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नव-हिंदुत्व का अखाड़ा बना काशी विश्वनाथ मंदिर के विस्तार का मुद्दा

मंदिर के विस्तार का ब्लूप्रिंट भले ही अब तक सामने न आ पाया हो लेकिन मंदिर के बहाने कई राजनीतिक ब्लूप्रिंट कई खेमों में तैयार हो रहे हैं

Utpal Pathak Updated On: Jul 11, 2018 09:47 AM IST

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नव-हिंदुत्व का अखाड़ा बना काशी विश्वनाथ मंदिर के विस्तार का मुद्दा

वाराणसी में इन दिनों श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के इर्द गिर्द हो रही गतिविधियों का चर्चा लगभग हर स्तर पर है लेकिन सिवाय मीडिया में चली कुछ खबरों के अलावा ज्यादातर बतकही दबी ज़बान में हो रही है. बहरहाल, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री काशी विश्वनाथ इन दिनों खुद को नित नए कलेवर में देखने को मजबूर हो चले हैं. मंदिर विस्तारीकरण के नाम पर मकानों के अधिग्रहण की धारा अब अंतहीन है और रोज नई बातों ने वातावरण में असमंजस को जन्म दिया है.

बहरहाल, मंदिर के आसपास की सम्पत्तियों के अधिग्रहण होने या न होने पर बहस अभी आगे लम्बी चलनी है, लेकिन ताजा मामला कुछ ऐसा है जिससे न सिर्फ हिंदुत्व की अलग-अलग पद्धतियों का टकराव सामने आया है बल्कि धार्मिक गुटबाजी को अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचने का मौका भी जाने अनजाने में मिल गया है.

बीते दिनों वाराणसी के प्रमुख अखबारों समेत अन्य समाचार माध्यमों में एक खबर बड़ी ही प्रमुखता से छापी गई जिसमे इस बात को तरजीह दी गई थी कि करीब 240 साल के नव इतिहास में पहली बार काशी पुराधिपति बाबा काशी विश्वनाथ का दरबार कुंभाभिषेक से ऊर्जित किया जाएगा.

खबर में यह भी छपा कि दक्षिण भारत की तर्ज पर 4 दिन तक होने वाले इस अनुष्ठान को कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य विजेंद्र सरस्वती की देखरेख में करीब 200 ब्राह्मण पूरा करेंगे. इतना ही नहीं बल्कि इस बात को ज़ोर देकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करवाया गया कि इंदौर की महारानी रहीं अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराए गए श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्वार के बाद के 240 साल के नव इतिहास में पहली बार श्री काशी विश्वनाथ का कुंभाभिषेक होने जा रहा है.

क्या है कुम्भाभिषेक

दक्षिण भारत की मान्यताओं के अनुसार मंदिरों में हर 12 साल पर सकारात्मक ऊर्जा और पवित्रता को बनाए रखने के उद्देश्य से कुंभाभिषेक अनुष्ठान किया जाता है.

तयशुदा कार्यक्रम के अंतर्गत जुलाई महीने के पहले सोमवार को देर शाम इस अनुष्ठान का आयोजन कराने वाले दक्षिण भारत के यजमान सुबू सुंदरम को विधि विधान से संकल्प दिलाया गया और अनुष्ठान शुरू होकर गुरुवार को संपन्न हुआ. कुंभाभिषेक में गंगा तट तक से कलश यात्रा शुरू हुई और बाबा विश्वनाथ की गंगा के जल की करीब 13 विधि से पूजा की गई. 200 विद्वान ब्राम्हणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार और पूजन पांच जुलाई तक निरंतर होता रहा. पांच जुलाई की सुबह से गंगा जल से स्वर्ण शिखर से कुंभाभिषेक की प्रक्रिया शुरू हुई और दिन भर के कार्यक्रम के बाद अनुष्ठान संपन्न हुआ.

अनुष्ठान से पहले इस बात की चर्चा भी की गई थी कि कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य विजेंद्र सरस्वती की देखरेख में काशी और दक्षिण भारतीय ब्राह्मण स्वर्णशिखर से लेकर गर्भगृह तक ये अनुष्ठान संपन्न कराएंगे. लेकिन शंकराचार्य की तरफ से उनके मौजूद रहने की पुष्टि आखिरी समय तक नहीं हो पाई और अंत में श्रृंगेरी मठ के प्रतिनिधि चल्‍ला अन्‍नपूर्णा प्रसाद राव और कांची कामकोटि पीठ के प्रतिनिधि वी चंद्रशेखर के आचार्यत्‍व में इस अनुष्ठान को चार दिनों तक किया गया.

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सिर्फ 'खास' लोगों को गया था बुलावा

चार दिनों तक चले इस महाअनुष्‍ठान की पूर्णाहुति से पहले गुरुवार की सुबह ज्ञानवापी प्रांगण में बने अस्‍थाई मंडप में करीब दो सौ दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों ने देवताओं का पूजन, हवन और सोम कलश पूजा की. इसके पश्चात चतुर्वेद पारायण के सस्‍वर पाठ के बीच 13 विधियों से पूजित गंगा जल से भरे दो सौ कलशों से स्‍वर्ण शिखर और फिर गर्भगृह का अभिषेक किया गया. इस कार्यक्रम में नगर की महापौर मृदुला जयसवाल समेत प्रदेश के लोक निर्माण सचिव नितिन रमेश गोकर्ण, सीआरपीएफ कमांडेंट एनपी सिंह और दक्षिण भारत से आए बड़ी संख्‍या में श्रद्धालु मौजूद रहे.

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बहरहाल, चर्चा का विषय सिर्फ अनुष्ठान नहीं बल्कि इस कार्यक्रम में शामिल होने वाली विभूतियां भी हैं. इतने वृहद् कार्यक्रम का प्रचार प्रसार युद्धस्तर पर हो रहा था लेकिन अंत में मंदिर प्रशासन द्वारा चिन्हित नगर के कुछ 'खास' लोगों को ही इस कार्यक्रम को देखने की अनुमति मिली. यहां तक कि मंदिर के पूर्व न्यासियों समेत पूर्व महंत परिवार एवं नगर की किसी अन्य विद्वान या वेदमूर्ति को इस कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया.

जिन्हे बुलाया गया उनमे से अधिकांश ने पद्धति की जानकारी होते ही स्वतः ही कार्यक्रम से दूरी बना ली. श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पहले से उच्च सुरक्षा घेरे में है, ऐसे में भीतर प्रवेश को लेकर कड़ी नियमावली है जिसका पालन भी कड़ाई से होता है लिहाजा मीडिया को भी भीतर जाने की अनुमति लेने में मशक्कत हुई और कई पत्रकारों ने कार्यक्रम को दूर से ही समझने में भलाई समझी. कार्यक्रम की तस्वीरें भी प्रशासन के ही माध्यम से मीडिया को उपलब्ध करवाई गई. सोशल मीडिया पर इसे एक महा अनुष्ठान के रूप में प्रसारित किया गया.

कार्यक्रम को लेकर शहर के ख्यातिलब्ध लोग खुश

हिंदुत्व का केंद्र माने जाने वाले नगर में हिंदुत्व के ही एक मत का दूसरे मत पर दबाव देखे जाने की इस घटना को भीतरखाने में किसी विद्वान व संत-महंत ने उचित नहीं समझा लेकिन मामला चूंकि प्रशासन की देख रेख में हुआ था लिहाजा सबने चुप चाप रहने में ही अपनी भलाई समझी. सीधे पूछे जाने पर सभी ने रहस्यमय चुप्पी साध रखी थी लेकिन पहचान छिपाए रखने के भरोसे पर लगभग हर ख्यातिलब्ध धार्मिक विभूति ने कार्यक्रम को लेकर खुशी नहीं जाहिर की.

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बहरहाल, समय रहते काशी विश्वनाथ न्यास परिषद के अध्यक्ष पंडित अशोक द्विवेदी ने इस पूरे मामले को संज्ञान में लेते हुए अनुष्ठान के कुछ दिन बाद मंदिर परिसर का दौरा किया और उसके तुरंत बाद ही पत्रकारों से औपचारिक बातचीत के दौरान उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में कुम्भाभिषेक का कोई औचित्य नहीं था.

'शास्त्रीय दृष्टि से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का स्थान मंदिर नहीं बल्कि दरबार है. भगवान विश्वनाथ काशी के राजा हैं और पालक हैं. मंदिर होने के लिए ऐसे विग्रह का होना अनिवार्य है जो दीवार के सहारे खड़ा किया गया है. नर्मदा नदी से लेकर सिंधु नदी तक उत्तर भारतीय मंदिरों के शिखर पर किसी देव विग्रह की स्थापना का विधान नहीं है. कुंभाभिषेक का यह अनुष्ठान विशुद्ध रूप से दक्षिण भारतीय परंपरा के अंतर्गत किया गया है जो कि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर की परंपरा और अधिनियम के विपरीत है. वर्ष 1998 में पूर्व काशी नरेश डॉ विभूति नारायण सिंह की उपस्थिति में मंदिर का सहस्रघटाभिषेक किया गया था लेकिन तब भी मंदिर के शिखर को बांधा नहीं गया था.'

मंदिर के प्रवेश पास और एक व्यापारी के रोल की जांच की मांग

डॉ द्विवेदी ने कुछ सवाल भी उठाए जिसके अंतर्गत उन्होंने कहा कि 'मेरा सवाल यह है कि जिन लोगों ने यह अनुष्ठान करवाया है विश्वनाथ मंदिर को जीर्ण मान लिया था? अगर नहीं तो किस आधार पर कुंभाभिषेक हुआ इसका प्रमाण प्रस्तुत करें. किसके आदेश पर मंदिर के शिखर को बांध कर सीढ़ी बनाई गई थी? पहले से एक यज्ञ मंडप के होने के बावजूद दूसरी यज्ञशाला का निर्माण क्यों करवाया गया था? इस बात का प्रचार किया गया था कि कांची के शंकराचार्य आएंगे लेकिन वह नहीं आए. यदि इस अनुष्ठान में वाकई पांच करोड़ रुपए खर्च हुए तो फिर मंदिर में पूजन अर्चन की कोई रसीद क्यों नहीं कटवाई गई?

इसके साथ ही उन्होंने मीडिया के माध्यम से वाराणसी के मंडलायुक्त से भी अनुरोध करते हुए कहा कि 'दक्षिण भारतीय व्यापारी सुब्बू सुंदरम की जांच होनी चाहिए और इतने लोगों को मंदिर में प्रवेश के पास किन परिस्थितियों में जारी किए गए इसकी भी जांच होनी चाहिए.'

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इस बाबत नगर के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि 'व्यक्ति विशेष, सम्प्रदाय विशेष और क्षेत्र विशेष के लोगों को संतुष्टि देने के उपक्रम से किया गया यह अनुष्ठान शास्त्रोक्त नहीं है और इसे सीधे तौर पर हिंदुत्व के अलग-अलग मतों के आपसी टकराव के रूप में देखा जाना चाहिए. हालांकि अनुष्ठान करवाने वाले मतावलम्बियों की विजय हुई या नहीं इस बात का फैसला बाबा विश्वनाथ स्वयं करेंगे लेकिन मंदिर के आस पास विस्तार के नाम पर जो नव कलेवर रूपी परिवर्तन हो रहे हैं उनके दूरगामी नुकसान का अंदाजा अगर प्रदेश और केंद्र सरकार को होता तो शायद इस अनुष्ठान का आयोजन नहीं हो पाता.

वास्तु से छेड़छाड़ करने वालों को झेलना पड़ा है ईश्वरीय शक्तियों का संताप

इतिहास गवाह है कि मंदिरों के वास्तु से छेड़छाड़ करने वाले को ईश्वरीय शक्तियों के संताप को झेलना पड़ता है और बीते सालों में विश्वनाथ मंदिर के वास्तु एवं विधान से छेड़छाड़ करने वालों के बारे में तहकीकात करके आप स्वयं पता लगा सकते हैं. लेकिन मेरा भय इस बात का है कि काशी में इस नए प्रकार के दबाव वाले नव हिंदुत्व का निर्माण आखिर कर कौन रहा है और उनकी मंशा क्या है?'

वाराणसी में इन दिनों काशी विश्वनाथ मंदिर कई कारणों से चर्चा का विषय है, अधिग्रहण के नाम पर चल रहे चाकचिक्य (चिकचिक) के बीच मंदिर विकास समिति और शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती के बीच चल रहे वाक् युद्ध ने अब सोशल मीडिया पर जगह बना ली है और दोनों ही तरफ से आरोप प्रत्यारोप का दौर अनवरत जारी है.

मंदिर के बहाने तैयार हो रहे राजनीतिक ब्लूप्रिंट

अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती कई दिनों से विश्वनाथ मंदिर के आसपास चल रही तोड़ फोड़ के बीच टूटे विग्रहों को बचाए जाने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मंदिर विकास समिति से जुड़े लोग इस विस्तारीकरण के फायदे गिनाने से नहीं चूक रहे. सोशल मीडिया पर दोनों ने ही अपने-अपने पेज के माध्यम से जबानी विरोधाभास को जमकर परिभाषित किया है और अब तो मामला व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप तक भी पहुंच गया है.

इन तमाम गतिविधियों के बीच नगर के दैनिक दर्शनार्थी और नेमी इस बात को लेकर आस्वस्त हैं कि बाबा विश्वनाथ जल्द ही किसी न किसी माध्यम से अपना सब कुछ ठीक कर लेंगे. मंदिर के विस्तार का ब्लूप्रिंट भले ही अब तक सामने न आ पाया हो लेकिन मंदिर के बहाने कई राजनीतिक ब्लूप्रिंट कई खेमों में तैयार हो रहे हैं. देखना होगा कि हिंदुत्व की पैरोकार मानी जा रही प्रदेश और केंद्र की सरकार काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर अगला कदम क्या और कब उठाती है लेकिन तब तक नगर की स्थिति 'फिर बैतलवा उसी डाल पर' वाली अवस्था में यथावत रहेगी.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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