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यूपी में मांस विक्रेताओं की हड़ताल: वक्त रहते चेत जाने में भलाई है

अवैध बूचड़खानों पर यूपी सरकार की सख्ती से लोगों में नाराजगी

Updated On: Mar 28, 2017 03:06 PM IST

Dinesh Unnikrishnan

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यूपी में मांस विक्रेताओं की हड़ताल: वक्त रहते चेत जाने में भलाई है

अवैध बूचड़खानों पर यूपी सरकार की सख्ती से लोगों में बहुत नाराजगी है. मांस की आपूर्ति कम होने का असर वैध बूचड़खानों (कुल 41) पर भी हुआ है. इनपर भी सरकारी कार्रवाई की आशंका है.

ऐसे में समझा जा सकता है कि देश के सबसे ज्यादा मांस-उत्पादक राज्यों में से एक यूपी में मांस विक्रेता सोमवार से क्यों हड़ताल पर हैं. उनकी आमदनी अचानक ठप हो गई है और उन्हें अपने भविष्य के अनिश्चित होने की चिन्ता सता रही है.

बेशक बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे योगी आदित्यनाथ की मंशा नेक रही होगी. सोचा गया होगा कि इस कदम से पशुओं की चोरी रुकेगी. चोरी-छुपे पशुओं को काटने और उनका मांस बेचने के चलन पर रोक लगेगी, लेकिन परेशानी फैसले को लागू करने के तरीके को लेकर है. जिस तरह से यह फैसला लागू किया जा रहा है उसका सूबे के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर असर पड़ेगा.

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किस-किस पर पड़ेगा फैसले का असर

यूपी की सरकार ने यह नहीं सोचा कि फैसले का क्या असर होगा और जो लोग इस फैसले से प्रभावित होंगे उनके लिए विकल्प के तौर पर क्या उपाय करने जरूरी हैं. बिना इस सोच-विचार के अवैध बूचड़खानों को एकबारगी बंद करने का फैसला अमल में आ गया. इससे बड़ी संख्या में लोगों की नौकरी और जीविका छिनने का खतरा है.

यह सिर्फ मांस-उद्योग में ही नहीं बल्कि इससे जुड़े अन्य कारोबार में भी नजर आयेगा. फैसले की कीमत उन किसानों को भी चुकानी होगी जो काम लायक न रह गए पशुओं को बूचड़खानों को बेचते हैं, चमड़ा उद्योग ( खासकर टैनरी और चमड़े का सामना बनाने वाली इकाइयों) पर असर होगा. फूड प्रोडक्ट इंडस्ट्री, छोटे निर्यातक और होटल-व्यवसाय को इस फैसले की कीमत चुकानी होगी.

ऑल इंडिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्टर्स असोसिएशन के सचिव डीबी सब्बरवाल ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि 'कई एजेंसियां वैध बूचड़खानों के भी चक्कर लगा रही हैं, वे कई तरह की पूछताछ कर रही हैं और इससे घबराहट पैदा हो रही है. अभी तो हाल यह है कि वैध बूचड़खाने भी अपनी पूरी क्षमता भर उत्पादन नहीं कर रहे.'

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(फोटो: पीटीआई)

तेजी से बढ़ेगी बेरोजगारी

इस पूरी कवायद में एक बात सिरे से ही गायब है. सूबे के नए मुख्यमंत्री ने ऐसा कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किया जिसमें बताया गया हो कि जो हजारों लोग अब तक अपनी जीविका के लिए इस व्यवसाय से जुड़े थे, उनका आगे क्या होगा. 41 वैध बूचड़खानों के अतिरिक्त सूबे में कई छोटे-छोटे कटराघर चलते हैं. ये अवैध तो हैं, लेकिन यह बात भी सच है कि मांस उत्पादन की अनौपचारिक इकाई के रूप में ये हमारी अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. क्या सरकार इन इकाइयों के लिए कोई वैकल्पिक उपाए सुझाएगी?

योगी सरकार को आज नहीं तो कल बेरोजगारी में तेज बढ़ोतरी की समस्या का सामना करना पड़ेगा और बेरोजगारी सिर्फ मांस-उत्पादन के क्षेत्र में ही नहीं बढ़ेगी बल्कि इससे जुड़े तमाम व्यवसायों में भी बेरोजगारी की बढ़त होगी. योगी आदित्यनाथ जो कुछ भी करते हैं उन सबको उनकी विचारधारा से नत्थी करके देखना बेशक ठीक नहीं, लेकिन योगी आदित्यनाथ सूबे के मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री सूबे के हर वर्ग-समुदाय के प्रति जवाबदेह होता है. ऐसे में एक प्रशासनिक कार्रवाई के तौर पर योगी आदित्यनाथ के फैसलों की जांच-परख तो की ही जाएगी.

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प्रतिदिन कितना होता है उत्पादन

यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में आदित्यनाथ को सिर्फ धार्मिक/सामाजिक नाराजगी के सवाल से ही नहीं जूझना बल्कि अपने फैसलों के आर्थिक असर के बारे में भी सोचना होगा. जैसा कि हाल के एक लेख में बताया गया है, मांस उद्योग की यूपी की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है. आईसीआरए की एक रिपोर्ट के मुताबिक सूबे में भैंसों और बूचड़खानों की तादाद बहुत ज्यादा है. देश में भैंसों की कुल संख्या का 28 फीसद और बूचड़खानों तथा मीट प्रोसेसिंग यूनिटस् की कुल तादाद का 60 प्रतिशत अकेले यूपी में है.

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फैसले का असर सूबे के राजकोष पर भी होगा. साल 2014-15 में यूपी में भैंस के मांस का उत्पादन 7515 लाख किलोग्राम हुआ. इसमें मीट प्रोसेसिंग यूनिटस् में हुआ उत्पादन भी शामिल है. सूबे में 2014-15 में ही बकरी के मांस का उत्पादन 1771 लाख किलोग्राम, भेड़ के मांस का उत्पादन 231 लाख किलोग्राम और सुअर के मांस का 1410 लाख किलोग्राम उत्पादन हुआ. यूपी में औसतन प्रतिदिन 137 किलोग्राम भैंस के मांस का उत्पादन होता है.

मांस-उत्पादन के इस भरे-पूरे उद्योग में हजारों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रोजगार हासिल है. बूचड़खानों पर प्रतिबंध से निर्यात घटने से सूबे के राजस्व में 2015-16 में 11,350 करोड़ रुपए की कमी आएगी.

आईसीआरए की रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपी से साल 2015-16 में 5,65,958 मीट्रिक टन भैंस के मांस का निर्यात हुआ. देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जो संसाधन या दुधारु पशुओं की तादाद के मामले में यूपी की बराबरी कर सके.

दो महीनों में हुआ 4000 करोड़ का घाटा

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में ऑल इंडिया मीट एंड लाइव स्टॉक्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के हवाले से कहा गया है कि बीजेपी ने अपने मेनिफेस्टो में अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी. ऐसे में बीते दो माह में कुल 4000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है. इसका मतलब हुआ कि बहुत से परिवारों पर आमदनी के ठप होने का असर पहले से ही पड़ना शुरु हो गया है. साइडइफेक्ट के तौर पर इस फैसले से मांस की कीमतों में तेजी से इजाफा होगा. आपूर्ति में कमी होने पर कीमतों का बढ़ना एकदम तय है.

एक सवाल यह भी है कि जब सरकार बूचड़खानों पर रोक लगा रही है तो किसान उन पशुओं का क्या करें जो काम लायक नहीं रह गये हैं. बूचड़खानों पर प्रतिबंध से अनुत्पादक पशुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी. ऐसे अनुत्पादक पशुओं को जिलाये रखने के लिए किसान को रोजाना 60 से 80 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. छोटे किसानों पर यह खर्चा एक बोझ की तरह है क्योंकि उनके पास जीविका के पर्याप्त साधन नहीं होते.

योगी आदित्यनाथ को फैसला लागू करने से पहले इसके असर के बारे में सोच-विचार लेना चाहिए था. अगर अवैध बूचड़खानों को बंद करने की तारीख का एलान किया जाता, उन्हें चरणबद्ध तरीके से बंद किया जाता, साथ ही आमदनी और रोजगार में कमी के सवाल को ध्यान में रखा जाता और बूचड़खानों से कहा जाता कि रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए आपको निर्धारित मानकों का पालन करना होगा तो अभी के अफरा-तफरी के माहौल से बचा जा सकता था.

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