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#MeToo: कानून में सुधार नहीं, पुरुषों का दिमाग जकड़े भ्रमों को दूर करने का अभियान

#MeToo के अभियान का सवाल कानून को बदलने का नहीं बल्कि पुरुष को उसकी भ्रांत धारणाओं से उबारने का है

Updated On: Oct 14, 2018 09:12 AM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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#MeToo: कानून में सुधार नहीं, पुरुषों का दिमाग जकड़े भ्रमों को दूर करने का अभियान

इंसाफ के लिए आप किस पर विश्वास करेंगे और क्यों विश्वास करेंगे जब लोकतंत्र को चलाए-बनाए और बचाए रखने के मोर्चे पर तैनात ऊंचे ओहदेदार #MeToo के सैलाब में एक-एक करके ढहते नजर आएं?

विश्वास का संकट

नजर उठाइए और देखिए कि बुलेट की सी रफ्तार से सनसनाती यौन-उत्पीड़न की खबरों के बीच इज्जत, ओहदे और प्रोजेक्ट के ऑफर की उछलती-गिरती और ढेर होती टोपियां किनकी हैं? इनमें कोई मीडिया का नामचीन संपादक है तो कोई सिविल सोसायटी के मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता! कोई पुलिस महकमे का आला अधिकारी रह चुका है तो कोई मौजूदा मंत्रिमंडल का सदस्य या फिर इन सबसे संविधान-प्रदत्त सम्मानजनक दूरी पर बैठी न्यायपालिका के महामहिम! लोकतंत्र का कोई ठीहा नहीं बचा, #MeToo ने आरोप की अंगुली लोकतंत्र के हर मोर्चे पर मौजूद सिपहसालारों पर उठाई है.

सबसे ज्यादा अंगुलियां उठी हैं सवा अरब लोगों के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के साझे स्वप्न को कभी धूपछांही तो कभी इंद्रधनुषी रंगों में रजतपट पर उकेरने वाले बॉलीवुड पर. चाहे किरदारों को अंगुली पर नचाने वाला ‘शोमैन हो या फिर निभाए गए किरदार के बूते ‘संस्कारी’ होने का खिताब पाया अभिनेता, किरदार की कथा को गीत के मुकाम तक पहुंचाकर उसे जज्बात की सरहदों तक पहुंचाने वाला गवैया हो या फिर इन सबके सहारे बनने वाले सघन-अनुभव संसार को अपने तीखे व्यंग्य से भेदकर सच्चाई का विद्रूप दिखानेवाला कॉमेडियन- सोचिए, इस हम्माम में जब सबही नंगे नजर आएं तो फिर शर्म और हया अपना मुंह किस कोने छिपाएं?

सीमा और संभावना

आजादी और बराबरी कायम करने के संकल्प से गढ़े गए हमारे लोकतंत्र में #MeToo ने सोती आंख से देखे जाने वाले सपने और जागती आंख से अनुभव की जाने वाली रोजमर्रा की सच्चाई- दोनों ही के विद्रूप को हैरतअंगेज तेजी से बेनकाब किया है. लैंगिक भेदभाव के खात्मे का जो सफर सदियों में नहीं तय किया जा सका उसे इस अभियान ने चंद दिनों में पूरा कर लेने का अहसास जगाया है. अब आप मान सकते हैं कि कभी लाद दी गई मर्यादा तो कभी अपने निपट निस्सहाय होने की भय-भावना या फिर ‘अच्छी मां-बहन-पत्नी’ या ‘सहकर्मी’ होने के घेरे में बंधे होने के नाते जो गुस्सा सदियों तक स्त्री के मन में खौलता और खदबदाता रहा- मी टू का मौजूदा लम्हा उस गुस्से को अपनी जुबान मिल जाने का ऐलान कर रहा है.

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और, दरअसल अपनी ऊर्जा में अबाध जान पड़ते #MeToo के साथ मुश्किल भी इसी बात से शुरू होती है.

भय और संकोच का घेरा बेशक टूटा है और महिलाएं सोशल मीडिया के मंच पर यौन-उत्पीड़न के दैनिक अनुभवों की ‘आपबीती’ बेखौफ होकर लिख रही हैं. यह आशा जगाने वाली बात है. लेकिन इस आशा के साथ आशंका जुड़ी है- आशंका यह कि #MeToo में स्त्री को सशक्त बनाने की जितनी संभावनाएं हैं क्या उन व्यापक नोटिस ली जाएगी? या जैसा कि शतरंजी चालों से भरी निहित स्वार्थों की लोकतांत्रिक दुनिया में प्रतिरोध की भाषाओं के साथ अक्सर होता है- क्या अपने शोक-संताप-शिकायत और इंसाफ की उम्मीद को प्रतिरोध की भाषा में व्यक्त करती भारतीय स्त्री के साथ भी छल का वही पुराना खेल होगा और इस या उस उपाय के कानूनी किनारों पर थामकर प्रतिरोध की असली वजह को नि:शेष कर दिया जाएगा?

आशंका की वजह

ऐसी आशंका जागने की वाजिब वजहें हैं. ध्यान रहे कि #MeToo एक अभियान है और हर अभियान की तरह #MeToo के लक्ष्य को भी ठोस मांग के एक चौखटे में कसने की कोशिश की जाएगी. मांग की हदों में बंधने के बाद स्त्री-प्रतिरोध की इस अभिव्यक्ति की संभावनाओं का सीमित हो जाना भी तय है. इसके संकेत अभी से मिलने शुरू हो गए हैं.

मिसाल के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के एक बयान पर गौर किया जा सकता है. इस बयान में #MeToo अभियान को मांग के एक खास चौखटे में कसने की कोशिश झलकती है. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक केंद्रीय मंत्री ने भारत में #MeToo अभियान के पहुंचने का स्वागत करते हुए कहा कि अपने साथ हुए यौन-दुर्व्यवहार को पीड़ित व्यक्ति उम्र भर नहीं भूलता इसलिए चाहे अपराध को हुए कितना भी वक्त गुजर जाए, पीड़ित को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार होना चाहिए.

जाहिर है, केंद्रीय मंत्री का इशारा भारतीय दंड विधान की धारा 468 की तरफ है. इस धारा में कहा गया है कि अगर किसी अपराध की सजा के तौर पर सिर्फ जुर्माना लगना है तो उसकी शिकायत अपराध के छह माह के भीतर की जानी चाहिए. अगर अपराध में सजा के तौर पर अधिकतम एक साल की जेल हो सकती है तो शिकायत अपराध के एक साल के भीतर दर्ज होनी चाहिए और अगर किसी अपराध में एक साल से ज्यादा मगर अधिकतम तीन साल तक हो सकती है तो ऐसे अपराध के घटित होने के तीन साल के भीतर ही शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

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ऐसा ही एक संकेत सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस सुजाता मनोहर की एक प्रतिक्रिया में है. कार्यस्थल पर होने वाले यौन-शोषण के खिलाफ बनी विशाखा गाइडलाइंस वाले फैसले से जुड़ी जस्टिस मनोहर के मुताबिक मसले पर महिलाओं का सार्वजनिक रूप से बोलना काफी नहीं बल्कि आरोपों के मिजाज के अनुकूल कानूनी प्रावधान बनाना जरूरी है. जस्टिस मनोहर का स्पष्ट मानना है कि यौन-शोषण के आरोपी व्यक्ति को पद से हटाने के अतिरिक्त भी कोई सजा दिलाना जरूरी है तो मौजूदा कानून मददगार नहीं होने वाले क्योंकि ‘ऐसे आरोपों के खिलाफ रिपोर्ट करने की समय सीमा है. इसलिए कानून को इस तरह की घटनाओं में या दूसरे तरह के यौन दुर्व्यवहारों को वर्गीकृत करने और सजा की विभिन्न श्रेणियों को अलग-अलग वर्गीकृत करने की जरूरत है जिससे बाद में भी ऐसे मामलों का खुलासा होने पर दोषी को सजा दी जा सके.’

लेकिन क्या #MeToo अभियान का मुख्य लक्ष्य कार्यस्थल पर होने वाले यौन-शोषण और लैंगिक भेदभाव की घटनाओं के खिलाफ कारगर कानून बनाने की है? अगर अभियान का मकसद इतना ही भर है तो फिर ऐसा किसी जनहित याचिका के सहारे भी हो सकता है. आखिर, विशाखा गाइडलाइंस के मुख्य बातों के आधार पर बने सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ विमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रसल) एक्ट को कारगर बनाने के लिए उसमें सुधार की जरूरत की बात मीडिया में जब-तब उठते ही रहती है. तो क्या #MeToo अभियान से ऊपजी नैतिक ऊर्जा सिर्फ महिला-सशक्तीकरण के कुछ कानूनों में तरमीम भर के लिए है?

कहीं असल सवाल की अनदेखी ना हो जाए

सवाल बदल दिए जाएं तो उनके जवाब भी बदल जाते हैं. कार्यस्थल पर किसी महिला का यौन-शोषण ना हो इसके कारगर इंतजाम करना या फिर अपने साथ हुए यौन-शोषण की शिकायत किसी भी उम्र में करने की आजादी का होना निश्चित ही महत्वपूर्ण सवाल हैं. लेकिन #MeToo अभियान से निकलकर आने वाली आपबीतियों में छिपे सवालों को यौन-उत्पीड़न तथा शोषण के खिलाफ कानून में सुधार और कारगर इंतजाम’ सरीखे मांग के तौर पर देखना-समझना ठीक नहीं.

'अभी क्यों कहा-पहले क्यों नहीं', 'अगर इतनी ही दिक्कत थी तो पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखाने में क्या हर्ज है' और 'इस कीचड़-उछाल होड़ से भला खास क्या होना है' जैसे ताने-उलाहने के भटकावों से बचकर किसी हमदर्द की आंख से पढ़ें तो अभियान की 'आपबीतियां' आपसे पूछती सी लगेंगी कि महिलाएं तो अपने स्त्री होने की बाधा से उबरकर बदल गईं, लेकिन पुरुष अपने मर्द होने की सुविधा को तजकर कब बदलेंगे?

पुरुषों के भ्रमों को तोड़ने की कोशिश है ये

पुरुष को सुविधा है वह सदियों से चली आ रही इस धारणा को अपने मन में बैठाए रखे कि स्त्री के मन को जाना नहीं जा सकता. ‘स्त्री के चरित्र को दैव भी नहीं जानते’ सरीखे प्राचीन नीति-उपदेश से लेकर ‘ह्वाट् विमेन वांट’ जैसी आधुनिक उक्तियों के बीच समझ की एक निरंतरता चली आ रही है. यह धारणा सिखाती है स्त्री कोई और ही प्राणी है, पुरुष को ना समझ में आने वाली पहेली! एक बार ‘पहेली’ मान लें तो सीधे-सीधे संवाद कायम करने की गुंजाइश ही कहां बचती है स्त्री से? इसी समझ ने सिखाया है कि स्त्री को उसके कहे से नहीं बल्कि उसके संकेतों से जानो. संकेतों के सहारे स्त्री को जानने-परखने और उसके साथ बरताव तय करने के खतरे हैं. आप संकेतों में पढ़ते हैं कि इस या उस स्त्री ने बाल खोल रखे हैं या छोटे कपड़े पहने हैं तो इसका मतलब है, वह आपको लक्ष्य कर यौन-इच्छा का इजहार कर रही है.

पुरुष को सुविधा है, वह मान ले कि स्त्रियां स्वभाव से ही अबोध होती हैं. उन्हें अपनी यौन-इच्छाओं या फिर अपने दैहिक-मानसिक जरूरतों का ठीक-ठीक पता नहीं होता और पुरुष होने के नाते फर्ज बनता है कि स्त्री को उसकी शारीरिक-मानसिक जरूरतों के बारे में जागरुक और प्रशिक्षित किया जाए. पुरुष ऐसी ही सोच से स्त्री को एक यौन-वस्तु में तब्दील करता और उसकी हर गतिविधि में संभावित यौन-संदेश खोजता-देखता है और बहुधा इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि स्त्री मुंह से ना कहे तो इसे और आगे बढ़ने के एक संकेत या उकसावे के रूप देखना चाहिए.

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पुरुष को सुविधा है, वह अपने को किसी जाति, धर्म, भाषा, पेशा या हुनर का एकलौता संरक्षक-संवर्धक समझ ले और इन्हीं आधारों पर किसी स्त्री को अपने से हीनतर समझकर मन ही मन मान ले कि उस ‘स्त्री का तो काम ही है मेरी इच्छाओं का ध्यान रखना और इनमें मुख्य हैं मेरी (पुरुष की) यौन-इच्छाएं’. पुरुष को सुविधा है, वह चाहे तो मान ले कि दुनिया तो खतरों से भरी है. ऐसी खतरनाक दुनिया में हर कोई हर किसी के साथ गलत कर रहा है तो फिर मैंने किसी स्त्री के साथ गलती की तो कुछ असहज और असामान्य बरताव नहीं किया. इन सबसे अलग पुरुष को यह चिंता भी सता सकती है कि स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध हासिल किए बगैर अपना पुरुष होना साबित नहीं किया जा सकता. और सोच के इस घेरे में कैद लोग मान बैठते हैं कि जिसने जितना ज्यादा यौन-दुर्व्यवहार या शोषण किया वह उतना ही बड़ा पुरुष!

मनोविज्ञान कहता है ये सारी धारणाएं बलात्कारी मानसिकता के लक्षण हैं. इन्हीं धारणाओं की ओट में बलात्कारी अपने कुकृत्य को जायज और जरूरी ठहराते हैं. #MeToo के अभियान का सवाल कानून को बदलने का नहीं बल्कि पुरुष को उसकी भ्रांत धारणाओं से उबारने का है.

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