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मराठवाड़ा डायरी: 10 महीने बाद भी किसानों को सता रहा है नोटबंदी का भूत

दिल्ली-मुंबई में बैठकर कैशलेस होने की बात करना अच्छा लगता है मराठवाड़ा के गांवों में ऐसा मुमकिन नहीं

Parth MN Updated On: Sep 17, 2017 10:19 AM IST

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मराठवाड़ा डायरी: 10 महीने बाद भी किसानों को सता रहा है नोटबंदी का भूत

(संपादकीय: पार्थ एम.एन. इस वक्त महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके का दौरा कर रहे हैं. वो रूरल इंडिया फेलोशिप के तहत पीपुल्स आर्काइव इकट्ठा कर रहे हैं. इसका मकसद इलाके में खेती के संकट पर रिसर्च करना है. यह काम छह से आठ महीने में पूरा होना है. फ़र्स्टपोस्ट में हम पार्थ की रिपोर्ट प्रकाशित करेंगे.)

नोटबंदी के दस महीने बाद भी दीपक बडावने उसके भूत से जूझ रहे हैं. 8 नवंबर 2016 को सरकार ने 500 और 1000 के नोट बंद करने का फैसला किया था. उस वक्त बडावने ने 31 क्विंटल कपास की फसल अपनी 2.5 एकड़ की जमीन पर उपजाई थी. दीपक को उम्मीद थी कि उन्हें इसकी अच्छी कीमत मिलेगी. व्यापारी ने खुद ट्रक का इंतजाम किया और कपास को दीपक के घर से ले गया. लेकिन, ठीक उसी वक्त नोटबंदी का फैसला हो गया. और नकदी पर चलने वाली हमारे देश की खेती पर उसकी सबसे ज्यादा मार पड़ी.

दीपक को अपनी फसल की कीमत नहीं मिली. कारोबारी अब कह रहा है कि वो दिवाली तक पैसे देगा. मतलब अगले महीने तक. दीपक, महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले का रहने वाला है. दीपक के गांव कराजगांव ही नहीं आस-पास के कमोबेश सभी गांवों के किसानों का यही हाल है. वो पिछले साल बेची गई फसल की कीमत मिलने का अब तक इंतजार कर रहे हैं.

दीपक के एक लाख 78 हजार 483 रुपए व्यापारी के पास पड़े हैं. इस साल 24 मार्च को दीपक को इसका जो चेक मिला था, वो बाउंस हो गया. और ऐसा एक बार नहीं, तीन बार हुआ. दीपक के गांव के कई और किसानों के साथ ऐसा हुआ है.

नकदी की कमी का असर

दीपक बडावने संयुक्त परिवार में रहते हैं. उनके दो बच्चे हैं. उन्होंने 1300 की आबादी वाले गांव के उन किसानों को एकजुट किया है, जो अपनी फसल की कीमत मिलने की बाट जोह रहे हैं. नोटबंदी के छह महीने बाद अप्रैल में दीपक के भाई जीतेंद्र को 34 क्विंटल कपास की कीमत दो लाख रुपए मिली थी. जीतेंद्र का चेक भी बाउंस हो गया था. दीपक पूछते हैं कि अगर पैसे नहीं मिलेंगे तो वो अगली फसल की तैयारी कैसे करेंगे? नई फसल का सीजन मई-जून में ही शुरू हो गया था. मगर फसल की लागत के लिए जरूरी रकम ही दीपक और उनके जैसे दूसरे कई किसानों के पास नहीं है.

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अपने बाउंस हुए चेक के साथ दीपक बडावने (तस्वीर: श्रीरंग स्वर्गे)

जब हम जून महीने में दीपक के गांव गए थे, तो जिस व्यापारी ने किसानों की फसल खरीदी थी, वो गांव छोड़कर चला गया था. वो पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं देना चाहता था. इसीलिए हम उसका नाम इस कहानी में नहीं लिख रहे हैं.

जब नाराज किसानों ने उस कारोबारी के घर पर धावा बोला, तो कारोबारी की मां ने धमकी दी कि अगर उसके बेटे ने खुदकुशी कर ली, तो उसके लिए किसान जिम्मेदार होंगे. दीपक बताते हैं कि कारोबारी का कहना था कि नकदी है ही नहीं, इसीलिए वो किसानों को फसल की कीमत नहीं दे पा रहा है. मगर बुवाई का सीजन भुगतान का इंतजार तो करेगा नहीं. दीपक और दूसरे किसानों ने व्यापारी के खिलाफ करमाड पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करा दी है. उस पर धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए हैं.

औरंगाबाद-जालना हाइवे पर एक गांव है, हसनाबादवाड़ी. यहां के रहने वाले अतुल अंताराई भी नोटबंदी की मार से जूझ रहे हैं. जून महीने में उनके पास भी नकदी की कमी थी. अतुल के पास मौसमी के 1000 पेड़ हैं. पांच एकड़ में फैले इस बाग में उन्होंने एक ट्यूबवेल भी लगवाया है. यानी बाग की सिंचाई का इंतजाम उन्होंने बाकी किसानों के मुकाबले बेहतर तरीके से किया है.

नोटबंदी की वजह से नहीं मिली फसल की सही कीमत

पिछले साल नवंबर में एक व्यापारी अतुल के पास आया. उसने मौसमी की पूरी फसल के लिए अतुल को 6.5 लाख रुपए का ऑफर दिया. अतुल ने सोचा था कि वो फरवरी में मौसम को बाजार में बेचेंगे. अगर एक किलो मौसमी की कीमत 30 से 35 रुपए किलो भी मिली, तो उन्हें दस लाख रुपए की आमदनी की उम्मीद थी. इसीलिए अतुल ने कारोबारी को टाल दिया.

लेकिन 8 नवंबर को नोटबंदी के एलान के बाद उस कारोबारी के पास भी नकद रकम नहीं थी. इसके बाद मौसमी की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. अतुल बताते हैं कि जो फसल उन्हें दस लाख रुपए में बिकने की उम्मीद थी, आखिर में उसके महज सवा लाख रुपए मिले. यानी उन्हें 30-35 के बजाय मौसमी केवल तीन रुपए किलो के हिसाब से बेचनी पड़ी.

मराठवाड़ा में हर साल फसलों की खरीद-फरोख्त नकद में होती है. अगर कपास और मौसमी जैसी फसलों की रकम ज्यादा होती है, तो उसमें अदला-बदली से कारोबार होता है. इसी वजह से नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर मौसमी और कपास के किसानों पर पड़ा है. मराठवाड़ा के किसानों के लिए नवंबर का महीना कपास की फसल काटने का होता है. वहीं मौसमी की फसल कुछ महीनों बाद तैयार होती है, यानी फरवरी-मार्च में. मौसमी का दूसरा सीजन अगस्त-सितंबर में आता है.

मगर नोटबंदी के बाद कीमतों में भारी गिरावट आ गई. कारोबारियों के पास किसानों को देने के लिए पैसे ही नहीं थे. नोटबंदी के बाद जिस कैशलेस अर्थव्यवस्था का वादा किया गया था, वो सपना अब तक अधूरा ही है. किसान कहते हैं कि ये तो अभी सपना ही रहने वाला है. बीड जिले के अंजनवती गांव के किसान अशोक येड़े कहते हैं कि ज्यादातर एटीएम शहरों में लगे हैं. एटीएम या बैंक जाने के लिए गांव के लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. अशोक, सोयाबीन और ज्वार की खेती करते हैं.

गांवों के लिए दूर की कौड़ी है कैशलेस इकनॉमी

ग्रामीण इलाकों में एटीम गिने-चुने ही हैं. और वो लंबे फासले पर भी हैं. रिजर्व बैंक के आंकड़े के मुताबिक जून 2017 में पूरे देश में दो लाख 22 हजार 762 एटीएम थे. इनमें से केवल 40 हजार 997 ग्रामीण इलाकों में हैं. इसका मतलब ये है कि देश के कुल एटीएम का बीस फीसदी से भी कम हिस्सा गांवों में है. जबकि देश की 69 फीसदी आबादी गांवों में ही रहती है.

ऑल इंडिया बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन के संयुक्त सचिव देवीदास तुलजापुरकर कहते हैं कि गांवों में एटीएम अक्सर कैश की कमी से जूझते हैं क्योंकि शहरों में तो एटीएम में रकम जल्दी-जल्दी डाल दी जाती है. मगर ग्रामीण इलाकों में ऐसा नहीं होता. इसलिए गांव के एटीएम पूरी क्षमता से काम भी नहीं करते.

अशोक येड़े ये भी कहते हैं कि ऑनलाइन लेन-देन महंगा पड़ता है. हर लेन-देन के लिए ज्यादा पैसे देना किसानों के बस की बात नहीं. अशोक कहते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था नकदी से ही चलती है. वो कहते हैं कि हम किसी मजदूर को 250 रुपए पेटीएम नहीं कर सकते. किसानों को अक्सर नकद रकम मिलती है. इससे वो खेती के लिए जरूरी सामान या चारा वगैरह खरीद लेते हैं. ग्रामीण भारत आज भी नकदी पर ही चलता है.

पिछले साल नोटबंदी के बाद ग्रामीण इलाकों में स्थित बैंकों को सबसे आखिर में नकदी यानी नए नोट पहुंचाए गए. जिला सहकारी बैंकों में जो पुराने नोट जमा कराए गए थे, उन्हें रिजर्व बैंक ने कई महीनों तक वापस ही नहीं लिया. ज्यादातर किसानों के खाते सहकारी बैंकों में हैं. लातूर जिला सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक हनुमंत जाधव कहते हैं कि 7-8 महीनों तक नकदी का संकट बना रहा था. जिला सहकारी बैंकों के पास नकदी की भारी कमी थी. सारे एटीएम खाली पड़े थे.

कराजगांव के किसान कहते हैं कि कैशलेस अर्थव्यवस्था का पूरा जोर शहरी इलाकों पर है. जबकि ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है. दीपक कहते हैं कि हमें जिस दिन पैसे मिलते हैं, हम उसी दिन उसका इस्तेमाल जरूरी चीजें खरीदने में कर डालते हैं. अब हर रोज हम बैंक जाकर पैसे निकालने लगें तो इसमें बहुत सारा वक्त और पैसा खर्च हो जाएगा. दीपक कहते हैं कि दिल्ली-मुंबई में बैठकर कैशलेस होने की बात करना अच्छा लगता है. यहां गांव में ऐसा मुमकिन नहीं.

दीपक अब तक पिछले साल लिया हुआ कर्ज नहीं चुका पाए हैं. करमाड स्थित बैंक ऑफ महाराष्ट्र से दीपक ने डेढ़ लाख रुपए कर्ज लिया हुआ है. वो हर साल कुछ न कुछ रकम बैंक को चुका देते हैं. इसीलिए उन्हें नया फसली कर्ज मिल जाता था. मगर इस बार वो पैसे बैंक को नहीं दे पाए. डिफॉल्टर होने की वजह से उन्हें कर्ज नहीं मिला.

मजबूरी में इस बार दीपक ने एक साहूकार से दो लाख चालीस हजार रुपए 3 फीसदी हर महीने ब्याज की दर पर कर्ज लिया है. दीपक के ऊपर पहले से ही साहूकार का दो लाख रुपए का कर्ज है. दीपक ने कर्ज की रकम का इस्तेमाल खरीफ की फसल की बुवाई में किया है. उन्होंने कुछ पैसा बैंक का कर्ज चुकाने में भी खर्च किया है. अब उनकी फिक्र बढ़ गई है. इस बार बारिश अच्छी नहीं हुई है. इसलिए अच्छी फसल की उम्मीद भी नहीं.

वहीं हसनाबादवाड़ी गांव में अतुल भी परेशान हैं. उन्हें लग रहा है कि मौसमी के बाग को काटकर हटाना होगा. कुआं सूख गया है. बारिश नहीं होने से फसल भी अच्छी नहीं दिख रही है. नोटबंदी के बाद उनकी काफी रकम डूब गई थी. इसलिए वो मौसमी के बाग को सींचने के लिए पानी खरीदने का जुगाड़ भी नहीं कर पा रहे हैं.

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