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मजदूर दिवस पर बोले ज्यां द्रेज़- NREGA को जिंदा रखने के लिए मजदूरी दर बढ़ाना जरूरी

ज्यां द्रेज़ ने कहा कि वास्तव में विकास की दर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार यह तय करती है कि देश कितनी तरक्की कर रहा है

Updated On: May 01, 2018 08:06 PM IST

FP Staff

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मजदूर दिवस पर बोले ज्यां द्रेज़- NREGA को जिंदा रखने के लिए मजदूरी दर बढ़ाना जरूरी
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मजदूर दिवस यानी मे डे के मौके पर सरकार कई दावे कर रही है. सरकारी आंकड़ों में कहा जा रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था उच्च दर से बढ़ रही है. लेकिन, जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका मानना है कि वास्तव में विकास की दर नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार यह तय करती है कि देश कितनी तरक्की कर रहा है.

ज्यां द्रेज़ सोनिया गांधी के राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ( एनएसी)के सदस्य भी रह चुके हैं. उन्होंने राष्ट्रीय रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) लाने में अहम भूमिका निभाई. उनका कहना है कि 'स्वच्छ भारत मिशन' को छोड़ दिया जाए, तो पिछले चार साल के दौरान मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया. पढ़ें, ज्यां द्रेज़ से हुई बातचीत के खास अंश...

नोटबंदी के बाद देश ने एक के बाद कई दिक्कतें देखी. आपको क्या लगता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर हुआ? एक अर्थशास्त्री के रूप में क्या आप इसमें बढ़ते संकट के संकेत देख रहे हैं?

जैसा कि इसे कृषि संकट कहा जा रहा है, देश में इसका लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म दोनों तरह से असर पड़ेगा. लॉन्ग टर्म में अगर देखें तो कृषि में धीमी बढ़ोतरी और ज्यादा अनिश्चितता देखी जाएगी. ज्यादातर वक्त में बाकी अर्थव्यवस्था की तुलना में कृषि क्षेत्र में धीमी गति से बढ़ोतरी होती है. इसका मतलब ये है कि जो कृषि में विविधता लाने में नाकाम रहते हैं, वो पीछे रह जाते हैं. इसके बाद उनकी आजीविका यानी रोजी-रोटी कमाने का साधन भी अनिश्चित हो जाता है. इसके पीछे की वजह अच्छे मौसम का अभाव, वाजिब कीमतों का न मिलना और दूसरे फैक्टर हो सकते हैं. इन सभी चीजों का प्रभाव कृषि और किसान पर पड़ता है. किसानों को यह लगने लगता है कि खेतीबाड़ी वह काम है जिसमें रोजगार बढ़ेगा नहीं, बल्कि घटेगा.

मुझे हैरानी है कि सरकार को आर्थिक विकास के साथ-साथ गरीबी को हटाने के लिए भी काम करना चाहिए, मगर ऐसा नहीं हो रहा. अगर आप लोगों के जीवन में सुधार करना चाहते हैं, तो आर्थिक विकास जरूरी है. लेकिन, सिर्फ इससे नहीं चलने वाला, आर्थिक विकास के साथ-साथ आपको प्राथमिक शिक्षा, सामाजिक नीति, लिंग समानता, पर्यावरण संरक्षण जैसे मसलों पर काम करना होगा. एनडीए सरकार इन मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. दूसरी तरफ, अगर आपका उद्देश्य चीन को पीछे करना है या फिर ऐसे राज्य का निर्माण करना है, जो बाकी दुनिया को निर्देशित कर सके, तो आपको बुनियादी चीजों पर सबसे पहले काम करना ही होगा. तभी विकास हो सकता है.

पीएम मोदी ने मनरेगा को 'यूपीए की नाकामी का सबसे बड़ा स्मारक' बताया है. लेकिन, इस साल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मनरेगा के लिए फंड बढ़ाए हैं. इसे 4800 करोड़ कर दिया गया है. आपको लगता है कि इससे इस योजना को चलाने में मदद मिलेगी?

ज्यादातर सरकारी योजनाओं के लिए बजट आवंटन हर साल बढ़ता ही है. बशर्ते अगर कीमतों में बढ़ोतरी हो तो. जब ऐसा होता है, तो हर साल दावा करना संभव है कि पिछले साल की तुलना में इस बार बजट बढ़ाया गया. लेकिन, इससे सब कुछ स्पष्ट नहीं होता. वास्तविक अर्थों में... आज की तारीख में मनरेगा का बजट 2009-10 की तुलना में बहुत कम है. पिछले कुछ सालों में बजट की रकम थोड़ी बढ़ी जरूर है, लेकिन महंगाई को देखा जाए, तो ये रकम काफी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता. ध्यान रखें कि 2014 में जब नई सरकार आई, तो इसने मनरेगा पर हमला किया. नई सरकार ने मनरेगा के खर्चों पर रोक लगाई. इससे क्या हुआ. कृषि का ही तो नुकसान हुआ. अगर मनरेगा श्रमिकों को पुरानी दरों पर ही मजदूरी मिलती रहेगी, तो पूरी स्कीम आखिर में धराशायी होनी ही है.

NREGA को ठीक ढंग से लागू करने को लेकर कौन-कौन से बाधाए हैं? मजदूरी देने में देरी, वास्तविक मजदूरी की पुरानी दर, राजनीतिक इच्छा में कमी या भ्रष्टाचार?

NREGA के लिए अभी सबसे बड़ी दिक्कत और बाधा मजदूरी के भुगतान की व्यवस्था है. मजदूरी देने में देरी का असर भी काफी हद तक इस स्कीम को सुचारू रूप से चलाने में बाधा डालता है. कहने को तो अब आधार आधारित भुगतान प्रणाली आ चुकी है, लेकिन इसका ठीक तरह से पालन नहीं हो रहा. ऐसे में पेमेंट की दिक्कत अभी भी है.

मनरेगा प्रबंधन और सूचना प्रणाली के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष में लगभग 500 करोड़ रुपये मजदूरी भुगतान के रूप में अस्वीकार कर दिए गए थे. कभी-कभी डेटा में गलतियां, आधार में दी गई गलतियां और डेटाबेस में टेक्निकल फॉल्ट से पेमेंट अस्वीकार कर दिया जाता है. कभी-कभी श्रमिकों की मजदूरी जन-धन खातों में जमा कर दी जाती है. लेकिन, इसमें भी दिक्कतें आती हैं. कभी-कभी पैसा किसी और के खाते में चला जाता है या फिर एयरटेल वॉलेट में ट्रांसफर हो जाता है. मजदूर को इसकी जानकारी होती नहीं. कई बार तो पैसे मिलते ही नहीं. क्योंकि, ई-केवाईसी या अन्य तकनीकी कारणों की कमी के कारण मनरेगा कर्मचारी का खाता बंद कर दिया जाता है, इसकी जानकारी भी उन्हें नहीं दी जाती.

कुल मिलाकर इस स्कीम में पूरी भुगतान प्रक्रिया एक बुरा सपना बनकर रह गई है. इसमें भ्रष्टाचार का बोलबाला भी हो गया है. जब ईमानदार श्रमिकों ने इस स्कीम में रुचि खो दी, तो भ्रष्ट बिचौलियों की चांदी हो गई. मुझे अन्य राज्यों के बारे में निश्चित रूप से तो नहीं मालूम, लेकिन झारखंड में कम से कम ये स्कीम अब खत्म होने की कगार पर है.

अगर हम बात करें बोलनगिर या बुंदेलखंड की, तो मेरी समझ से NREGA लोगों को विस्थापन को रोकने में सफल नहीं हुई है. इस पर आपका क्या कहना है?

हालिया रिसर्च के मुताबिक, पुराने सालों में इस स्कीम को जिन इलाकों में तार्किक रूप से लागू किया गया, वहां मजदूरों के विस्थापन को रोकने में मदद मिली. दक्षिणी राजस्थान में ऐसा ही हुआ. लेकिन, बोलनगिर और बुंदेलखंड में ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि इन इलाकों में मनरेगा के तहत मजदूरी की दर बहुत कम है. वहीं, यहां रोजगार पाना भी बड़ी समस्या है. मनरेगा के मामले में शुरुआती कुछ सालों में सब ठीक था. तय था कि रोजगार चाहने वालों को न्यूनतम मजदूरी पर काम दिया जाएगा. लेकिन बाद में चीजें बदल गईं.

आज इस स्कीम में मांग पर काम के सिद्धांत को कमजोर कर दिया गया है. अगर योजना को ठीक ढंग से लागू नहीं किया जाए, तो मजदूरी भुगतान में अक्सर देरी होती है. हमें इसे बदलने की जरूरत है. तभी मजदूरों के विस्थापन को रोका जा सकेगा.

मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने का वादा किया है. क्या ऐसा होगा?

यह एक कागजी वादा है. हमारे पास किसानों की आय पर कोई भरोसेमंद डेटा नहीं है, इसलिए उन्हें दोगुना करने का वादा सरकार को कुछ भी हासिल नहीं कराएगा. 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए चार साल के लिए वास्तविक शर्तों में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर की जरूरत होगी. मुझे पता नहीं है कि इस तरह के अभूतपूर्व विकास को दुनिया में कोई देश हासिल कर सका है या हासिल कर पाएगा कि नहीं. सरकार ऐसा कोई कारगर कदम भी नहीं उठा रही, जिसके आधार पर ऐसा सोचा भी जा सके. मुख्यधारा की मीडिया भी किसानों के मुद्दे को नहीं उठाती. वो सिर्फ सरकार के कागजी वादों को हाईलाइट करती है, जो कि निराशाजनक है. किसान होंगे, तो खेती होगी.

आप आधार के सबसे बड़े आलोचकों में से एक रहे हैं. पीडीएस, पेंशन वगैरह के खिलाफ भी लड़े हैं. जमीनी स्तर पर आधार को लेकर आपका क्या अनुभव रहा?

मेरा अनुभव काफी हद तक झारखंड पर आधारित है, जहां आधार ने कहर बरकरार रखा है. कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को जोड़ना उतना जरूरी नहीं था, क्योंकि लोगों की इसमें ज्यादा हिस्सेदारी नहीं है. गांव के लोग अभी भी उतने डिजिटली एजुकेटेड नहीं हुए हैं. कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार को जरूरी करने के लिए सरकार ने बेशक एक समय सीमा तय की थी. क्योंकि ज्यादातर लोग राशन कार्ड वगैरह से अपना आधार लिंक नहीं कर पाए थे. बाद में इसकी सीमा भी बढ़ाई गई. लेकिन, हुआ क्या. झारखंड की घटना सामने आई.

जब आधार आधारित बॉयोमीट्रिक सिस्टम लागू किया जाता है, तो उसमें कई दिक्कतें आती हैं. इन दिक्कतों को दूर किए बिना आप चीजें ठीक नहीं कर सकते. एबीबीए सिस्टम से अलग तमिलनाडू हिमाचल जैसे राज्यों ने स्मार्ट कार्ड योजना चलाई है. इससे फायदा हो रहा है. इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए.

एनडीए सरकार खुद को गरीबों की सरकार बताती है. सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों में बजट के आवंटन को देखते हुए आप सरकार के इन दावों पर क्या कहेंगे?

हर सरकार गरीबों की सरकार होने के दावे करती है. लेकिन अगर तथ्यों को देखें, तो सच्चाई सामने आ जाएगी. मोदी सरकार में सामाजिक नीतियों को ज्यादा तवज्जों नहीं दी गई. इसे दो शब्दों में समेटा जा सकता है 'पैसा बचाओ'. सवाल उठता है कि मनरेगा स्कीम में मजदूरी की दर अब तक क्यों नहीं बढ़ीं? मैटरनिटी बेनिफिट के सुझावों को क्यों खारिज कर दिया गया? फूड सिक्योरिटी एक्ट का उल्लंघन क्यों हुआ? और सोशल सिक्योरिटी पेंशन को जारी रखने के लिए केंद्र के सहयोग को क्यों नकार दिया गया? मैसेज साफ है. गरीबों को खुद अपनी मदद करनी चाहिए.

यहां तक कि चाइल्ड न्यूट्रिशन स्कीम के तहत मिड डे मील के लिए मिलने वाले बजट में भी 36 से 50 फीसदी तक की कटौती कर दी जा रही है. सरकार ने सामाजिक सहकारिता और कल्याण के क्षेत्र में चार साल के शासन के दौरान कुछ नहीं किया. हेल्थ के मामलों में भी सरकार कारगर योजना लाने में नाका रही. सामाजिक नीति में सरकार काफी पीछे है. बिना इसमें आगे आए विकास का चेहरा नहीं देखा जा सकता.

(न्यूज 18 से साभार)

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