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मालदीव संकट: चीन की कूटनीति का गढ़ है माले, भारत को सक्रिय होना होगा

अगर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुद को सुरक्षा-गारंटर के रूप में स्थापित करने का सपना देखता है, तो इसे हर हाल में अपने ठीक पड़ोस के मुल्क के लिए ज्यादा सक्रिय नीति अपनानी होगी

Updated On: Feb 21, 2018 03:47 PM IST

Sreemoy Talukdar

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मालदीव संकट: चीन की कूटनीति का गढ़ है माले, भारत को सक्रिय होना होगा

माले में ताजा गतिविधियां- जहां मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने स्वेच्छाचारी राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन अब्दुल गय्यूम की कार्रवाइयों से देश के संस्थानों, जनता और राजनीतिक व्यवस्था के सामने खड़े हुए संकट से उबरने में भारत से मदद मांग कर इसके लिए एक सैद्धांतिक और कूटनयिक चुनौती खड़ी कर दी है. इस संकट के पीछे ड्रैगन की परछाईं दिखाई दे रही है.

चीन, जिसका वर्ष 2011 तक माले में दूतावास तक नहीं था, भारत के ठीक पड़ोस में स्थित इस छोटे से मुल्क की घरेलू राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है.

ड्रैगन के कब्जे में आ चुका है मालदीव

शी जिनपिंग की खास तैयारियां यहां साफ दिखाई दे रही हैं. भारत के जागने से काफी पहले ही बीजिंग मालदीव के साथ मुक्त-व्यापार समझौता कर चुका है. ऐसे देश के साथ, जो भारतीय भूभाग से काफी करीब है और नई दिल्ली के स्पष्ट रणनीतिक प्रभाव में माना जाता है, चीन तेजी से व्यापार व राजनयिक संबंध बढ़ा रहा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में चीनी कंपनियां भारतीय कंपनियों को बेदखल कर रही हैं, मालदीव की राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र से तानाशाही की तरफ बढ़ चुकी है और साफ दिखाई दे रहा है कि इसका नेतृत्व चीन के पाले में जा चुका है.

यह साफ है कि चीन के लिए 4,00,00 की आबादी वाले एक देश में आर्थिक संभावनाएं बहुत सीमित हैं. बीजिंग की रुचि रणनीतिक है. चीन छिपे हाथों से ऐसा ताना-बाना बुन रहा है जिससे मालदीव नई दिल्ली से दूर हो जाए. जब से मालदीव के पहले लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को 2012 में सैन्य तख्तापलट में हटा दिया गया, अब्दुल्ला यमीन की नई सरकार का चीन की तरफ झुकाव बढ़ा है. भारतीय कंपनी को इब्राहीम नासिर इंटरनेशनल एयरपोर्ट को विकसित करने का अनुबंध बीच में ही काम पूरा होने से पहले खत्म कर दिया गया और चीनी संस्थान को दे दिया गया. बाद में जीएमआर ने सिंगापुर में आर्बिट्रेशन का पहला राउंड जीत लिया.

यह छोटा सा द्वीप समूह, जो अब भी भारत के साथ 'विशेष रिश्ते' का दावा करता है, चीन की वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) योजना में शामिल हो गया है, और इनफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में चीनी कंपनियों को भारी निवेश की इजाजत दे दी है. मीडिया में ऐसी खबरें आई हैं कि चीन मालदीव का एक द्वीप लीज पर लेने के बाद यहां पर अपना एक बेस शुरू करने की तैयारी कर रहा है. बीते साल दिसंबर में अब्दुल्ला यमीन सरकार ने चीन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर किया और जिसके बारे में बताया जाता है कि इस संसदीय प्रक्रिया में फास्ट ट्रैक से पास कर दिया गया. बताया जाता है कि सत्तारूढ़ के सांसदों को इस बमुश्किल पढ़ने का समय दिया और विपक्ष को इसके बारे में अंधेरे में रखा गया.

सचिन पराशर ने पदच्युत राष्ट्रपति नशीद को उद्धृत करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है, “समझौते का विवरण अभी तक ना तो विपक्ष के साथ साझा किया गया है, ना ही सार्वजनिक किया गया है. सरकार ने 1000 पेज के दस्तावेज की मंजूरी के लिए पूरी संसद को एक घंटे से भी कम का समय दिया.” यह छोटा सा देश जाने-पहचाने ऋण जाल की तरफ बढ़ रहा है. इसके ऋण का 70 फीसद चीन के पास बंधक है, और यह इसके बजट का करीब 20 फीसद होता है.

सुधा रामचंद्रन द डिप्लोमैट में लिखती हैं कि मालदीव में चीन के फंड से और चीन द्वारा “मेगा इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट” में “माले को हुलहुले द्वीप को जोड़ने वाला फ्रेंडशिप ब्रिज और हुलहुमाले में रीक्लेम्ड भूमि पर 1000 अपार्टमेंट का उपनगरीय हाउसिंग प्रोजेक्ट” बनाया गया है. इससे भी बड़ी बात यह है कि मुक्त व्यापार समझौता चीनी फर्मों और निवेशकों को “होटल, रेस्तरां, याट मरीन के साथ-साथ ट्रैवेल एजेंसी और ट्रांसपोर्ट सेवाएं चलाने की अनुमति देता है” और पर्यटन क्षेत्र को खोलता है.

चीन को दोस्त और भारत को दुश्मन बताया जा चुका है

आर्थिक प्रभुत्व के साथ-साथ राजनीतिक प्रभुत्व भी आता है. ऐसे संकेत दिखाई दे रहे हैं कि मालदीव चीनी तिकड़मों का शिकार बनता जा रहा है. मालदीव के एक सरकार समर्थक अखबार ने हाल ही में चीन को मालदीव का बेस्ट फ्रेंड बताया और भारत को, जिसके साथ इसके एक सदी पुराने सांस्कृतिक और व्यापार संबंध हैं, 'शत्रु देश' बताया. अब्दुल्ला यमीन सरकार की सुप्रीम कोर्ट की खुली अवज्ञा ने एक खदबदाते लावा को ज्वालामुखी में बदल दिया. यमीन ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले की अपने खिलाफ महाभियोग के तौर पर व्याख्या की, और फौज व पुलिस को अपने पक्ष में इकट्ठा कर लिया.

पूर्व राष्ट्रपति नशीद और आठ अन्य विपक्षी राजनेताओं, जिन्हें कोर्ट ने माना कि उनको गैरकानूनी तरीके से कैद किया गया है, के खिलाफ मुकदमों को खारिज करने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की प्रतिक्रिया में यमीन ने बृहस्पतिवार के बाद से दो पुलिस प्रमुखों को हटा दिया है और मालदीव के न्यायिक प्रशासन विभाग के प्रमुख हसन सईद के पीछे पुलिस लगा दी. अब यामीन के आदेश पर पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम और चीफ जस्टिस अब्दुल सईद को गिरफ्तार कर देश में 15 दिनों का आपातकाल लागू कर दिया है.

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नौशीद. (इमेज- रॉयटर्स)

मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नौशीद. (इमेज- रॉयटर्स)

सुप्रीम कोर्ट ने संसद के उन 12 सदस्यों की बहाली का भी आदेश दिया है, जिनका ओहदा छीन लिया गया था. इस कदम से भी यमीन सरकार अल्पमत में आ सकती है. इसके जवाब में यमीन ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अब्दुल्ला सईद और सुप्रीम कोर्ट जस्टिस अली हमीद के परिवार के सदस्यों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक यमीन की सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ सदस्य स्वतंत्र टीवी चैनल राजी टीवी को बंद कराने की कोशिश कर रहे हैं और कह रहे हैं कि यह वैमनस्य फैला रहा है.

मालदीव का सुप्रीम कोर्ट भारत की मदद चाहता है

टाइम्स ऑफ इंडिया ने 'मालदीव सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ सूत्र' का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने कहा है कि 'हम चाहते हैं कि मालदीव में कानून का शासन लागू करने के लिए भारत कड़े उपाय करे.' भारत की कार्रवाई का उत्सुकता से इंतजार किया जा रहा है.

श्रीलंका और मालदीव में अमेरिकी राजदूत अतुल केशप ने ट्वीट किया:

कल से #Maldives #Majlis की बैठक शुरू होने में कौन से सुरक्षा जोखिम रुकावट डाल रहे हैं? सड़कों पर सांसद पर क्यों पेप्पर स्प्रे किया गया और एयरपोर्ट पर पहुंचते ही गिरफ्तार कर लिया गया? जेल में बंद सांसदों को आजाद करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार, पुलिस और सेना कब लागू करेंगे और निलंबित सांसदों का विशेषाधिकार कब बहाल करेंगे?

भारतीय विदेश मंत्रालय ने फिलहाल कार्रवाई पर मौन को अहमियत दी है और खुद को एक बयान तक सीमित रखा है- “लोकतंत्र और कानून के शासन की भावना को ध्यान में रखते हुए मालदीव सरकार के सभी अंगों के लिए जरूरी है कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान और पालन करें. हम यह भी आशा करते हैं कि मालदीव के अधिकारियों द्वारा हर प्रकार की परिस्थिति में भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित की जाएगी. एक नजदीकी और मित्रवत पड़ोसी के तौर पर भारत स्थिर, शांतिपूर्ण और समृद्ध मालदीव देखना चाहता है.” नई दिल्ली के लिए यह लम्हा आत्ममंथन का है. क्या इसे अ-हस्तक्षेप की नीति पर चलना चाहिए या इसे लोकतंत्र की बहाली के लिए और संस्थाओं की पवित्रता बनाए रखने के लिए दखल देना चाहिए?

अगर गुट-निरपेक्षता या रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का अभी भी आधार है, तो इसके सामने दखल नहीं देने वाला रास्ता है. आंशिक रूप से औपनिवेशिक अतीत और आंशिक रूप से लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्धता के कारण भारत कुल मिलाकर अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले संप्रभु देशों की घरेलू राजनीति में दखल नहीं देते हुए अपने रणनीतिक हित में संतुलन साधने की कोशिश करता है.

कई बार वैचारिक स्थिति का नतीजा रणनीतिक विरोधाभास के रूप में सामने आता है. भारत चाहता है कि इसे वैश्विक शक्ति माना जाए, लेकिन यह नेहरूवादी युग के एकाकीवाद को भी छोड़ नहीं पाता. यह बीते कई वर्षों में कोई कदम उठाने से बचता रहा है, जो कि एक वैश्विक शक्ति के रूप में इसे जरूर उठाने चाहिए. शीतकाल के बाद आए बड़े बदलावों के दौर में इससे कोई समस्या नहीं थी, लेकिन चीन के उत्थान ने संतुलन गड़बड़ा दिया है.

अगर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुद को सुरक्षा-गारंटर (ऐसी भूमिका जिसे यूएस, जापान और यहां तक कि आसियान देश भी निभाना चाहते हैं) के रूप में स्थापित करने का सपना देखता है, तो इसे हर हाल में अपने ठीक पड़ोस के मुल्क के लिए ज्यादा सक्रिय नीति अपनानी होगी. मालदीव भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है और इसे चीन के प्रभाव क्षेत्र में जाने से रोकना होगा. भारत को अपना पड़ोस सुरक्षित रखने के लिए कदम उठाने होंगे और सुनिश्चित करना होगा और राष्ट्रीय विकास व भू-राजनीतिक व्यवस्था के चलते रहने के लिए लोकतांत्रिक उदारवाद को बचाना होगा.

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