात्रों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर हों, प्रतिबंध लगा दिया. अन्य परिसरों में युवा नेता वाम राजनीति से सीख रहे हैं और अपनी राजनीतिक प्रतिभा में सुधार कर रहे हैं, लेकिन खासकर उत्तर भारत में हिंसा बहुत ज्यादा है, जिसे खत्म करने की जरूरत है.'

वापस 1970 में चलते हैं, जब आलोक पंत और अमेरिकी राजनीतिशास्त्री प्रोफेसर वाल्टर एंडरसन ने इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में ‘इलाहाबाद में छात्र राजनीति’ शीर्षक से लेखों की एक श्रृंखला लिखी. इसमें इलाहाबाद में छात्र राजनीति में हिंसा बढ़ने के बारे में एक विशेष पड़ताल की गई. लेख में बताया गया कि हिंसा को अलग-अलग नजरिये से देखे जाने और नई पहचान के निर्माण में विफलता के परिणामस्वरूप अलगाव और हताशा की भावना पैदा हुई.

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इसमें हिंसक होते नए माहौल से निपटने में छात्रों की अक्षमता के बारे में बात की. इलाहाबाद के अधिकांश छात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों से आए थे. यहां जीवनशैली बदलना शुरू हो सकती है, लेकिन गरीबी उस बदलाव की रफ्तार में रुकावट डाल रही थी.

वरिष्ठ सीपीआई नेता और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान कहते हैं, '80 और 90 के दशक में, हम सरकार की नीतियों के बारे में बात करते थे और हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण था. तब जातिवाद और धनबल या बाहुबल की कोई भूमिका नहीं थी.' अतुल लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के छह बार अध्यक्ष चुने गए थे और उत्तर प्रदेश के दो मुख्यमंत्रियों- कमलापति त्रिपाठी और राम नरेश यादव को सत्ता से हटाने के आंदोलन की अगुवाई की थी.

वह 1936 के नेशनल स्टूडेंट्स कनवेंशन की कहानी सुनाते हैं जो भगत सिंह की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की शहादत की पृष्ठभूमि में गंगा मेमोरियल हॉल में हुआ था और जिसमें आखिरी बार नेहरू और जिन्ना एक ही मंच पर थे. पूर्व प्रधानमंत्री आई.के गुजराल ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सचिव थे. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भारतीय हस्तक्षेप के मुख्य वास्तुकार डीपी धर लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे. पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पदाधिकारी थे और भारतीय परमाणु वैज्ञानिक होमी भाभा भी नेशनल स्टूडेंट फेडरेशन का हिस्सा थे. अंजान का मानना है कि आज छात्र राजनीति बड़े राजनीतिक खेल का प्रतिबिंब बन कर रह गई है.

1984 से 1990 तक लोकसभा सचिवालय में 7वीं, 8वीं और 9वीं लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप 50 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीतिक रूप से सक्रिय थे. फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में वह बताते हैं कि राजनीति में सुधार करने में हर छात्र की भूमिका होती है. 'वीसी को छात्रों और शिक्षकों का सम्मान हासिल होना चाहिए और अपनी ईमानदारी व क्षमता से, एक आदर्श मॉडल बनना चाहिए.'

वह इलाहाबाद के सादगी के दौर की बात करते हैं, जब कोई बंधन नहीं था. 'हमारे समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की पूरे देश में शान थी और शिक्षाविदों के प्रति समर्पण से छात्रों का चरित्र-निर्माण होता था. अगर छात्र बार-बार चुनाव लड़ने के लिए विश्वविद्यालय में रह रहे हैं, तो यह व्यवस्था का दुरुपयोग है.'

वास्तविक राजनीति के उलट, छात्र राजनीति का मकसद उतना गहरा नहीं है, लेकिन यह युवा नेताओं को जो चुनावी सबक देती है, वह कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की नर्सरी बनने के लिए लोकतंत्र में छात्र संघों का उपयोग अच्छी बात है, लेकिन सिर्फ तभी तक जब तक राजनीतिक दल अपने प्रचार के लिए छात्र कैडर का उपयोग शुरू नहीं कर देते हैं. फिर भी कॉलेज की राजनीति को आकार देने में लगे नेताओं के साथ यही हो रहा है. एनएसयूआई में टिकटों का वितरण एक तरह से जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और एच.के.एल. भगत जैसे कांग्रेस नेताओं और बाद में अजय माकन और अरविंदर सिंह लवली द्वारा नियंत्रित किया जाता रहा है.

इसी तरह पार्टी की विचारधारा की अपनी व्याख्याओं का प्रदर्शन करने वाले छात्रों की प्रवृत्ति भी उतनी ही घातक है. पिछले साल एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार रजत चौधरी ने अप्रैल 2016 में देशबंधु कॉलेज में ‘जाति और सामाजिक न्याय पर अंबेडकर के विचार’ शीर्षक से हुआ एक सेमिनार शुरू होने से पहले लोगों को ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने को मजबूर करने के लिए कार्यक्रम को बाधित कर दिया था.

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बीएचयू (प्रतीकात्मक तस्वीर)

1992-1993 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे और अब भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रोफेसर आनंद प्रधान ने बताया, 'शिक्षण संस्थानों के परिसर में राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप का संस्थागतकरण संजय गांधी के उत्थान के साथ शुरू हुआ, और बाद में अन्य पार्टियों ने भी छात्रों को अपने पक्ष में करने के लिए जाति और बाहुबल का सहारा दिया.' वह बताते हैं कि 80 और 90 के दशक में जब मंडल आयोग और राम मंदिर सार्वजनिक विमर्श में शामिल हुए तो छात्र राजनीति जाति और दलों में विभाजित हो गई.

90 के दशक के उदारीकरण के साथ-साथ छात्रों के करियर उन्मुखी बनने और साथ-साथ राजनीति से विमुख होने से छात्र भागीदारी में शून्य पैदा कर दिया. आनंद प्रधान कहते हैं कि जेएनयू उन मॉडलों में से एक है, जिसके माध्यम से छात्र राजनीति को पुनर्जीवित किया जा सकता है, लेकिन वास्तविक दुनिया में इसका असर पड़ने के नजरिये से यह बहुत ही स्थानीय प्रकृति का है. वह कहते हैं, 'लोकतंत्र राजनीति से चलता है और छात्रों को प्रभावी रूप से राजनीति की प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए.'

बड़ा सवाल यह है कि क्या वामपंथी राजनीति बड़ी पार्टियों को खुद को सुधारने के लिए उन पर दबाव डाल रही है क्योंकि जो इनकी राजनीति अधिक मुद्दा-केंद्रित है और विमर्श को प्रमुखता से शामिल करती है. दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर अपूर्वानंद, कहते हैं कि यह देखना ताजगी भरा है कि हॉस्टल बनाने और पीजी (पेइंग गेस्ट) नियमों को छात्राओं के लिए कम सख्त और कम प्रतिबंधकारी बनाने की मांग करने वाला पिंजरा तोड़ अभियान चलाया जा रहा है.

पटना विश्वविद्यालय में 80 के दशक में छात्र राजनीति में सक्रिय रहे अपूर्वानंद का कहना है, 'वामपंथी रुझान वाले छात्र अध्ययन में अच्छे हैं और अनुबंधात्मक श्रमिकों के अधिकारों के बारे में बात करते हैं. पिछले एक साल में, हम एनएसयूआई के खुद के संचालन के तरीके में बदलाव देख सकते हैं, यह अखिल भारतीय छात्र संघ (आइसा) जैसे वाम दलों का प्रभाव हो सकता है.' वह बताते हैं, एनएसयूआई ने पहली बार डूसू की पत्रिका प्रकाशित की है.

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भारतीय राजनीति में वंशवाद नया नहीं है. बीजेपी की वसुंधरा राजे, वरुण गांधी, देवेंद्र फडणवीस, पेमा खांडू, प्रीतम मुंडे, पूनम महाजन, हीना गावित, रक्षा खड़से और एकनाथ खड़से से लेकर कांग्रेस के सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव तक के लिए वंश के सहारे पार्टी में तरक्की की सीढ़ियां चढ़ना आसान बना. वाम दलों ने दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति की हवा बदल दी है और सबकुछ झकझोर कर रख दिया है लेकिन जाति और पैसा अभी भी उत्तर भारत के शिक्षा परिसरों पर हावी है जहां औसत मेधावी छात्र छात्र संघ चुनाव के नाटक में सिर्फ दर्शक बने रहना ही पसंद करते हैं.

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