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मक्का मस्जिद ब्लास्ट केसः फैसला सुनाने के बाद जज के इस्तीफे का क्या है राज?

मक्का मस्जिद ब्लास्ट मामले में जस्टिस के रवींद्र रेड्डी द्वारा सभी अभियुक्तों को बरी करने का फैसला आश्चर्यजनक था, लेकिन उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक मामला ब्लास्ट केस में फैसला सुनाने के कुछ ही घंटे बाद अतिरिक्त मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज के पद से उनका इस्तीफा रहा.

T S Sudhir Updated On: Apr 17, 2018 09:31 PM IST

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मक्का मस्जिद ब्लास्ट केसः फैसला सुनाने के बाद जज के इस्तीफे का क्या है राज?

मक्का मस्जिद ब्लास्ट मामले में जस्टिस के रवींद्र रेड्डी द्वारा सभी अभियुक्तों को बरी करने का फैसला आश्चर्यजनक था, लेकिन उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक मामला ब्लास्ट केस में फैसला सुनाने के कुछ ही घंटे बाद अतिरिक्त मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज के पद से उनका इस्तीफा रहा. हैदराबाद की मक्का मस्जिद में साल 2007 में बम धमाके हुए थे.

अदालत के इस फैसले का मतलब यह है कि इस मस्जिद पर आतंकी हमले के 11 साल बाद भी यह नहीं पता चला सका कि वहां पर बम किसने रखा था.साथ ही, रेड्डी के अचानक से इस्तीफा देने वाले नाटकीय फैसले के कारणों के बारे में भी किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चल पा रहा है.

इस्तीफे की टाइमिंग के कारण अकटलों का बाजार गर्म

हालांकि, राजनीतिक और सामाजिक लिहाज से इतने अहम फैसले के तुंरत बाद उनके इस्तीफे यानी इसकी टाइमिंग के कारण इस बात को लेकर अटकलों का बाजार गर्म हो गया है कि क्या नौकरी छोड़ने के उनके फैसले का संबंध ब्लास्ट मामले में सुनाए गए निर्णय से है. इस सिलसिले में कई तरह की थ्योरी (साजिश संबंधी) तेजी से सामने आईं. रेड्डी ने अपने इस्तीफा पत्र में अपने इस फैसले के पीछे 'निजी वजहों' का हवाला दिया है. उन्होंने अनुरोध किया है कि उनका इस्तीफा जल्द से जल्द स्वीकार कर लिया जाए. इसके साथ ही जज रेड्डी 15 दिनों की छुट्टी पर चले गए हैं.

Mecca Masjid Blast

रेड्डी की चार पन्नों की चिट्ठी हैदराबाद के कार्यवाहक चीफ जस्टिस रमेश रंगनाथन को भी भेजी गई है. इस चिट्ठी में तेलंगाना राज्य के गठन के 4 साल बीत जाने के बावजूद न्यायपालिका का बंटवारा नहीं होने का भी जिक्र किया गया है. रेड्डी 2016 में इस मुद्दे पर तेलंगाना में न्यायपालिका द्वारा किए गए आंदोलन में सबसे आगे थे. वह उस वक्त तेलंगाना जज एसोसिएशन के प्रेसिडेंट थे और अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत ऐसी गतिविधियां चलाने के मामले में उन्हें सस्पेंड भी किया गया था. उन्होंने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच न्यायिक अधिकारियों के अस्थायी आवंटन के खिलाफ हुए आंदोलन में 100 से भी जजों की अगुवाई की थी.

हालांकि, इन तमाम मसलों का उनके इस्तीफे का कारण होना अविश्वसनीय जान पड़ता है और अगर यही सच है, तो भी इस तरह के बेहद अहम फैसले के तुरंत बाद इस्तीफे का मतलब नहीं नजर आता. हालांकि, मुमकिन है कि बेशक मकसद वही हो. जज रेड्डी शायद इस सिलसिले में कड़ियां जोड़ने का काम लोगों पर छोड़ना चाहते हों.

लोगों का ध्यान भटकाने का दांव और एंटी करप्शन ब्यूरो का डर? बहरहाल, अगर रेड्डी से जुड़े बाकी खुलासों को ध्यान में रखते हुए बात की जाए, तो मुमकिन है कि यह महज दूसरे वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने वाला मामला साबित हो. हैदराबाद के कारोबारी एम कृष्णा रेड्डी ने 11 दिसंबर 2017 को हाई कोर्ट में हलफनामा दायर कर जज रेड्डी पर 'भ्रष्टाचार संबंधी गतिविधियों' में शामिल होने का आरोप लगाते हुए अदालत से इस बाबत जांच करने का अनुरोध किया था.

इस हलफनामे के मुताबिक, प्रॉपर्टी के लिए दावा करने की खातिर फर्जी दस्तावेज पेश करने के एक केस के अभियुक्त को कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए जज रेड्डी द्वारा अग्रिम जमानत दी गई. हालांकि, इससे पहले तीन मौकों पर अन्य जजों की तरफ से इस अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी.

कारोबारी एम कृष्णा रेड्डी की तरफ से हाई कोर्ट में पेश शपथ पत्र में कहा गया था, 'माननीय जज द्वारा सुनवाई के लिए जमानत याचिका को अपने पास लेने में युद्ध स्तर पर दिखाई गई दिलचस्पी इस नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त है कि वह इसे निपटाने के लिए काफी उत्सुक और इच्छुक थे. याचिका को लेने के लिए दिखाई गई दिलचस्पी की वजह के बारे में वही ( जज रेड्डी) बेहतर बता सकते हैं.' इसमें यह भी बताया गया कि जज रेड्डी सिर्फ दो दिनों के लिए उस कोर्ट के प्रभारी थे और उस दौरान उन्होंने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई दलीलों पर विचार किए बिना ही जमानत दे दी.

हालांकि, क्या इस शिकायत को रेड्डी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने या उकसाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है? न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के तेज अभियान को देखते हुए इसका जवाब शायद हां है. एंटी-करप्शन ब्यूरो ने पिछले महीने निचली अदालतों में भ्रष्टाचार के तीन अलग-अलग मामलों में तीन जजों को गिरफ्तार किया.

हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामले में जजों के खिलाफ यह अभियान जजों में शुचिता को लेकर चीफ जस्टिस की तरफ से जोर दिए जाने का हिस्सा है. लिहाजा, किसी भी जज के खिलाफ भ्रष्टचार के आरोपों को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है. तीनों केस को शुरुआती जांच के बाद हाई कोर्ट द्वारा एंटी-करप्शन ब्यूरो को भेजा गया था. हालांकि, अभी इस बारे में पता नहीं है कि 2017 में हैदराबाद हाई कोर्ट में दायर की गई शिकायत के आधार पर रेड्डी के खिलाफ जांच हो रही थी या नहीं.

भ्रष्टाचार के मामलों में कई जज हुए हैं गिरफ्तार

एंटी-करप्शन ब्यूरो ने जिन जजों को गिरफ्तार किया है, उनमें लेबर कोर्ट के एम गांधी, हैदराबाद में तैनात रहे प्रथम अतिरिक्त मेट्रोपॉलिटन सेशंस जज राधाकृष्ण मूर्ति और जगित्याल में पोस्टेड प्रथम अतिरिक्त जूनियर सिविल जज एस मधु शामिल हैं. गांधी के यहां से 3.57 करोड़ की प्रॉपर्टी बरामद की गई और उनकी जमानत याचिका भी खारिज हो चुकी है.

मधु को कथित तौर पर दो वकीलों को 60,000 करोड़ रुपये की रिश्वत देने के लिए मजबूर करने के मामले में गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने मुवक्किल को बरी करने के लिए इन वकीलों से यह रिश्वत ली. मूर्ति पर मादक द्रव्यों से जुड़े केस के अभियुक्त को जमानत देने में 7.5 लाख रुपये की रिश्वत लेने का आरोप है.

mecca mesjid verdict

हालांकि, क्या इस्तीफा देने से जज रेड्डी को कथित भ्रष्टाचार के मामले में बचने में मदद मिलेगी? वास्तव में नहीं, क्योंकि अगर प्रारंभिक जांच में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए जाते हैं, तो एंटी-करप्शन ब्यूरो को उनके खिलाफ कार्रवाई करने को कहा जाएगा, जैसा कि पिछले तीन ऐसे मामलों में हुआ है. इन तमाम वजहों से ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए इशारा किया गया.

एक जज की छवि गैर-भ्रष्ट और किसी तरह के प्रभाव से मुक्त न्यायमूर्ति के तौर पर होनी चाहिए. अगर यह बात साबित हो जाती है कि प्रॉपर्टी संबंधी किसी केस में अभियुक्त को अग्रिम जमानत देने के लिए उन्हें प्रभावित किया जा सकता है, तो मक्का मस्जिद केस में उनका फैसला भी संदेह के घेरे में आएगा. मस्जिद ब्लास्ट केस से जुड़े फैसले के बड़े राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं.

राजनीतिक पार्टी में भी शामिल होने की चर्चा

बहरहाल, मक्का मस्जिद केस में पेश की गई दलीलों से वाकिफ वकीलों का कहना है कि इस केस में इस तरह के नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी. उनका कहना है कि पांचों अभियुक्तों पर शिकंजा कसने के लिए अभियोजन पक्ष ने पर्याप्त दलीलें नहीं पेश कीं. ऐसे में जज रेड्डी के लिए खुद को इस बात के लिए राजी करना नामुमकिन जैसा था कि कठघरे में मौजूद लोगों ने वाकई में ब्लास्ट को अंजाम दिया या यह इससे जुड़ी आतंकी साजिश रची है.

इस बात को लेकर भी अटकलें हैं कि जज रेड्डी ने तेलंगाना जन समिति नामक नई राजनीतिक पार्टी में शामिल होने के लिए अपने पद से इस्तीफा दिया है. प्रोफेसर एम कोदंडराम ने हाल में इस पार्टी का गठन किया है. प्रोफेसर कोदंडराम ने टीआरएस नेता और राज्य के मौजूदा सीएम के चंद्रशेखर राव के साथ मिलकर तेलंगाना राज्य बनाने को लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया था.

तेलंगाना राज्य के बनने के बाद कोदंडराम और के चेंद्रशेखर राव अलग हो गए और अब प्रोफेसर साहब मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के सबसे मुखर आलोचकों में से एक हैं. हालांकि, कोदंडराम का कहना है कि वह तो जज रेड्डी को जानते तक नहीं हैं, उन्हें पार्टी में शामिल करने की बात तो काफी दूर है.

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