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NREGA: काम करने के बाद भी नहीं मिल रहा मजदूरों को भुगतान

केंद्र सरकार की 100 दिन काम की गारंटी देने वाली योजना मनरेगा की रिपोर्ट. जानिए किस तरह से मजदूरों के काम करने के बाद भी नहीं मिल रही उनकी मजदूरी

FP Staff Updated On: May 22, 2018 02:01 PM IST

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NREGA: काम करने के बाद भी नहीं मिल रहा मजदूरों को भुगतान

42 वर्षीय राम संजीवन प्रजापति ने 2005 में अपने नौ सदस्यों के परिवार के खर्चे चलाने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत काम करना शुरू किया. उनसे वादा किया गया था कि उन्हें हर आठ दिनों में भुगतान किया जाएगा. वह बताते हैं कि, उन्हें पिछले छह महीने से भुगतान नहीं किया गया है और पिछले साल से योजना के तहत काम करने के बाद उनके 2,000 रुपए बकाया हैं.

प्रजापति, जो उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के मावाई गांव में स्थानीय बाजार में मजदूर के रूप में काम करते हैं और अब कर्ज लेने को मजबूर हैं. उन्होंने बताया कि जब वे भुगतान में देरी के लिए अधिकारियों से शिकायत करते हैं, तो उसे काम करते रहने को कहा जाता है. उन्होंने आगे बताया कि अक्सर, दो महीने में केवल पांच दिन का काम होता है और मनरेगा भुगतान से उनकी आय में वृद्धि नहीं हुई है.

देश में लाखों मनरेगा मजदूरों की स्थिति प्रजापति की तरह ही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2018 तक 57 फीसदी मजदूरों को भुगतान नहीं किया गया है.

देरी से मजदूरी, नई बात नहीं

दुनिया का सबसे बड़ा नौकरी गारंटी कार्यक्रम, मनरेगा ग्रामीणों को 100 दिनों के अकुशल काम का वादा करता है. हालांकि, मजदूरी के भुगतान में लगातार देरी हो रही है. धन की कमी, मुआवजे की गलत गणना या प्रक्रियात्मक देरी के कारण कभी-कभी महीनों तक भुगतान नहीं किया जाता है. वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए, मनरेगा के लिए केंद्र सरकार का निधि आवंटन पिछले वर्ष की तुलना में 14.5 फीसदी बढ़कर 55,000 करोड़ रुपये हो गया, जो अब तक का सबसे ज्यादा है. फिर भी, अप्रैल 2018 में भुगतान न किए गए मजदूरी का प्रतिशत 57 फीसदी था.

मनरेगा भुगतान करने की प्रक्रिया

एक फंड ट्रांसफर ऑर्डर (एफटीओ) पहली बार जिला स्तर पर बनाया जाता है, और फिर कामगार के खातों में रुपए भेजने के लिए राज्य स्तर पर जाता है. यह प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रूप से बनाया गया है, जो योजना के तहत सक्रिय श्रमिकों के नाम के साथ इलेक्ट्रॉनिक मस्टर रोल बनाए रखता है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय को भेजे जाने से पहले एफटीओ को दो अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षरित करने की आवश्यकता है. चूंकि बैंक खातों के माध्यम से ट्रांसफर किया जाता है, इसलिए एफटीओ को पहली बार सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस), एक केंद्रीय सरकार ऑनलाइन आवेदन भेजा जाता है जिसके माध्यम से कई सामाजिक सुरक्षा भुगतान किए जाते हैं, और उसके बाद नोडल एमजीएनआरजीए बैंक को भुगतान किया जाता है.

जब एफटीओ लंबित होते हैं, तो इसका मतलब है कि पीएफएमएस ने उन्हें जवाब नहीं दिया है. यह दिखाता है कि सरकार ने अभी तक उन्हें मंजूरी नहीं दी है. एनआरईजीए संघ मोर्चा के बयान के मुताबिक मार्च-अप्रैल 2017 के दौरान 20 दिनों तक लगभग कोई एफटीओ संसाधित नहीं हुआ था, और मई 2017 के दौरान 80 फीसदी संसाधित नहीं किया गया था. हालांकि भुगतान का अब दो हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा अनुमोदन को केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी नहीं दी गई है.

अप्रैल 2018 की शुरुआत में, कुल फंड ट्रांसफर ऑर्डर (एफटीओ) के 99 फीसदी मामले में देरी हुई थी. हालांकि, महीने के अंत तक, केंद्र सरकार ने 10 अप्रैल, 2018 को कोष जारी करने के बाद, अवैतनिक मजदूरी में 42 प्रतिशत की गिरावट सुनिश्चित करने के लिए भुगतान प्रणाली को तोड़ दिया था, फिर भी, 57 फीसदी भुगतान नहीं किया गया है.

हालांकि सरकार ने अक्टूबर 2017 के एक बयान में दावा किया था कि वर्ष 2017-18 के लिए सितंबर, 2017 तक मनरेगा श्रमिकों के 85 फीसदी वेतन का समय से भुगतान किया गया है. हालांकि, एक सर्वे से पता चला है कि यह सच नहीं है. अप्रैल से सितंबर 2017 तक 10 राज्यों में किए गए सर्वे में पाया गया कि 32 फीसदी भुगतान भुगतान समय पर किए गए थे.

मनरेगा मजदूरी भुगतान में देरी एक पुराना मुद्दा रहा है. 19 राज्य सरकारों ने मुख्य रूप से धन की कमी के कारण अक्टूबर 2017 में भुगतान बंद कर दिया था, जो कुछ राज्यों में इसलिए था क्योंकि धन प्राप्त करने के लिए राज्यों की वित्तीय खर्चों की रिपोर्ट समय पर केंद्र सरकार तक नहीं पहुंच पाई थी. जब लेख लिखा गया था, तब केंद्र सरकार के 48,000 करोड़ रुपये के लगभग 85 फीसदी आवंटन पहले से ही खर्च किए जा चुके थे, उस समय 3,066 करोड़ रुपये की मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया था.

12 अप्रैल, 2018 तक, योजनाओं की वेबसाइट से डेटा के अनुसार, इन 19 राज्यों की स्थिति निम्न है:

पश्चिम बंगाल में, जहां सितंबर 2017 से भुगतान नहीं किया गया था, नवंबर 2017 के बाद से 100 फीसदी एफटीओ बकाया थे. फरवरी 2018 के बाद से आठ राज्यों में 100 फीसदी एफटीओ बकाया थे. जनवरी 2018 से असम और केरल में एफटीओ बकाया थे. मार्च 2018 के बाद से छह राज्यों में एफटीओ बकाया थे. मेघालय, मिजोरम और सिक्किम, तीन राज्य जिनके डेटा पहले नहीं थे, मार्च 2018 से एफटीओ बकाया भी थे. 19 राज्यों में से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी भुगतान में देरी हुई थी.

मजदूरी में देरी क्यों ?

इस योजना के प्रावधानों के तहत, मजदूरों को ‘मस्टर रोल’(उपस्थिति रजिस्टर) के बंद होने के 15 दिनों के भीतर मजदूरी मिलनी चाहिए, यानी, उनके काम के तुरंत बाद. यदि ऐसा नहीं होता है, तो वे देरी की पूरी अवधि के लिए, मस्टर रोल बंद होने के 16 वें दिन से प्रति दिन की मजदूरी के 0.05 फीसदी की निश्चित दर पर मुआवजे के हकदार हैं.

सही मायनों में मजदूरों को देरी के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए, जब तक कि उनके किए हुए कामों के दिन की मजदूरी उनके खातों में जमा न हो जाए. हालांकि, मनरेगा की प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस), मस्टर रोल, मजदूरी और भौतिक भुगतान पर रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है, लेकिन केवल ब्लॉक/पंचायत स्तर पर एफटीओ बनाए जाने तक देरी पर विचार करता है (बशर्ते इसे मस्टर रोल के बंद होने के 15 दिन बाद उत्पन्न किया गया हो) और केंद्र सरकार को भेजता है.

उसके बाद वेतन भुगतान में केंद्र सरकार द्वारा देरी को नहीं माना जाता है. इसलिए,मजदूरों को वह पूरा मुआवजा नहीं मिलता है जिसके वे हकदार हैं. यह सर्वे उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, बिहार, कर्नाटक, केरल, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्यों में अप्रैल से सितंबर 2017 तक गया था, जिसमें 4.5 मिलियन खाते शामिल थे. कुल मिलाकर, इन 10 राज्यों में 78 फीसदी भुगतान समय पर नहीं किए गए थे, जबकि 45 फीसदी भुगतान में देरी से भुगतान के मुआवजे शामिल नहीं थे, क्योंकि एफटीओ 15 दिनों के भीतर बने थे.

मनरेगा मजदूरी का समय पर भुगतान प्रतिशत (अप्रैल से सितंबर 2017 तक)

सरकार के दावों और समय पर भुगतान के बीच वास्तव में अंतर छत्तीसगढ़ में है. सरकार ने दावा किया कि 94 फीसदी मजदूरी का भुगतान समय पर किया गया था, जबकि वास्तव में आंकड़े 28 फीसदी थे. पश्चिम बंगाल में, 87 फीसदी के लिए समय पर भुगतान का दावा था लेकिन वास्तव में समय पर केवल 17 फीसदी भुगतान किए गए थे. पांच राज्यों में, 50 फीसदी से अधिक भुगतानों में देरी के बावजूद भुगतान के लिए मुआवजे शामिल नहीं थे.

जब मजदूरों को समय पर पैसे नहीं मिलते है, तो वे आम तौर पर कर्जा लेते हैं, कभी-कभी हालात ये हो जाते हैं कि खाना भी मांग कर खाना होता है. 50 वर्षीय सुखानी बताते हैं कि दो महीने हो गए, हम दूध का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं.” उन्होंने कहा कि मनरेगा से उन्हें 6,000 रुपये मिलने है, और उन्होंने चार महीने पहले काम करना बंद कर दिया था. उन्होंने कहा “हमें खाने तक के लिए मांगना और उधार लेना पड़ता है. हमारे पास चप्पल भी नहीं हैं. अन्य चीजों के लिए अब हमें कर्ज लेना होगा. मैंने खुद 150 रुपये उधार लिए हैं.

केंद्र सरकार को एफटीओ प्राप्त करने के 24 घंटों के भीतर भुगतान की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए. हालांकि, स्टडी में पाया गया, जब एफटीओ 15 दिनों के भीतर बने थे, मजदूरी भुगतान क्रेडिट करने के लिए औसत पर 25 दिन तक लग गए – केंद्र सरकार से राज्यों तक और राज्यों से मजदूरों तक. यह आंकड़े पश्चिम बंगाल के लिए 53 दिन या मध्यप्रदेश के लिए 10 दिन है. सभी देय मुआवजे का भुगतान नहीं किया जाता है, जैसा कि नीचे दिए गए टेबल में दिखाया गया है.

दिए गए मुआवजे में अंतर

  स्टडी में तब तक देरी के लिए मुआवजे की गणना की गई है, जब तक कि काम किए गए दिन का भुगतान श्रमिकों के खातों में जमा नहीं किया जाता. इन अनुमानों से पता चलता है कि एमआईएस वास्तव में 86 फीसदी मुआवजे में चूक गया है. केरल में, 98 फीसदी मुआवजे की गणना नहीं की गई थी। पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में, 90 फीसदी से अधिक मुआवजा देय थे.

कुल मिलाकर, स्टडी का अनुमान है कि अप्रैल-सितंबर 2017 के दौरान मुआवजे के रूप में 7.52 करोड़ रुपये भुगतान किया जाना चाहिए था, लेकिन वास्तव में केवल 1.03 करोड़ (14 फीसदी) का भुगतान किया गया था.

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 4 अप्रैल, 2018 को कहा कि उसने वेतन भुगतान की समयबद्धता में सुधार किया है इसलिए 2016-17 में समय पर चुकाई गई मजदूरी 17 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 43 फीसदी हुई है. और यह माना कि मजदूरी भुगतान में अधिक देरी (57 फीसदी) 2017-18 में हुई थी.

धन की कमी, नई प्रक्रिया, आधार कार्ड का लिंक ना होना देरी का कारण

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के निवासी राम नरेश ने 11 साल पहले मनरेगा के तहत काम करना शुरू किया था, मतलब तब जब यह शुरू हुआ था हालांकि, मई 2016 से मनरेगा के तहत उनके पास कोई काम नहीं है. उन्होंने बताया कि, 100 दिन के काम के वादे के बाद भी उन्हें एक महीने या 15 दिन का काम मिलता है. वह मनरेगा में मजुदुरी के साथ-साथ और जगह भी अस्थाई मजदूरी को भी करते रहे हैं. कभी-कभी काम के लिए उन्हें 6 किमी तक जाना पड़ता है. जबकि वह अपने मनरेगा के पैसों के भुगतान के लिए इंतजार कर रहा है, उसे अपने चार बच्चों को खिलाने के लिए उधार लेना पड़ता है.

नरेश ने बताया, “मैंने 2016 से मनरेगा के लिए काम नहीं किया है. ऐसा नहीं है कि मैं काम नहीं करना चाहता हूं. लेकिन करने के लिए काम नहीं है. उन्होंने अभी तक मुझे पिछले साल से बकाया राशि का भुगतान नहीं किया है. अगर मुझे पैसे नहीं मिलते हैं तो मेरे काम करने का क्या मतलब है?

सर्वे टीम के सदस्य राजेंद्रन नारायणन ने बताया कि मजदूरी भुगतान में देरी का मुख्य कारण धन की कमी है. दिसंबर 2017 के पहले सप्ताह में, वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए 48,000 करोड़ रुपये के आवंटित बजट में से 45,000 करोड़ रुपये पहले ही समाप्त हो चुके थे.

कम बजट होना है मुख्य कारण 

कम बजट से भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 28 में, न्यूनतम कृषि मजदूरी से कम दैनिक मनरेगा मजदूरी है. गुजरात में अंतर 104 (लगभग तीसरा) है, जहां कृषि मजदूरी 298 रुपये है और चालू वित्त वर्ष के दौरान एमजीएनआरईजीएस 194 रुपये है.

कृषि श्रमिकों (सीपीआई-एएल) के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अनुसार मनरेगा मजदूरी हर साल संशोधित की जाती है, जो 35 वर्षीय खपत पैटर्न को दिखाती है. नतीजतन, 10 राज्यों में, 2017-18 के बाद से मनरेगा मजदूरी को संशोधित नहीं किया गया है.

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में, जहां मनरेगा मजदूरी राज्य की न्यूनतम मजदूरी से अधिक है, वहां मनरेगा मजदूरी में 2 रुपये की वृद्धि हुई है. अगस्त 2017 में, वित्त मंत्रालय के खर्च विभाग ने एक नोटिस जारी किया. जिसमें कहा गया था कि देरी के कारणों में आधारभूत संरचना की बाधाएं, धन की कमी और प्रशासनिक अनुपालन की कमी शामिल है.

फिर भी, मार्च 2018 में, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यसभा को बताया कि मजदूरी भुगतान में देरी राज्य स्तर पर कार्यान्वयन के मुद्दों के कारण थी. इन मुद्दों में कम स्टाफ, देर से उपस्थिति की रिपोर्टिंग, डेटा एंट्री, मजदूरी सूचियों और एफटीओ आदि शामिल हैं.

आधार कार्ड लिंक न होना भी है समस्या

मनरेगा मजदूरों के बैंक खातों के साथ आधार के अनिवार्य संबंध ने भी समस्याएं पैदा की हैं. यदि आधार संख्या गलत बैंक खातों से जुड़ी हुई है, तो मजदूरी भुगतान गलत तरीके से जमा हो सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी कारणों से भुगतान में देरी होती है. देरी से भुगतान के लिए एक अन्य कारण राज्य का केंद्र सरकार को समय पर अपने खातों की लेखापरीक्षित रिपोर्ट भेजने में विफलता है, फिर भी एक और संभावित कारण राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड प्रबंधन प्रणाली (एन-एफएमएस) है, जो केंद्र सरकार की भुगतान प्रणाली 2016-17 की शुरुआत में पेश की गई थी, जो केंद्र सरकार को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) का उपयोग करके मजदूरी भुगतान करने का एकमात्र अधिकार देता है. फंड केंद्र सरकार से राज्य के रोजगार गारंटी फंड में और फिर एक कामगार के खाते में जाते हैं.

नारायणन कहते हैं कि देरी से भुगतान पर हमारे विश्लेषण में, श्रमिकों के लिए मजदूरी जमा (एन-एफएमएस के माध्यम से) करने में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है.

नारायणन ने कहा, “हालांकि यह संभव है कि 15 दिनों के भीतर अधिक एफटीओ उत्पन्न हो रहे हों, फिर भी राशि जमा करने में काफी समय लगता है। अक्सर एनआरईजीए के फील्ड कार्यकर्ताओं कहते है कि उन्होंने एफटीओ उत्पन्न किया है, लेकिन केंद्र ने भुगतान जारी नहीं किया है."

जबकि विभिन्न एजेंसियां बकाया पास करती हैं, 65 वर्षीय गुलाब रानी जैसे मजदुर परेशान हैं. वो कहती हैं कि हमारा पैसा बैंक में पहुंच जाता है, लेकिन हमें वहां से नहीं मिल पता है. अगर हमें हमारे काम का पैसा ही ना मिले, तो हमारे काम करने का क्या मतलब है?

(संजुक्ता नायर और खबर लेहरिया की इंडिया स्पेंड के लिए रिपोर्ट)

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