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जरूरी नहीं कि पति शारीरिक जबरदस्ती करे, तभी वो मैरिटल रेप होगा: दिल्ली HC

कोर्ट ने कहा कि शादी होने का मतलब ये नहीं कि पत्नी अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए हमेशा तैयार और सहमत है

Updated On: Jul 18, 2018 09:57 AM IST

FP Staff

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जरूरी नहीं कि पति शारीरिक जबरदस्ती करे, तभी वो मैरिटल रेप होगा: दिल्ली HC

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मैरिटल रेप पर एक अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि शादी होने का मतलब ये नहीं कि पत्नी अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए हमेशा तैयार और सहमत है. कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया कि मैरिटल रेप में अगर जबरदस्ती की जाए, तभी वो रेप है. कोर्ट ने कहा कि ये ब्लैकमेल करके या पैसों की दिक्कत पैदा करके भी की जा सकती है.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस सी हरिशंकर ने एक एनजीओ मेन वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से दाखिल की गई याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की. पुरुषों की ओर से चलाए जा रहे इस एनजीओ ने अपनी याचिका में कहा था कि शादीशुदा महिलाओं को कानून में पति की ओर से किए जाने वाली हिंसा के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा मिली हुई है. एनजीओ ने ये भी दावा किया था कि पति की ओर से की गई हिंसा में जबरदस्ती या धमकी हो, तभी वो इस श्रेणी में आएगा.

इस पर बेंच ने गुस्से में कहा, 'रेप रेप होता है. ऐसा कैसे हो सकता है कि अगर आप शादीशुदा नहीं है और आपके साथ जबरदस्ती होती है तो वो रेप है. लेकिन अगर आप शादीशुदा है तो जबरदस्ती रेप नहीं है, वाजिब है? धारा 375 में ये अपवाद क्यों होना चाहिए? रेप में जबरदस्ती पहली शर्त नहीं है.'

आईपीसी की धारा 375 में अपवाद है कि पति का अपनी पत्नी के साथ, जिसकी उम्र 15 साल से ज्यादा हो, कोई भी सेक्सुअल एक्ट रेप नहीं है.

लेकिन कोर्ट ने कहा, 'आज के वक्त में रेप की परिभाषा पूरी तरह बदल गई है. पति की ओर से किए गए रेप में जबरदस्ती होती है, ये एक मिथ है. पत्नी को ब्लैकमेल करके या कमजोर आर्थिक स्थिति में डालकर भी ऐसा किया जा सकता है. इसके अलावा बच्चे पैदा करने के लिए या घर की बाकी जरूरतों के नाम पर पत्नी से समर्पण करवाया जाता है.'

कोर्ट एनजीओ आरईटी फाउंडेशन और ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमंस एसोसिएशन की ओर से दाखिल मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था. मेन वेलफेयर ट्रस्ट एनजीओ ने इस याचिका का विरोध किया था. एनजीओ का कहना था कि पति का अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना रेप नहीं है. ये असंवैधानिक नहीं है और इसके खिलाफ फैसला देना अन्याय होगा.

एनजीओ की ओर से पेश हुए अमित लखानी और रित्विक बिसारिया ने दलील दी कि पत्नी को मौजूदा कानूनों के तहत शादी में यौन हिंसा से संरक्षण मिला हुआ है. इस पर अदालत ने कहा कि अगर अन्य कानूनों में यह शामिल है तो आईपीसी की धारा 375 में अपवाद क्यों होना चाहिए. इस धारा के अनुसार किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं हैं.

अदालत ने कहा, ‘बल का इस्तेमाल बलात्कार की पूर्व शर्त नहीं है. अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को वित्तीय दबाव में रखता है और कहता है कि अगर वह उसके साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाएगी तो वह उसे घर खर्च और बच्चों के खर्च के लिए रुपए नहीं देगा और उसे इस धमकी के कारण ऐसा करना पड़ता है. बाद में वह पति के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करती है तो क्या होगा?’

इस याचिका पर अगली सुनवाई आठ अगस्त को होगी.

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