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कैंसर पीड़ित माओवादी कोबाड से क्यों डर गई सरकार?

8 साल से जेल में रह रहे कोबाड को गुर्दे की बीमारी, प्रोस्ट्रेट कैंसर, उच्च रक्तचाप, पीठ की समस्या सहित हृदय की बीमारी भी हो गई थी. वो जेल में कई महीनों से बीमार थे

Anand Dutta Updated On: Dec 18, 2017 08:17 AM IST

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कैंसर पीड़ित माओवादी कोबाड से क्यों डर गई सरकार?

मैं ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता, जो गरीबों की इज्जत करना नहीं जानता. ये डायलॉग दिवंगत अभिनेता ओमपुरी ने फिल्म चक्रव्यूह में कहा था. ये बाद में बताऊंगा कि यहां इस बात का जिक्र क्यों किया जा रहा है? फिलहाल देशभर में माओवादी हिंसा को खत्म करने के लिए आखिरी चोट की तैयारी जोरों पर है. छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बंगाल, बिहार, आंध्र, तेलंगाना, महाराष्ट्र जैसे राज्यों की पुलिस एक साथ मिलकर काम कर रही है. योजना बनाने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने में लगे हैं विरप्पन को खत्म करनेवाले पूर्व आईपीएस के. विजय कुमार.

इस बीच लगभग नौ साल के बाद सीपीआई (एम) के टॉप थिंकर और पोलित ब्यूरो के सदस्य कोबाद घंडी को विशाखापटनम सेंट्रल जेल से मंगलवार शाम को रिहा कर दिया गया. कोबाड घंडी (71) को उन पर चल रहे छह बड़े मामलों में जमानत मिलने के बाद रिहा किया गया है.

रिहा होने के बाद वो मुंबई स्थित अपने घर जाने की तैयारी में थे. इस बीच हैदराबाद में अपने पसंद का खाना खाया. आराम करने के बाद इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों से बात की. कहा- 'आई एम बैडली मिसिंग पारसी फूड.' तभी उनके दरवाजे पर झारखंड के बोकारो जिले की पुलिस गिरफ्तारी वारंट लेकर पहुंच गई.

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इस रिहाई को वो सही से समझ भी नहीं पाए थे कि उन्हें दो मामलों में आरोपी बता तत्काल गिरफ्तार कर लिया. बोकारो एसपी कार्तिक एस. ने एक विशेष टीम भेजकर हैदराबाद से गिरफ्तार करवा लिया. कुछ देर पहले पत्रकारों संग हुई बातचीत में उन्होंने शंका जाहिर की थी कि विभिन्न राज्यों में उनपर कई और मामले हैं. हो सकता है पुलिस अब इन्हें खोले, हुआ भी वही. ऐसे में सवाल ये उठता है कि कैंसर सहित कई अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे इस थिंक टैंक से सरकार इतना डर क्यों रही है?

गंभीर बीमारी के बावजूद संगठन खड़ा करने का है माद्दा 

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत नक्सल मैनेजमेंट डिविजन काम करता है. वो देशभर के नक्सल मामलों की निगरानी करता है. पूरी कोशिश रहती है कि अगर कोई बड़ा नक्सल सरकार की पकड़ में है तो वो किसी भी कीमत पर बाहर नहीं जा सके. पुख्ता करने के लिए लिए बता दूं कि कोबाड के रिहा होने से पहले ही झारखंड पुलिस हैदराबाद पहुंच चुकी थी.

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ऐसा ही कुछ हाल के वर्षों में नारायण सान्याल के साथ हुआ. वहीं बीते समय में टॉप माओवादी सुशील राय के साथ पुलिस ने ऐसा ही व्यवहार किया था. 86 साल की उम्र में उनपर हथियार लूटने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया. अंत में वो खून की उल्टी करते हुए एम्स में मर गए.

सलाम बस्तर नामक किताब लिख चुके पत्रकार राहुल पंडिता कहते हैं कि भारत में नक्सली हिंसा अपने अंतिम दौर में है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता. मैं खात्मे की बात नहीं कर रहा हूं. ऐसे में कोई भी सरकार ये नहीं चाहेगी कि कोबाद जैसे महत्वपूर्ण आदमी को बाहर रहने दिया जाए. जो बीमारी के बावजूद भी संगठन को खड़ा करने का माद्दा रखता हो. चूंकि कोबाड सेंट्रल कमेटी के पुराने आदमी हैं, ऐसे में उनका बाहर होना पूरे आंदोलन, गिरते सिस्टम के लिए किसी रामबाण से कम नहीं होगा.

बोकारो के एसपी कार्तिक एस के मुताबिक वर्ष 2006 और 2007 में हुए दो बड़े नक्सली हमले में इसकी संलिप्तता थी. वर्ष 2006 में नावाडीह के कंचकिरो में हुए लैंड माइंस विस्फोट में 14 पुलिस कर्मी शहीद हुए थे. साथ ही इसी साल खासमहल सीआइएसएफ बैरक पर नक्सलियों ने हमला कर दो सीआइएसएफ के जवानों की हत्या कर दी थी.

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दोनों मामले में पुलिस अनुसंधान के दौरान नक्सली संगठन के इस शीर्ष थिंक टैंक का नाम सामने आया था. झारखंड पुलिस के मुताबिक कोबाड को अरविंद, उर्फ सलीम, उर्फ राजन, उर्फ किशोर, उर्फ सुमन, उर्फ गुप्ता, उर्फ अकबर के नाम से भी जानते हैं. उन्होंने बताया कि ऐसा नहीं है कि आंध्र प्रदेश में रिहा होने के साथ ही झारखंड पुलिस पहले से तैयारी करके वहां पहुंची थी. झारखंड तो पहले से कोबाड का कस्टडी मांग रही थी. अभी जाकर मिला है. फिलहाल उनसे किसी तरह की पूछताछ नहीं की गई है.

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कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित, फिर भी सरकार के लिए खतरा 

बताया जा रहा है कि लंबी जेल यात्रा करने वाले कोबाड घंडी कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं. 8 साल से जेल में रह रहे कोबाड को गुर्दे की बीमारी, प्रोस्ट्रेट कैंसर, उच्च रक्तचाप, पीठ की समस्या सहित हृदय की बीमारी भी हो गई थी. वो जेल में कई महीनों से बीमार थे. बावजूद इसके बोकारो पुलिस को विश्वास है कि वो नक्सली संगठन से जुड़े कई राज उगलवा पाने में कामयाब होगी.

कोबाड को साल 2009 में 20 सितंबर को आंध्र प्रदेश पुलिस और दिल्ली पुलिस के विशेष दल ने गिरफ्तार किया था. इसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल समेत कई जेलों में रखा जा चुका है.

झारखंड पुलिस के प्रवक्ता एडीजी आर. के. मल्लिक ने कहा कि कोबाड पुलिस की गिरफ्त में नहीं हैं. वो ज्यूडिशियल कस्टडी में हैं. ये बात सही है कि उन्हें तत्काल मेडिकल सुविधाओं की जररूत है, डॉक्टर ने बेड रेस्ट को कहा है. अब उन्हें क्या मिलेगा क्या नहीं, ये तो कोर्ट तय करेगी.

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जहां तक सवाल है झारखंड पुलिस के लिए वो कितने घातक साबित हो सकते हैं, तो ये केवल झारखंड पुलिस का मसला नहीं है. देश के कानून के मुताबिक वो वांटेड हैं. लॉ ऑफ दी लैंड से तय होगा कि उनके साथ क्या होना है. फिलहाल वो झारखंड के तेनूघाट जेल में हैं.

इन मामलों में है आरोप 

साल 2008 में ग्रेहाउंड कमांडोज टीम हमले के मुख्य आरोपी, 2005 में पूर्व कांग्रेस विधायक सी. नरसी रेड्डी की हत्या के मामले में जेल. आंध्र प्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष, डी. श्रीपाद राव की 1999 में हुई हत्या में भी आरोपी हैं. उनके खिलाफ अधिकांश मामले विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और अवैध गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज थे. ध्यान देनेवाली बात ये है कि आंध्र प्रदेश में पुलिस उनके खिलाफ एक भी मामलों में चार्जशीट दर्ज करने में विफल रही. उन्हें जून, 2016 में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट ने आतंक के आरोपों से भी बरी कर दिया गया था.

चक्रव्यूह में ओमपुरी निभा चुके हैं कोबाड का किरदार 

कोबाड घंडी ने देहरादून के दून स्कूल से पढ़ाई करने के बाद एलफिस्टन कॉलेज मुंबई में उच्च शिक्षा प्राप्त की है. 1960 के दशक के अंत में वो माओवादी विचारधारा से जुड़े. वहीं कोबाद की पत्नी अनुराधा शानबाग उर्फ अनुराधा घंडी के मरने से पहले बीमारी के वक्त उनके साथ रहे एक पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि अनुराधा तो हार्डकोर नक्सली थी. जबकि कोबाड ने आज तक कभी हथियार नहीं उठाया है. कभी अंडरग्राउंड नहीं रहे. अनुराधा मजाक में कहती भी थी कि कोबाड एकेडमिक माओवादी है. वो ग्लोबल इकॉनोमिस्ट है.

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चक्रव्यूह में दरअसल ओमपुरी कोबाड का किरदार ही निभा रहे थे. फिल्म में कहते हैं 'सुना था हमने भी कि आजादी मिल गई, स्वराज आ गया देश में, 60-62 साल हो गए, लाल किला दिल्ली से चला था, पता नहीं कहां भटक गया, बहुत खोजा हमने, चप्पा-चप्पा छान मारा, दफेदार का नाका, पुलिस की चौकी, बीडीओ का दफ्तर, कहीं नहीं दिखा, मालूम नहीं कैसा दिखता है वो, भईया अगर आप लगों को कहीं दिखे तो हमारे गांव लेकर आना, दर्शन तो कर लें एक बार....' ये डायलॉग कोबाड के व्यक्तित्व को बताता है.

लेखनी से पहले भी डरी है सरकार, फिर उसी डर से किया गिरफ्तार 

नक्सली मामलों के जानकार हिमांशु कुमार कहते हैं कि ये तो अलग बात है कि वो बीमार हैं. मानवीय आधार पर सोचा जाना चाहिए. महत्वपूर्ण ये है कि पुलिस ने जिस तरीके से गिरफ्तार किया है वो गलत हैं. सारे मामले एक साथ चलते है. एक साथ सजा होती है. एक के बाद एक नहीं.

झारखंड पुलिस पहलो क्यों नहीं गई? ऐसा नहीं होता है कि एक मामले में दस साल सजा काट लेने पर फिर दूसरे मामले में दस साल की सजा हो. वो मामला अलग से चलेगा. सब एक साथ चलते हैं. गैर कानूनी है यह. कोर्ट ने ज्यूडिशियल रिमांड दिया है, वो उसकी शराफत है, इस वक्त कोर्ट जिस तरीके से राजनीतिक फैसले दे रही है, उसमें ये राहत की बात जरूर है.

हिमांशू आगे कहते हैं ये तो कोई कल्पाना भी नहीं कर सकता कि वो फिर से अंडरग्राउंड होंगे. बाहर रहते तो सरकार को मुश्किल में डाल देते. सरकार अंडरग्राउंड एक्शन से ज्यादा विचार से डरती है. कोबाड बहुत सालों से लिखने पढ़ने का ही काम करते थे. चीजों को एनालइज कर, धारदार लिखते हैं. यही वजह है कि एक मामले में निकलने के साथ दूसरे में गिरफ्तारी की तैयारी पहले कर ली गई.

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