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बोगीबील पुल के उद्घाटन के बाद नाव यात्रा की दिलचस्प यादें बची रह जाएंगी?

सर्दियों के दौरान नदी में पानी का स्तर आम तौर पर कम हो जाता था, लिहाजा जमीन नाव के स्तर से ज्यादा ऊंची हो जाती थी, जबकि बरसात के मौसम के दौरान स्थित पूरी तरह से इसके उलट रहती थी

Updated On: Dec 26, 2018 09:23 PM IST

Simantik Dowerah

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बोगीबील पुल के उद्घाटन के बाद नाव यात्रा की दिलचस्प यादें बची रह जाएंगी?

अप्रैल 2002 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी ने जब असम में बोगीबील पुल की आधारशिला रखी थी तो मेरे पिताजी की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह थी- 'मुझे नहीं लगता कि मेरे जीते जी इसका काम पूरा हो जाएगा.' इस पुल की आधारशिला रखने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने इस अवसर पर असम के डिब्रूगढ़ शहर के चौकिंदिन्गी मैदान में एक विशाल जनसभा को भी संबोधित किया था.

मुझे वह अवसर भी पूरी तरह से याद है, जब वाजयेपी की तरफ से यह बताया गया कि पुल में सिंगल की बजाय डबल रेलवे लाइन होगी, तो तालियों की गड़गड़हाट से उनका स्वागत किया गया था. मेरे पिताजी की बात सच हुई. दरअसल वाजपेयी की 94वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री ने जब मंगलवार को जब भारत के सबसे लंबे रेल-रोड पुल को राष्ट्र को समर्पित किया तो मेरे पिताजी और वाजपेयी दोनों इसे देखने के लिए मौजूद नहीं थे यानी इस दुनिया से विदा हो चुके थे.

देश के सबसे लंबे यानी 4.94 किलोमीटर लंबे इस पुल को अगर इंजीनियरिंग का शानदार नमूना बताया जाए तो इसे किसी तरह की अतिशयोक्ति नहीं माना जा सकता. इस पुल के जरिए ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी और दक्षिणी किनारों के बीच आवागमन बेहद आसान हो जाएगा, खास तौर पर धेमजी और डिब्रूगढ़ जिले के बीच आवागमन की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी. इसके अलावा, अरुणाचल प्रदेश में पासीघाट और अलोंग के बीच तमाम जगहों से संपर्क स्थापित करने में काफी सहूलियत होगी.

मेडिकल सुविधाओं का भी होगा जबरदस्त विस्तार

बोगीबील पुल को जल्द जनता के लिए खोल दिया गया है. इसके साथ ही, ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर मौजूद लोगों के लिए डिब्रूगढ़ में मौजूद बेहतर मेडिकल सुविधाएं काफी आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी. डिब्रूगढ़ में असम मेडिकल कॉलेज के अलावा प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं. दरअसल, पुल के चालू हो जाने के बाद डिब्रूगढ़ में मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए बूम का दौर शुरू होने वाला है और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के लिए भी इसी तरह की बात कही जा सकती है.

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इस बात में कोई दो राय नहीं है कि बोगीबील पुल उन लोगों के लिए वरदान की तरह है जो लंबे समय से देश के दूर-दराज में मौजूद इस इलाके में लंबे समय से परेशानी का सामना कर रहे थे. बहरहाल, पुल हमेशा पुल ही रहेगा और इसमें नाव के आकर्षण जैसी बात नहीं हो सकती है!

मुझे साल का तो ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन तीन दशक से भी ज्यादा पहले पहली बार नदी पार करने से संबंधित मेरे पास धुंधली यादें हैं. मेरे पिताजी सरकारी डॉक्टर और जब उनका ट्रांसफर तिनसुकिया से नॉर्थ लखीमपुर हुआ तो उस वक्त की नाव की सवारी की पहली याद मेरी जेहन में है.

यह डीजल से चलने वाली नाव थी और इसमें 200 लोगों को ढोने में क्षमता थी. अपनी मां के साथ मैंने नाव में प्रवेश किया था. नदी के तट और नाव के बीच संपर्क का एकमात्र माध्यम 8 से 10 फुट लंबा लकड़ी का तख्ता था. यह तख्ता ब्रह्मपुत्र नदी के पानी में लोगों को अपनी सेवाएं मुहैया करा रहा था. नाव में सवार होने के दौरान मेरी मां डर के मारे जोर से चिल्ला पड़ी थीं.

यह डिब्रूगढ़ की घटना है (हालांकि, मुझे घाट के बारे में याद नहीं है, क्योंकि जल स्तर के मुताबिक आवागमन के सिलसिले में घाट में अक्सर बदलाव होता रहता है), जहां मेरे घर के सभी सामान फर्नीचर, बर्तन से लेकर तमाम घरेलू सामानों को नाव पर लाद दिया गया था. कमजोर दिल वालों के लिए नाव में सवार होना काफी डरावना था, लेकिन जाहिर तौर पर यही जीवन था.

चूंकि घाट के पास हमेशा मिट्टी काफी गीली रहती है, लिहाजा डर भी वाजिब था. मुझे यह याद है कि अपनी इस यात्रा के दौरान उत्तरी किनारे पर स्थित सोनारी घाट पर मेरी मां की उषा सिलाई मशीन को अपने माथे पर ढो रहा शख्स बुरी तरह से लड़खड़ा गया, लेकिन मशीन नदी में गिरने से बच गई.

Bogibeel Bridge ahead of its inauguration Dibrugarh: A view of India's longest rail-road bridge 'Bogibeel Bridge' in Dibrugarh, Monday, Dec 24, 2018, a day before its inauguration by Prime Minister Narendra Modi. (PTI Photo) (PTI12_24_2018_000124B)

पुल के अभाव में यात्रा संबंधी होने वाली मुश्किलों की कल्पना भी नहीं की जा सकती

बहरहाल, अगर आपको लगता है कि इस साहसिक यात्रा में नाव से उतरना आखिरी बाधा है तो आप गलत हैं. नाव से उतरने के बाद आपको अपने तमाम सामान के साथ बस पकड़ने के लिए भागना पड़ता है. दरअसल, धेमाजी और नॉर्थ लखीमपुर जाने के लिए आपके पास सिर्फ तीन बसें होती हैं. ब्लू रंग की एक बस अरुणाचल प्रदेश राज्य परिवहन निगम की है, जबकि बाकी दो बसें- कृष्णा और गोदावरी प्राइवेट हैं. ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी किनारे से उत्तरी किनारे तक नावों के जरिए कितने भी यात्री पहुंचे, लेकिन उनके लिए सिर्फ तीन बसें ही उपलब्ध थीं और ये दिन में एक ही चक्कर लगाती थीं. मुझे यह भी याद है कि इन तीन बसों में से किसी एक को पकड़ने के लिए मेरे माता-पिता किस तरह की हड़बड़ी दिखाते थे. साथ ही, इसके बाद वे 'कष्टप्रद' नेशनल हाइवे-52 पर अगले 3 घंटे के लिए ठूंसी और सिकुड़ी हुई अवस्था में पड़े रहते थे.

हालांकि, मेरे पिताजी द्वारा एंबेसडर कार खरीदे के बाद इस तरह की अफरा-तफरी खत्म हो गई है, लेकिन दिक्कतों से पूरी तरह से मुक्ति नहीं मिली. गर्मी की छुट्टियों के दौरान (इस समय असम में अक्सर बरसात होती थी) घाट पहुंचने के लिए सड़क की हालत बेहद खराब रहती थी. खास तौर पर कुलजाना से नदी के उत्तरी किनारे तक हालात काफी बुरी होती थी. इसी जगह पर बोगीबील का उत्तरी किनारा है. उस वक्त इस जगह पर तो एक तरह से किसी तरह की सड़क नहीं थी. दरअसल, कीचड़ भरे इन रास्तों पर बसों के टायरे के चिन्हों पर कार चलानी पड़ती थी. ऐसे में कार कीचड़ में फंस जाती थी और गाड़ी का चैंबर नीचे मिट्टी से भर जाता था.

यह तकरीबन दो नालों पर एक साथ ड्राइव करने जैसा मामला था, जिसमें एक तरफ से पिछले और अगले वाले एक-एक पहिए के जरिए संतुलन साधना पड़ता था. जब कार आगे बढ़ने से मना कर देती तो मैं और मेरे भाई को अक्सर इसे धक्का देना पड़ता या टायरों को कीचड़ से बाहर निकालने के लिए पिछले पहिए के पास एक खास किस्म की घास रखनी पड़ती थी.

जाहिर तौर पर यह सब कुछ ऐसी परिस्थिति में होता था, जब हमें जल्दी से जल्दी सोनारी घाट पहुंचना होता था, क्योंकि गाड़ियों को ढोने वाली नाव दिन में सिर्फ एक बार (10 बजे) चक्कर लगाती थी. इसके लिए बुकिंग एक शख्स के जरिए 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर होती थी. जो शख्स इस बुकिंग का काम करता था, वह बर्ताव शहंशाह की तरह होता था. साथ ही, इसके लिए सरकार द्वारा तय दर से कई सौ रुपए ज्यादा का भुगतान भी करना पड़ता था. इसके अलावा, गाड़ी को नाव पर लादना भी बेहद मुश्किल काम था.

बेहद खतरनाक होता था नाव पर कार को लादना

सर्दियों के दौरान नदी में पानी का स्तर आम तौर पर कम हो जाता था, लिहाजा जमीन नाव के स्तर से ज्यादा ऊंची हो जाती थी, जबकि बरसात के मौसम के दौरान स्थित पूरी तरह से इसके उलट रहती थी. जब हमारे पिताजी लकड़ी के दो तख्तों पर कार चलाते थे, तो वास्तव में हमारे होठों पर प्रार्थना के शब्द होते थे. गाड़ी को नाव में रखने के लिए यह प्रक्रिया अपनानी होती थी और यह थोड़ी सी जगह में खड़ी चढ़ाई जैसा मामला होता था. ऐसे में अक्सर गाड़ी फिसल जाती थी और अगर इंजन पूरी तरह से गर्म नहीं है तो काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता था. इतनी ही नहीं, गाड़ी का पहिया नाव पर पहुंचने के बाद बिल्कुल सही वक्त पर ब्रेक नहीं लगाने की स्थिति में इसके नदी में गिरने का भी खतरा होता था. बरसात में जब नदी अपने पूरे उफान पर होती थी, तो स्थिति और डरावनी हो जाती थी. जाहिर तौर पर नदी की गहराई भी काफी ज्यादा थी.

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सोनीरी घाट से डिब्रूगढ़ की यात्रा में और ज्यादा वक्त लगता था, क्योंकि नाव को धारा के विरुद्ध पश्चिम से पूरब की तरफ आगे बढ़ना होता था. मॉनसून के दौरान हालात और खराब हो जाते थे और इस यात्रा में अक्सर तीन घंटे से भी ज्यादा का समय लगता था. हालांकि, वापस लौटना उसी अनुपात में थोड़ा सुगम हो जाता था. वापसी में लगने वाला समय काफी कम जाता था.

यात्रा के दौरान के मनोहारी दृश्यों का भुलाना मुश्किल

प्रकृति आपको आकर्षित करती हो या नहीं, लेकिन मॉनसून के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी का दृश्य आपको निश्चित तौर पर सम्मोहित कर लेगा. नदी के दोनों किनारों की तरफ दूर-दूर तक कुछ नजर नहीं आता है और शानदार हवा बहती रहती है. ब्रह्मपुत्र भारत की सबसे चौड़ी नदी है.

मॉनसून के दौरान लहरों को पार करते हुए गाड़ियों से लदी नाव अक्सर कांपने लगती थी. उस वक्त नावों पर ज्यादातर गाड़ियां एंबेसडर, फिएट और जीप होती थीं और एक साथ 10 या इससे ज्यादा गाड़ियां भी लदी होती थीं. नदी में गुलाबी तुरसावा (एक विशेष किस्म का फूल) की भी भरमार देखने को मिलती थी. कभी-कभी तो कई पड़े भी बहते हुए नजर आते थे. नदी की लहरें मुझे और मेरे भाई को इस कदर आकर्षित करती थीं कि बरसात के मौसम के दौरान हम दोनों नाव के पिछले किनारे पर बैठकर कोका-कोला की बातलों को लंबी रस्सी में बांध देते थे और इसे नदी में डालकर इधर-उधर घुमाते रहते थे. इन बोतलों को लहरों पर उछलते हुए देखना काफी मनोहारी थी.

PM Modi in Dibrugarh Dibrugarh: Prime Minister Narendra Modi views a model of the newly inaugurated Bogibeel Bridge at an exhibition in Dibrugarh, Tuesday, Dec 25, 2018. (PTI Photo) (PTI12_25_2018_000144B)

इसके अलावा, नाव पर चाय पीने का भी अपना अलग मजा था और मैं जमकर इसका लुत्फ उठाता था. यह चाय केरोसिन स्टोव पर बनी होती थी और नाव के स्टाफ बेकरी आइटम के साथ इसे बेचते थे. इस आइटम को 'पॉप' नाम से जाना जाता था. हालांकि, मुझे आज तक समझ में नहीं आया है कि इसे 'पॉप' क्यों कहा जाता था. यात्रा से पहले मेरी मां रोटी के साथ चिकन फ्राई पैक कर देती थीं ताकि हम नाव पर सवार गाड़ी में खाना खा सकें. इसका स्वाद और खाने के दौरान मुंह से निकलने वाली आवाज की याद अब भी जेहन में ताजा है.

इसके अलावा, हमलोग भूनी हुई मछली का भी स्वाद लेते थे. उससे ताजा मछली शायद नहीं मिल सकती. इसे सीधा नदी से पकड़ा जाता था और पकड़े जाने के कुछ ही मिनटों के भीतर इसे लकड़ी के चूल्हे में फ्राइिंग पैन पर भूना जाता था. मछली को आधा भून लेने के बाद इसे कुछ मिनटों के लिए जलते हुए चारकोल पर चढ़ाया जाता था और इस कुछ ही समय बाद इसे अखबार में लपेटकर आपने सामने पेश किया जाता था, ताकि आप इसके स्वाद का आनंद उठा सकें. इसकी कीमत 6 रुपए होती है. जी हां...मात्र 6 रुपए और बड़ी मछली के लिए आपको 10 रुपए देने पड़ते थे, जिसके स्वाद का जवाब नहीं था. कोई भी शेफ इस देसी स्वाद को चुनौती नहीं दे सकता है.

कभी-कभी नदी के धारा बदलने पर काफी मुश्किल हो जाती थी और उसके बाद लोगों को मुख्य घाट पहुंचने के लिए छोटे नावों की मदद लेने के लिए मजबूर होना पड़ता था. ऐसी स्थिति में नाविक ज्यादा मेहनताना मांगते थे, लेकिन ज्यादा मोलभाव होने पर कम रकम के वादे पर भी सहमत हो जाते थे. हालांकि, नाविकों के पास इस समस्या से भी निपटने का नुस्खा मौजूद था. नाव के बीच नदी में होने पर वे इसे कदर हिला-डुला देते कि लोगों को अपनी जान का खतरा महसूस होने लगता था और आखिरकार वे कुछ और पैसा देने के लिए सहमत हो जाते थे. निश्चित तौर पर इसे ब्लैकमेलिंग कहा जा सकता है, लेकिन यह एक तरह का मजा भी था. जाहिर तौर पर यह एक तरह का क्रूर मजाक था.

कभी-कभी चार पहिया गाड़ियों को नदी पार कराने के लिए दो देसी नावों को 3 से 4 फुट की दूरी पर एक साथ बांध दिया जाता था और उस पर एंबेसडर और जीप जैसी गाड़ियों को चढ़ा दिया जाता था. इन गाड़ियों के वजन के कारण नाव का ऊपरी हिस्सा खतरनाक रूप से पानी के स्तर के पास पहुंच जाता था. हालांकि, मैंने कभी भी इस तरह के नाव को डूबते हुए नहीं देखा, लेकिन इस तरह की ढेरों कहानियां सुनने को मिलती थीं. बहरहाल, किस्मत और हिम्मत के साथ ये नावें चलती रहती थीं.

ब्रह्मपुत्र नदी पर 1980 के दशक में कोलिमा भोमोरा सेतु बनने के बाद इस रूट पर मुसाफिरों की संख्या काफी कम हो गई. यह पुल नदी के उत्तरी तट पर मौजूद सोनितपुर जिले को दक्षिणी तट पर स्थित नगांव जिले से जोड़ता है. नगांव जिला असम के बीच के हिस्से में मौजूद हैं.

कोलिया भोमोरो सेतु के जरिए डिब्रूगढ़ से नॉर्थ लखीमुपर आना-जाना काफी लंबा पड़ता था और इसके लिए 400 किलोमीटर से भी ज्यादा की यात्रा करने के लिए मजबूर होना पड़ता था.

प्रधानमंत्री के बोगीबुल पुल का उद्घाटन करने के साथ ही कई तरह की यादें मेरी जेहन में तैर रही हैं- नदी की लहरों के साथ सवारी करने, नाव पर अपना नंबर आने की चिंता, नाव पर सवार होने के बाद का रोमांच आदि. ये तमाम बातें मेरे दिमाग में ताजा हो गई हैं.

बोगीबील पुल वाकई में इतिहास बनाएगा, लेकिन यह मेरे जैसे तमाम लोगों की उन यादों को खत्म नहीं कर पाएगा, जिन्होंने लंबे समय तक नावों पर उत्तरी और दक्षिणी किनारों के बीच आवाजाही की है. यह लुप्त प्रजाति के कई गुमनाम नाविकों के कारण मुमकिन हो पाता था, जो अपनी आजीविका कमाने के लिए प्रकृति की मुश्किलों और सीमित संसाधनों का बहादुरी से सामना करना करते थे और जिन्होंने मेरे जैसे कई लोगों को अपनी यादों की कहानी बुनने में भी मदद की.

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