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मक्का मस्जिद धमाके पर फैसला : क्या भगवा आतंक की थ्योरी एक झूठ है ?

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने हैदराबाद के मक्का मस्जिद धमाके में साजिश रचने के आरोप में स्वामी असीमानंद सहित पांच लोगों को बरी कर दिया है.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Apr 16, 2018 10:09 PM IST

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मक्का मस्जिद धमाके पर फैसला : क्या भगवा आतंक की थ्योरी एक झूठ है ?

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने हैदराबाद के मक्का मस्जिद धमाके में साजिश रचने के आरोप में स्वामी असीमानंद सहित पांच लोगों को बरी कर दिया है. एनआईए कोर्ट में असीमानंद सहित पांच लोगों के खिलाफ कोई भी सुबूत पेश करने में नाकाम साबित हुई.

हैदराबाद के मक्का मस्जिद धमाके में सीबीआई ने असीमानंद को मुख्य साजिशकर्ता और मुख्य अभियुक्त बनाया था. इस फैसले के आने के बाद एनआईए सूत्रों का कहना है कि इस केस की जजमेंट की कॉपी का अध्ययन किया जाएगा. उसके बाद ही एनआईए इस पर विचार करेगी कि हाईकोर्ट में अपील किया जाए या नहीं. फिलहाल ऐसा नहीं लग रहा है कि एनआईए इस केस में हाईकोर्ट में अपील निकट भविष्य में करेगी.

अब ऐसे में सवाल उठने लगा है कि साल 2007 में ऐतिहासिक मक्का मस्जिद में नमाज के दौरान हुए ब्लास्ट में 9 लोगों की जानें किसने लीं? एनआईए ने कोर्ट में ठोस सुबूत क्यों नहीं पेश किए? क्या एनआईए तत्कालीन सरकार के इशारे पर काम कर रही थी या फिर अब इशारे पर काम रही है? गवाहों का लगातार मुकरना कहीं इस केस को कमजोर करने की कोशिश तो नहीं थी?

गौरतलब है कि 18 मई 2007 को जुमे की नमाज के वक्त हुए धमाके में 9 लोगों की मौत हुई थी और 58 लोग घायल हुए थे. इस धमाके के बाद हैदराबाद में विरोध प्रदर्शन में भी 5 लोगों की मौत हुई थी.

पिछले लगभग 11 साल में स्टेट की जांच एजेंसी से लेकर सीबीआई और एनआईए जैसी जांच एजेंसियां तक इस केस की परत दर परत खोलने की लगातार कोशिश करने की बात करती रही. अंत में नतीजा यह हुआ कि इस ब्लास्ट के सभी आरोपी आज बरी कर दिए गए. दरअसल हैदराबाद के मक्का मस्जिद में ब्लास्ट का मामला शुरू से ही विवादों में रहा. इस केस की शुरुआती तफ्तीश हैदराबाद पुलिस ने की थी. हैदराबाद पुलिस ने अपनी शुरुआती जांच में हैदराबाद के ही एक स्थानीय मुस्लिम संगठन का नाम लिया था.

स्वामी असीमानंद

(फोटो: पीटीआई)

बाद में जब इस पर बवाल मचा तो राज्य सरकार ने सीबीआई को जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. सीबीआई ने अपनी शुरुआती जांच में ही अभिनव भारत नाम के एक हिंदूवादी संगठन का नाम सामने ला कर देश में बहस का मुद्दा दे दिया था.

सीबीआई ने 5 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें असीमानंद भी थे. इस ब्लास्ट में सीबीआई ने अभिनव भारत के सभी सदस्यों को आरोपी बनाया था. इस मामले में 225 से भी अधिक चश्मदीदों की गवाही दर्ज कराई. ताज्जुब यह है कि इसमें 54 गवाह अपने पूर्व के बयान से अब मुकर गए हैं.

भारत सरकार ने इस केस में गवाहों के लगातार मुकरने के बाद जांच जिम्मेदारी एनआईए को सौंप दी थी. एनआईए ने लगभग 200 गवाहों को पूछताछ की. सबसे बड़ी बात यह है कि एनआईए ने कोर्ट में जो सुबूत दिए उसमें एनआईए साबित नहीं करवाई की असीमानंद सहित पांच लोग आरोपी हैं.

गौरतलब है कि देश में हुए किसी ब्लास्ट में पहली बार 11 साल पहले देश में पहली बार किसी दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों के नाम सामने आए थे. असीमानंद आरएसएस के स्वयंसेवक रह चुके थे. ऐसे में उस समय देश में भगवा आतंकवाद नाम का एक नया खौफ पैदा करने की कोशिश की गई थी.

सीबीआई ने 2010 में असीमानंद को गिरफ्तार किया था. असीमानंद पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले हैं. असीमानंद को नब कुमार सरकार, जितेन चटर्जी और ओमकारनाथ नाम से भी जाना जाता है. 1977 में असीमानंद पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में आरएसएस के वनवासी आश्रम के लिए काम की शुरुआत की थी. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया सहित कई जिलों में काम करने के बाद लगभग दो दशक मध्यप्रदेश गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी वह जमीनी स्तर पर काम कर चुके हैं.

असीमानंद को नजदीक से जानने वाले कहते हैं, 'असीमानंद अपने शुरुआती दिनों में खासकर आदिवासी बहुल इलाके में मंदिर बनाने, हिंदू धर्म जागरण और शुद्धिकरण जैसे काम के लिए जाने जाते रहे हैं. आदिवासियों के ईसाई बनने से रोकने में असीमानंद के योगदान को संघ कभी नजरअंदाज नहीं कर सकता. संघ को आज गर्व है कि उनको मां भारती ने न्याय दिलाया है.’

फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए आरएसएस के विचारक राकेश सिन्हा कहते हैं, ‘देखिए जिन निर्दोष लोगों को पकड़ कर पूरे विश्व में हिंदू आतंकवाद की अवधारणा स्थापित करने की कोशिश की जा रही थी, वह बेनकाब हो गई है. जब 70 मुस्लिम लोगों को इसी मक्का मस्जिद ब्लास्ट में छोड़ा गया था और 70 लाख का मुआवजा दिया गया था तब कोई हाय तौबा नहीं मची थी. उस समय कहा जा रहा था कि निर्दोष के साथ अन्याय हुआ है. अब जब निर्दोष को छोड़ा जा रहा है तो क्यों हल्ला मचाया जा रहा है?

कोर्ट ने इन लोगों को निर्दोष साबित किया है तो जानबूझ कर विवाद पैदा किया जा रहा है. जो आरोप लग रहे हैं कि इस सरकार के दौरान दबाव में फैसला हुआ है, ऐसा आरोप लगाने वाले बता दें कि इन लोगों को गिरफ्तार किया गया था तो किसकी सरकार थी? 2014 से पहले यह चार्जशीट लगाई जा चुकी थी. उस समय कौन से साक्ष्य दिए गए थे? दिए गए साक्ष्य से क्या इन लोगों का गुनाह साबित होता है?’

rakesh sinha

राकेश सिन्हा आगे कहते हैं, ‘देखिए इस फैसले के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं. पहला पक्ष तो यह है कि हिंदू संगठनों और हिंदू सभ्यता संस्कृति को पूरे दुनिया में बदनाम किया गया. हिंदू इस देश से बाहर कहीं भी जाते उनको शक के निगाह से देखा जाता था. अब कुछ लोग इस फैसले पर सवाल खड़े कर के जांच एजेंसियों पर सवाल खड़ा कर मुस्लिम समुदाय के मन में अविश्वास पैदा कर रहे हैं.’

असीमानंद का नाम अजमेर ब्लास्ट, मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में भी आ चुका है. एआईएमआईएम नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवेसी ने कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि एनआईए ने अपना काम सही तरीके से नहीं किया या उनको करने नहीं दिया गया? देश अगर इसी तरह से चलता रहा तो देश क्या होगा.

मार्च 2017 में भी एनआईए की एक विशेष अदालत ने अजमेर ब्लास्ट में सुबूतों के अभाव में असीमानंद को बरी कर दिया था. साल 2010 में अजमेर ब्लास्ट में असीमानंद ने दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट में जज के समाने धमाका करने की बात को कबूल किया था. असीमानंद ने कोर्ट में कहा था कि वह और उनके साथियों ने अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिदज और मालेगांव धमाके में शामिल था. असीमानंद ने कोर्ट में साफ कहा था कि हिंदुओं पर हो रहे हमले के विरोध में यह धमाका किया गया.

Mecca Masjid Blast

असीमानंद ने साल 2010 में अपने 42 पेज के इकबालिया बयान में आरएसएस के इंद्रेश कुमार, सुनील जोशी और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का नाम लिया था. हालांकि बाद में असीमानंद ने अपने बयान से पलटी मार दी. बाद में असीमानंद ने कोर्ट से कहा कि उस समय उसे प्रताड़ित किया गया था, इसलिए डर कर ऐसा बयान दिया.

दक्षिणपंथी लोगों का मानना है कि यूपीए के समय देश में हिंदू संगठनों को भगवा आतंकवाद की नजर से देखा जा रहा था. उस समय की मीडिया में भी भगवा आतंकवाद को लेकर हर रोज बयान छपते रहते थे. उस समय देश के गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे से लेकर वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री और उस भारत के गृह सचिव रहे आरके सिन्हा ने भी भगवा आतंकवाद को लेकर अपना नजरिया पेश किया था. अब जब कोर्ट का फैसला आ गया है तो एक बार फिर से भगवा आतंकवाद को लेकर मामला गर्म रहने की पूरी संभावना है.

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