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आरक्षण की आग : मराठाओं को OBC कैटेगरी में क्यों नहीं शामिल करना चाहिए

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के पीछे एक बड़ी राजनीति भी काम कर रही है. 30 फीसदी आबादी को सत्तर फीसदी आबादी के सामने खड़ा करने की राजनीति.

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jul 27, 2018 07:09 PM IST

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आरक्षण की आग : मराठाओं को OBC कैटेगरी में क्यों नहीं शामिल करना चाहिए

आरक्षण को लेकर एक दिलचस्प बात कही जाती है कि रिजर्वेशन उस चलती रेलगाड़ी की तरह है, जिसके बाहर खड़ा हर शख्स चाहता है कि वो भीतर दाखिल हो जाए और उसके भीतर बैठा हर आदमी चाहता है कि किसी भी तरह से बाहर का आदमी नहीं घुसने पाए. आरक्षण रूपी रेलगाड़ी के सवारियों और सवारी बनने की इच्छा रखने वालों का ये द्वंद्व वर्षों से चला आ रहा है. यहां तक कि पिछले कुछ वर्षों में बाहर खड़े लोगों की रेलगाड़ी के भीतर आने की उत्कंठा ज्यादा तेजी से बढ़ी है.

हरियाणा के जाट, गुजरात के पटेल, राजस्थान के गुर्जर और महाराष्ट्र के मराठा, सबको जल्दी है कि किसी भी तरह से उस चलती हुई रेलगाड़ी में सवार हो जाया जाए. सवाल है कि आखिर रेलगाड़ी भी कितनी सवारियों को ढोए. महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर जो आग लगी है, उसने इस सवाल पर संचीदा होकर सोचने को मजबूर कर दिया है.

महाराष्ट्र का मराठा समुदाय पिछले काफी वक्त से अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है. पहले मराठाओं की मांग थी कि उन्हें सरकारी नौकरियों और स्कूल कॉलेजों में 16 फीसदी आरक्षण दिया जाए. कांग्रेस के शासनकाल में मराठा आरक्षण को लेकर एक बिल भी पास कर दिया गया. लेकिन उसके बाद महाराष्ट्र में 50 फीसदी आरक्षण की संवैधानिक लिमिट पार कर गई. मामला कोर्ट में पहुंचा और वहीं अटक गया.

devendra fadnavis

पिछले दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी ऐलान किया था कि महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. उनके ऐलान के बाद मराठा समुदाय अपनी मांग को लेकर एक बार फिर से मुखर हो उठे. अब तक शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहा मराठा समुदाय उग्र हो उठा. इस समुदाय के लोगों को लगा कि ये सही वक्त है अपनी मांग मंगवाने का. इसलिए विरोध प्रदर्शन में अचानक से तेजी आ गई.

मराठा आरक्षण को लेकर कई छोटे-छोटे संगठन बन गए हैं. सभी अपने अपने इलाकों में आरक्षण की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए. औरंगाबाद में एक युवक ने गोदावरी नदी में जल समाधि ले ली. मंगलवार को भी कुछ युवकों ने सुसाइड की कोशिश की. बुधवार सुबह आरक्षण की मांग को लेकर जहर खाने वाले एक युवक की मौत हो गई. बुधवार को ही मुंबई बंद के दौरान कई जगहों पर बसों को जला दिया गया. ट्रेनें रोकी गईं. महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई कि वो इन विरोध प्रदर्शन से कैसे निपटे. हालांकि बाद में बंद को वापस ले लिया गया.

मराठा आरक्षण को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. आखिर जाट, पटेल, गुर्जर और मराठा जैसी जातियों के आरक्षण की मांग का उपाय क्या हो? हर बार नई जातियों की तरफ से आरक्षण की मांग क्यों उठ रही है? क्या आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में इन जातियों को समायोजित करने से दलित और पिछड़ी जातियों के साथ नाइंसाफी नहीं होगी? एक तरफ जहां आरक्षण वाली व्यवस्था की समीक्षा की बात उठ रही है, वहीं बाकी जनरल कास्ट की तरफ से आरक्षण पाने की रोज उठती मांग से कैसे निपटा जाए?

महाराष्ट्र में पिछले 10 साल से मराठा अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं. जब उन्हें लगने लगा कि संविधान में आरक्षण की व्यवस्था को देखते हुए मराठाओं को अलग से आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो उन्होंने अब खुद को ओबीसी कैटेगरी में रखने की मांग कर दी है. इसी मांग को लेकर इस बार महाराष्ट्र के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए.

महाराष्ट्र में मराठा कोई कमजोर जाति नहीं है. इस जाति के ज्यादातर लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं. राजनीति में इनका अच्छा खासा दखल है. 1960 में जब अलग महाराष्ट्र राज्य बना तब से लेकर अब तक 12 मराठा मुख्यमंत्री बन चुके हैं. इन्हें राज्य की दबंग जातियों में गिना जाता रहा है. फिर भी ये अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग को मंगलवार से शुरू हुआ मराठा क्रांति मोर्चा का आंदोलन बुधवार को भी जारी है. इसमें मराठा मोर्चा ने मुंबई बंद का ऐलान किया है

मशहूर लेखक और समाजशास्त्री सुभाष गताड़े कहते हैं, ये लोग जाट, पटेल और गुर्जरों की ही तरह अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं. ये लोग बैकवर्ड क्लास में नहीं आते. एक तो वो सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े नहीं हैं. आबादी के हिसाब से और लैड होल्डिंग के मामले में वो ठीक-ठाक हैं. राजनीति में मराठा का खासा दखल है. इस तरह की मांग आरक्षण की मूल भावना को खत्म करने वाली है. जिस तरह से दिन ब दिन सारी जातियां आरक्षण की मांग को लेकर सामने आ रही हैं. उससे आरक्षण के मकसद को चोट पहुंच रही है.

महाराष्ट्र में पिछड़ा वर्ग आयोग मराठाओं के सामाजिक आर्थिक हैसियत का अध्ययन कर रहा है. अभी तक इस मसले पर आयोग की कोई रिपोर्ट नहीं आई है. मराठा समुदाय चाहता है कि बिना रिपोर्ट आए सरकार विधानसभा में बिल लाकर मराठाओं को ओबीसी कैटेगरी में डाल दे.

महाराष्ट्र की आबादी में मराठाओं का हिस्सा करीब 30 फीसदी का है. ये समुदाय अपने पिछड़ेपन का हवाला देते हुए कहता है कि कुछ लोगों के मुख्यमंत्री या ऊंचे पदों पर जाने से पूरे समुदाय को पिछड़ेपन से निजात नहीं मिल जाती. इन लोगों का कहना है कि सदियों से हमारे साथ अन्याय हुआ है और इसकी भरपाई आरक्षण के जरिए ही की जा सकती है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सुबोध कुमार कहते हैं कि ओबीसी कैटेगरी में आने की मांग करने वाली इन जातियों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत इतनी पिछड़ी नहीं है कि उन्हें इस कैटेगरी में रखा जाए. इसलिए मंडल कमिशन के वक्त इन जातियों को ओबीसी के दायरे से बाहर रखा था. लेकिन 91 के उदारीकरण के बाद अब बदले हालात में ये लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं. दरअसल इन लोगों को लगता है कि आरक्षण का फॉर्मूला जादू की उस झप्पी की तरह है जिसके मिलते ही उनकी सारी समस्या खत्म हो जाएगी.

वो कहते हैं कि मराठाओं की तरह आरक्षण की मांग करने वाली ज्यादातर जातियां खेती किसानी से जुड़ी हैं. भारत कृषिप्रधान देश है. लेकिन 1991 में जो नई इकोनॉमिक पॉलिसी आई उसने छोटे और मंझोले उद्योगों को खत्म कर दिया. किसानी भी फायदे का पेशा नहीं रह गया और अब धीरे-धीरे ये खत्म हो रही है. इसलिए लोगों को लगता है कि आरक्षण के जरिए ही वो अपनी लाइफ को सिक्योर कर सकते हैं. दरअसल उसी सिक्योरिटी की चाह में आरक्षण की मांग की जा रही है.

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक

मराठा किसानों की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है. ऐसा कहा जाता है कि महाराष्ट्र में खुदकुशी करने वाले किसानों में 90 फीसदी किसान मराठा जाति से थे. हालांकि जातिगत आधार पर ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है. लेकिन मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की हालत दयनीय है. मराठाओं को लगता है कि इनकी स्थिति आरक्षण मिलने से सुधर जाएगी. इसलिए विरोध प्रदर्शन में तेजी आई है.

सवाल है कि क्या इसे मराठा आंदोलन का नाम दिया जा सकता है. जैसा कि कई जगहों पर लिखा जा रहा है. डॉ सुबोध कहते हैं कि ये कोई क्रांति नहीं है. किसी क्रांति के तहत आरक्षण नहीं मांगा जा रहा है. जैसा कि दलितों के आंदोलन के साथ हुआ या मंडल कमीशन के वक्त क्रांति के तहत ओबीसी वर्ग को आरक्षण मिला. ये सब एस्पिरेशन यानी आकांक्षा के तहत हो रहा है. ये फेलिअर की वजह से हुआ है. जॉब क्रिएशन, नए युवाओं के एकोमोडेशन में सरकारें फेलिअर रही हैं. जिसकी वजह से ये आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

गुर्जर अपने आपको एससी कैटेगरी में लाना चाहते हैं. जाट जो सेंट्रल लिस्ट में ओबीसी में नहीं आते हैं वो ओबीसी का आरक्षण लेना चाहते हैं. गुजरात में पटेल ओबीसी में आना चाहते हैं. महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण लेना चाहते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर ये 4-5 आंदोलन चल रहे हैं. इन लोगों को लगता है कि आरक्षण ही आखिरी विकल्प बचा है. इसी से उनकी समस्या का समाधान होगा.

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के पीछे एक बड़ी राजनीति भी काम कर रही है. 30 फीसदी आबादी को सत्तर फीसदी आबादी के सामने खड़ा करने की राजनीति. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय में महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की राजनीति को आगे करके बीजेपी बाकी जातियों को अपने समर्थन में गोलबंद करना चाहती है. मराठा समुदाय को बीजेपी का सपोर्टर नहीं माना जाता है. मराठा वोटबैंक पर सबसे ज्यादा एनसीपी का असर है. एक एंगल ये भी दिया जा रहा है कि मराठा आरक्षण के खिलाफ गैर मराठा जातियां बीजेपी के साथ आएंगी.

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