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मंदसौर: रेप के आरोपी को फांसी देने की मांग बच्चों की सुरक्षा की जरूरत से भटकाने वाली है

ऐसा मानना है कि लोगों में शिक्षा का प्रसार और जागरूकता हो जाए तो सेक्स से जुड़े अपराध खुद ब खुद कम हो जाएंगे, जबकि मौत की सजा देने से इसके परिणाम उलट सकते हैं

Updated On: Jul 03, 2018 12:08 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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मंदसौर: रेप के आरोपी को फांसी देने की मांग बच्चों की सुरक्षा की जरूरत से भटकाने वाली है

दिल्ली के दिल दहलाने वाले निर्भया कांड के पांच साल के बाद मध्यप्रदेश विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक कानून पास किया जिसमें 12 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से रेप के दोषियों को सजा-ए-मौत देने का प्रावधान किया गया है. मध्य प्रदेश कैबिनेट के पब्लिक सेफ्टी बिल की स्वीकृति देने के एक हफ्ते के बाद सरकार ने ये कदम उठाया.

पब्लिक सेफ्टी बिल के प्रावधानों के मुताबिक, नाबालिगों से बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा या फिर 14 साल की सजा देने का कानून बनाया गया है. मंदसौर में 26 जून को आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार की घटना सामने आने के बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आश्वासन दिया था कि वो आरोपियों को फांसी की सजा दिलवाने का प्रयास करेंगे. इस घटना के एक दिन बाद चौहान ने अपने आवास पर पत्रकारों से बातचीत के दौरान साफ कहा था कि 'ये दरिंदे धरती पर बोझ हैं. ये दरिंदे धरती पर रहने लायक नहीं हैं.'

मंदसौर, भोपाल, इंदौर, रतलाम और नीमच में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और इस घटना के विरोध में मोमबत्तियों और बैनरों के साथ प्रदर्शन किया. मंदसौर में मुस्लिम और हिंदू धर्म, दोनों से जुड़े संगठन सड़कों पर उतरे और एक स्वर से इस घटना की निंदा की. इस घटना के मुख्य आरोपी मुस्लिम समुदाय से आते हैं, ऐसे में दोनों पक्षों के संगठनों ने राजनीतिक दलों को इस घटना को सांप्रदायिक रंग न देने की अपील की है.

मौत की सजा के प्रावधान का सबसे बड़ा डर

कानून बनने के बाद मध्यप्रदेश में एक ऐसा सामाजिक वर्ग भी है जो कि मृत्युदंड के खिलाफ है और उसका मानना है कि आने वाले समय में इसका और बुरा परिणाम निकल सकता है. इनकी थ्योरी के मुताबिक, कहीं सजा-ए-मौत के प्रावधान के बाद अपराधी डर कर अपने अपराध का सुबूत मिटाने के लिए कहीं पीड़िता की हत्या ही न कर दे. दूसरा महत्वपूर्ण कारण है कि कहीं ऐसा न हो कि इस कानून की आड़ में सरकार सबसे जरूरी महिला सुरक्षा के उपायो को सुधारने की कोशिश ही न करे.

रिसर्च और पॉलिसी एडवोकेसी आर्गनाइजेशन विकास संवाद के सचिन जैन पिछले छह महीने से एनसीआरबी के पिछले 16 साल के उन आंकड़ों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें बच्चों के खिलाफ अपराध हुआ है. संबंधित राज्यों के इस रिसर्च के आंकड़ों को सचिन ने फ़र्स्टपोस्ट के साथ साझा किया.

आंकड़ों के मुताबिक, इस काल में मध्य प्रदेश के अंदर बच्चों के खिलाफ होनेवाले अपराध 1,425 से बढ़कर 13,746 हो गए. यानी कि इस अवधि में बच्चों के खिलाफ अपराध 865 फीसदी तक बढ़ गए. बच्चियों के खिलाफ रेप या यौन अपराधों के पूरे देश के आंकड़ों के अनुसार कुल 153701 मामले दर्ज किए गए, जिसमें से 23659 मामले मध्य प्रदेश से जुड़े हुए हैं. उसी तरह से पूरे देश में पिछले सोलह सालों में 249383 बच्चों का अपहरण हुआ और इनमें से 9 फीसदी यानि 23564 मामले एमपी में दर्ज किए गए. मध्य प्रदेश के कोर्टों में 2001 तक 2065 ऐसे मामले थे जिसमें बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले आरोपियों के खिलाफ चलने वाले केसों में ट्रायल अब तक पूरा नहीं हो सका है. 16 वर्षों में ये आंकड़ा बढ़कर 31392 तक पहुंच चुका है. मध्य प्रदेश में 404 केसों में ट्रायल हो चुका है और इसमें से भी केवल 157 केसों में आरोपियों को दोषी पाया गया है जो कि इन आंकड़ों का महज 39 फीसदी ही है. 2016 तक भी स्थिति में बदलाव नहीं आ सका है और कुल 5444 केसों में से केवल 1642 लोगों को दोषी पाया गया है.

वर्ष 2018-19 के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने कुल 99.61 करोड़ रुपए 3.2 करोड़ बच्चों के लिए आवंटित किए. इस राशि के मुताबिक, एक बच्चे पर एक साल का खर्च बैठता है केवल 28 रुपए. 90.61 करोड़ रुपए की राशि में से 67.76 करोड़ रुपए इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन प्लान के अतंर्गत आवंटित किए गए है. ये एक सरकारी योजना है जिसे भारत सरकार के द्वारा लागू किया गया है और इस योजना का मकसद बच्चों की सुरक्षा करना है. इस आवंटन में से 27.09 करोड़ रुपए कर्मचारियों के वेतन और भत्ते में ही समाप्त हो जाते हैं. जैन के मुताबिक मध्य प्रदेश सरकार के 2018-19 के वजट की समीक्षा करने से पता चलता है कि एमपी सरकार के 2.05 लाख करोड़ रुपए के बजट में से केवल 0.044 फीसदी राशि ही बच्चों की सुरक्षा के नाम पर खर्च किया जा रहा है. इंडियन पीनल कोड की धारा 376 और पोक्सो एक्ट 2012 के सेक्शन 4 और 6 के अनुसार नाबालिग बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों और रेप के 23569 मामले सामने आए हैं. दिल्ली. जिसे महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के मामले में सबसे कमजोर कहा जाता है वहां के लिए पिछले 16 साल का आंकड़ा 7825 रहा है.

चाइल्ड प्रोटेक्शन और जेंडर के प्रति स्पेशल ट्रेनिग कार्यक्रमों की जरूरत

जैन का कहना है कि इन आंकड़ों के बाद भी उनके अनुसार बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के बारे में केवल 5 फीसदी मामले ही दर्ज होते रहे हैं. जैन कहते हैं कि 'हम झूठी शान की वजह से अपने बच्चों को खो देते हैं, बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ गंभीरता लाने के लिए एक तरीका है. इसके लिए हमें महिला और बच्चों की सुरक्षा को सामाजिक आर्थिक प्रगति के केंद्रीय संकेतक से जोड़ना होगा. इसके अलावा राजनीतिक दलों, संसद, विधानमंडलों और मीडिया संस्थानों को चाइल्ड प्रोटेक्शन और जेंडर के प्रति स्पेशल ट्रेनिग कार्यक्रम चलाने पड़ेंगे.'

(आंकड़ों का स्रोत- नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो)

भोपाल में चाइल्ड वेलफेयर कमिटी की सदस्या रेखा श्रीधर कहती है कि अपराधियों को खत्म करने के कानून की जगह क्या ये सही नहीं होगा कि हम अपने सिस्टम की खामियों को दूर करने की कोशिश करें. श्रीधर ‘हिफाजत’ से भी जुड़ी हुई हैं जो कि महिला और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा पर काम करने वाली एक संस्था है. श्रीधर मध्य प्रदेश के सभी सेंट्रेल जेलों में महिला कैदियों के साथ मिलकर काम करती रही हैं.

सीआरपीसी की धारा 154 के मुताबिक, प्राथमिक जानकारी और जीरो एफआईआर इस तरह से डिजाइन किए गए हैं जिसमें ये सुनिश्चित किया जाता है कि पीड़ित की शिकायत को बिना जांच किए और शुरुआती कार्रवाई किए बिना मामले को दूसरे जगह ट्रांसफर नहीं किया जा सके. लेकिन इसके बावजूद 'कई बार ऐसा होता है कि हमारे सामने ऐसी स्थिति बन जाती है जिसमें पुलिस स्टेशन केस दर्ज करने से इंकार कर देता है, यहां तक कि पॉक्सों के मामलों में केस दर्ज कराने में मशक्कत करनी पड़ती है.' श्रीधर 2015 के एक मामले का उदाहरण देती हैं. उनके अनुसार विदिशा जिले की एक लड़की अपने परिवार के द्वारा ट्रैफिकिंग का शिकार बनती है. इस लड़की का मामला पुलिस थाने में दर्ज कराने में श्रीधर को कई पापड़ बेलने पड़े. श्रीधर ने कई स्तरों पर इस संबंध में अधिकारियों को आगाह करके मामले को भोपाल के कमला नगर पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया.

बच्चों के किसी भी केस में एफआईआर तक लिखवाने में आती है मुश्किल

मध्यप्रदेश में चाइल्ड सेफ्टी के मामले पर काम करने वाले बड़े और छोटे संगठनों के पास फ़र्स्टपोस्ट ये जानने के लिए पहुंचा कि क्या सजा ए मौत का वादा और सिविल सोसायटी का न्याय की मांग करना पर्याप्त है. गांधीनगर की एक चैरिटेबल संस्था नित्या सेवा सोसायटी के द्वारा समाजिक रूप से 200 वंचितों और पिछड़े बच्चों के लिए शेल्टर होम चलाने वाले देवेंद्र गुप्ता ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि बच्चों को कई जगहों से छुड़ाया जाता है जैसे बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन या फिर वो टूटे परिवारों से आते हैं. गुप्ता के मुताबिक, हरेक जिले में केवल एक बाल कल्याण समिति होती है जो कि एक कोर्ट की तरह काम करती है और वो भी ये तय करती है कि बच्चे को कहां भेजा जाए, शेल्टर होम या अनाथ आश्रम. लेकिन खोए बच्चों के प्रति पुलिस का रवैया इतना निराशाजनक होता है कि एक बच्चे के खोने की रिपोर्ट लिखवाने में 3 से 4 दिन लग जाते हैं. गुप्ता ने बताया कि उसके शेल्टर होम में बाल कल्याण समिति सीहोर,उज्जैन, इटारसी और इंदौर से लड़के आते हैं.

गुप्ता की बात से स्मृति शुक्ला भी इत्तेफाक रखती हैं. शुक्ला ‘साथिया संस्था’ से जुड़ी हुई हैं जो कि एक कम्युनिटी वेलफेयर ग्रुप है और ये बैतूल, भोपाल, सीहोर और शाजापुर में ट्रेनिंग और कैपेसिटी बिल्डिंग का काम करती है. शुक्ला का कहना है कि सीहोर में उन्होंने देखा है कि जो महिला शादी के बाद यौन हिंसा कि शिकायत करती हैं, उन्हें उनके पति के घर वापस भेजकर कर मामला निपटाने को कहा जाता है. महिला पुलिसकर्मियों को जेंडर सेंसेटाइजेशन की जानकारी देना और खास करके महिलाओं और बच्चियों के प्रति ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

इधर जावेद अनीस जैसे भी कुछ लोग हैं. जावेद ने जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के फोरम में अल्पसंख्यक मामलों पर अपने विचार रखे थे. जावेद का मानना है कि सजा ए मौत का फरमान केवल लोकप्रिय कदम है. भोपाल की स्लम बस्तियों खास करके कानासिया और श्यामनगर बस्ती में अपराध बढ़े हैं. इन्हीं स्लम बस्तियों में शिक्षा सुधारों पर काम करने वाले अनीस का कहना है कि रेप जैसे बड़ी सामाजिक समस्या के बारे में भी भोपाल जैसे बड़े शहर के सरकारी स्कूलों के बारे में कोई चर्चा नहीं करता. जावेद का कहना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी बच्चों को यौन अपराधों के प्रति जागरूक करने के लिए संवेदनशील बनाने की जरूरत है.

स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों की समस्याएं

लेकिन शिक्षकों की मध्य प्रदेश में अपनी अलग समस्या है. 2016 में संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक मध्यप्रदेश में 17000 से ज्यादा स्कूल हैं जहां पर केवल एक ही शिक्षक है. पूरे भारत में जितने एक शिक्षक वाले स्कूल हैं उसका छठवां भाग केवल एमपी में है. अनीस का दावा है कि आज 10000 से 15000 पाने वाले अस्थायी शिक्षकों की संख्या एमपी के स्कूलों में स्थायी शिक्षकों से ज्यादा है. इन अस्थायी शिक्षकों के पास पढ़ाने के अलावा भी कई तरह के काम होते हैं जैसे मिड डे मील की व्यवस्था करना इसके अलावा अब तो राइट टू एजुकेशन लागू होने के बाद उन्हें बच्चों को पास के प्राइवेट स्कूलों में भी एडमिशन कराने की जिम्मेदारी होती है.

इस मामले का दूसरा पहलू ये है कि स्कूल से ड्रापआउट होनेवाले बच्चे सस्ते और घटिया केमिकल ड्रग्स जैसे टायर पंचर सॉल्यूशन का इस्तेमाल करते हैं और बाद में इसकी लत लगने के बाद वो अपराध की ओर मुड़ जाते हैं. मंदसौर रेप कांड के मुख्य आरोपी इरफान के परिवार को जानने वालों ने फ़र्स्टपोस्ट ने बताया कि इरफान को पहले से ही शराब पीने की लत लगी हुई थी.

एनसीआरबी के द्वारा जारी किए गए 2015 के जेल आंकड़ों के मुताबिक देश में अलग अलग जेलों में 1,34,168 सजायाफ्ता मुजरिम बंद हैं जिनमें से 36,406 निरक्षर हैं जबकि 57610 कैदी दसवीं तक पढ़े लिखे हैं, एमपी में 4743 निरक्षर और 8133 कैदी दसवीं से नीचे तक पढ़े हैं.

2014 में अपने तरह के पहले वन वे क्राइसिस सेंटर की शुरुआत भोपाल में हुई थी. यहां पर पीड़ित न केवल अपना एफआईआर दर्ज करा सकते हैं बल्कि उन्हें मेडिकल उपचार, साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग और कानूनी सहायता भी यहां मिल सकती है. रेप पर आधारित आमिर खान के सत्यमेव जयते के एपिसोड के बाद यहां पर पहला सेंटर खुला था. दो साल के बाद महिला और बाल विकास विभाग ने इसी तरह का अपना सेट अप इस सेंटर के सामने ही खोल लिया. ये दोनों जेपी हॉस्पिटल कांप्लेक्स का हिस्सा हैं. सरकारी संस्थानों को सखी सेंटर के रूप में जाना जाता है और एक मार्च 2018 तक ऐसे 17 सेंटर बन चुके हैं. इंदौर, भोपाल, बुरहानपुर, छिंदवारा, देवास, ग्वालियर, होशंगाबाद,जबलपुर, कटनी, खंडवा, मुरेना, रतलाम, सागर, रीवा, सतना, शहडोल, सिंगरौली और उज्जैन में एक एक सेंटर मौजूद है.

द समहिता डेवलपमेंट नेटवर्क्स की लीगल राइट्स अवेयरनेस कार्डिनेटर नीलम तिवारी का कहना है कि 'ये पहल शानदार है लेकिन इससे जुड़े दो ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर जल्दी से जल्दी मिल जाए उतना ही अच्छा है. पहला ये कि घटना के बाद सदमे में रही नाबालिग निर्धारित जगह पर एफआईआर कराने नहीं जाएगी उसे कोई नजदीकी पुलिस स्टेशन तक लोग पहुंचाएंगे. दूसरा, नाबालिग के परिजन नहीं चाहेंगे कि नाबालिग या उनकी पहचान उजागर हो ऐसे में वो रिपोर्ट करने के लिए निर्धारित जगह पर जाने से बचना चाहेंगे. वैसे भी भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों में बने सेंटर्स में भीड़-भाड़ ज्यादा होती है और वहां पहचान उजागर होने का खतरा ज्यादा रहता है.'

इसके अलावा जागरूकता की कमी

वन स्टॉप क्राइसिस सेंटर, इंदौर की प्रशासक इंदु पांडे ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि उनके पास बच्चों के यौन हिंसा से जुड़े मामले नहीं आते हैं बल्कि उनके पास अधिकतर घरेलू हिंसा से जुड़े मामले सामने आते हैं. बुरहानपुर सेंटर के असिस्टेंट डायरेक्टर स्वभाव जैन भी बिल्कुल इसी तरह की बात बता रहे हैं.

रतलाम सेंटर में डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर आरके मिश्रा के मुताबिक अभी तक एक भी बच्चे के खिलाफ यौन हिंसा की शिकायत इसलिए नहीं मिली है क्योंकि क्योंकि अधिकतर मामलों में घटना को अंजाम देने वाला व्यक्ति न केवल पीड़िता बल्कि उसको परिजनों को भी जानने वाला व्यक्ति होता है ऐसे में परिजन भी मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने से भागते हैं. समस्या इस संस्था के स्ट्रक्चर में नहीं है बल्कि सोच में है जिसमें लोगों को लगता है कि सबसे पहले पुलिस के पास जाना चाहिए इसके अलावा लोगों को पाक्सो एक्ट के बारे में भी जानकारी नहीं है. मिश्रा के मुताबिक इस संबंध में लागातार कोशिश की जा रही है.

मिश्रा कहते हैं कि 'हम पोक्सो कानून के प्रति लोगों को और बच्चों को जागरुक करने के लिए स्कूलों में फिल्में दिखा रहे हैं और होर्डिंग भी लगवा रहे हैं लेकिन ये तब तक कारगर नहीं होगा जब तक समाज और बच्चों के अभिभावक इस संबंध में खुलकर बात नहीं करेंगे तब तक इस समस्या के जड़ तक नहीं पहुंचा जा सकता है.'

चाइल्ड राइट्स अलायंस के सदस्यों ने इस अप्रैल भोपाल में गवर्नर आनंदीबेन पटेल को एक ज्ञापन सौंपा. इसमें उन्होंने पब्लिक सेफ्टी बिल को समाप्त करने की मांग की. चाइल्ड्स राइट्स अलायंस ने मध्य प्रदेश गवर्नर को दिए अपने ज्ञापन में कहा है कि 100 देशों ने डेथ पेन्ल्टी को समाप्त कर दिया गया है. इस तरह के कानूनों से कोर्ट पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अपने बचाव में मुश्किल आएगी. इन्होंने ये भी तर्क दिया है कि कहीं रेप के बाद पीड़िता की हत्या करना अपराधी शुरू न कर दें क्योंकि रेप की सजा भी फांसी है और मर्डर की सजा भी फांसी है.

पिछले 35 सालों से एक शैक्षणिक संस्था एकलव्य के साथ जुड़ी हुई अंजली नरोन्हा भी इस अलायंस की सदस्य हैं. इन्होंने गवर्नर को दिए गए मेमोरेंडम की कॉपी फ़र्स्टपोस्ट के साथ साझा की है.

'सजा ए मौत देने के प्रावधान से अपराधी के पीड़िता को जान से मारकर सुबूत मिटाने की कोशिश करेगा. पोक्सो एक्ट को संशोधित करके इसमें मौत की सजा जोड़ी जा रही है, इससे पहले भी सेक्सुअल असॉल्ट के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया हुआ है. पोक्सो के तहत पहले से ही मोलेस्टेशन और पेनीट्रेटिव सेक्स के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है. लेकिन सजा ए मौत का प्रावधान करके महिला और बच्चे की सुरक्षा के पुरे मामले से ध्यान भटककर अपराधियों की सजा पर ध्यान चला गया और इस वजह से उनपर खतरा बरकरार है.' ये कहना है नोरोन्हा का जिन्होंने खुलासा किया कि अलायंस के सदस्यों को भोपाल के एक होस्टल के वार्डन के खिलाफ पोक्सो का चार्ज जुड़वाने में तीन महीने का समय लग गया.

ये वार्डन बच्चों को मोलस्ट करता था. कहते हैं कि अधिकतर रेपिस्ट पीड़िता और उनके परिजनों का जानकार होता है ऐसे में मौत की सजा के प्रावधान के बाद उन पर मामले की रिपोर्ट न करने का दबाव होगा. अलायंस ने अपना मेमोरेंडम राष्ट्रपति के पास भी भेजा है. अलायंस को लगता है कि देश में पहले से ही इस संबंध में कानून मौजूद हैं और अगर उनका सही तरीके से पालन हो, सुरक्षा के अच्छे उपाए किए जाएं, लोगों में शिक्षा का प्रसार और जागरूकता हो जाए तो सेक्स से जुड़े अपराध खुद ब खुद कम हो जाएंगे.जबकि मौत की सजा देने से इसके परिणाम उलट सकते हैं.

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